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#सीताराम 🕉️ रामायण का एक अद्भुत और अनसुना प्रसंग: कौन थे माता सीता के भाई? 🕉️ हम सभी जानते हैं कि माता सीता मिथिला नरेश जनक की ज्येष्ठ पुत्री थीं और उन्हें 'जानकी' कहा जाता है। उन्हें खेत से प्राप्त होने के कारण 'भूमिपुत्री' भी कहा जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि प्रभु श्रीराम और माता सीता के विवाह के समय, भाई द्वारा निभाई जाने वाली रस्में किसने पूरी की थीं, जबकि राजा जनक का कोई पुत्र नहीं था? यह एक अत्यंत रोचक और दिव्य प्रसंग है। विवाह में खड़ी हुई धर्मसंकट की स्थिति: मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी (विवाह पंचमी) के दिन प्रभु श्रीराम और माता सीता का विवाह संस्कार चल रहा था। स्वयं ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सभी देवी-देवता वेश बदलकर इस अलौकिक दृश्य के साक्षी बने थे। विवाह के दौरान एक रस्म आई, जिसमें कन्या के भाई को आगे चलते हुए लावे (खील) का छिड़काव करना होता है। पुरोहित जी ने जब भाई को बुलाया, तो वहां सन्नाटा छा गया। राजा जनक का कोई पुत्र नहीं था। यह सोचकर कि रस्म कैसे पूरी होगी, पृथ्वी माता भी दुखी हो गईं। जब मंगलदेव बने सीता के भाई: तभी सभा में एक श्यामवर्ण का तेजस्वी युवक उठा और रस्म पूरी करने के लिए आगे आया। राजा जनक ने आश्चर्यचकित होकर उनका परिचय पूछा, क्योंकि वे किसी अनजान व्यक्ति से यह रस्म नहीं करवा सकते थे। उस युवक ने दृढ़तापूर्वक कहा, "राजन! मैं इस कार्य के सर्वथा योग्य हूँ। यदि शंका हो तो महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र से पूछ लें।" महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र ने मुस्कुराते हुए राजा जनक की शंका का समाधान किया। वह युवक कोई और नहीं, स्वयं मंगलदेव थे। संबंध का रहस्य: चूंकि माता सीता का जन्म पृथ्वी से हुआ था, वे 'भूमिपुत्री' थीं। और मंगल ग्रह को भी 'भूमिपुत्र' माना जाता है। इस नाते मंगलदेव माता सीता के धर्मभाई हुए। ऋषियों की आज्ञा पाकर मंगलदेव ने एक भाई का कर्तव्य निभाया और विवाह की रस्मों को पूर्ण किया। रामायण का यह प्रसंग हमें बताता है कि जब धर्म कार्य में कोई बाधा आती है, तो दैवीय शक्तियां स्वयं किसी न किसी रूप में सहायता के लिए उपस्थित हो जाती हैं। जय सिया राम! 🙏
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