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#श्रीमद्भगवद् गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔
श्रीमद्भगवद् गीता - अनन्यचेताः सततं या मां स्मरति नित्यशः | तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः I। अनन्य चित्त होकर हे अर्जून! जो परुष S# ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तमको स्मरण करता है, सदा उस नित्य- निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात् उसे सहज हो प्राप्त हो जाता हूँ Il १४ II मामुपेत्य   पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्| नाज्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः I१ परम सिद्धिको प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखोंके घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते II १५ Il आब्रह्मभुवनाल्लोकाः   पुनरावर्तिनो्उर्जुन ( मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म ল নিম্ন Il हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यन्त सब लोक पुनरावर्तो हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता ; क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादिके लोक कालके द्वारा सीमित होनेसे अनित्य हैं Il १६ Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 8 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা अनन्यचेताः सततं या मां स्मरति नित्यशः | तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः I। अनन्य चित्त होकर हे अर्जून! जो परुष S# ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तमको स्मरण करता है, सदा उस नित्य- निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात् उसे सहज हो प्राप्त हो जाता हूँ Il १४ II मामुपेत्य   पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्| नाज्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः I१ परम सिद्धिको प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखोंके घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते II १५ Il आब्रह्मभुवनाल्लोकाः   पुनरावर्तिनो्उर्जुन ( मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म ল নিম্ন Il हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यन्त सब लोक पुनरावर्तो हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता ; क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादिके लोक कालके द्वारा सीमित होनेसे अनित्य हैं Il १६ Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 8 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা - ShareChat