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#मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
मेरे विचार - असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः | शक्योउवाप्तुमुपायतः  वश्यात्मना तुःयतता 1 जिसका मन वशमें किया हुआ नहीं है॰ ऐसे पुरुषद्वारा योग दुष्प्राप्य है और वशमें किये हुए मनवाले प्रयत्नशील पुरुषद्वारा साधनसे उसका प्राप्त होना सहज है यह मेरा मत है Il ३६ ।। अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः 4 अप्राप्य योगसंसिद्धि कां गतिं कृष्ण गच्छति ११ अर्जुन बोले- हे श्रीकृष्ण ! जो योगमें  श्रद्धा किन्तु T & रखनेवाला है ; संयमी इस कारण जिसका मन अन्तकालमें योगसे विचलित गोता अध्याय १२ रलोक ९ को टिप्णोमें इसका विस्तार देखना   चाहिवे। हो गया है, ऐसा साधक योगकी सिद्धिको अर्थात् भगवत्साक्षात्कारको न प्राप्त होकर किस गतिको प्राप्त होता है Il ३७ ।l कच्चिन्नोभयविश्रष्टश्छिन्नाश्रमिव नश्यति 4 अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि११ भगवत्प्राप्तिके मार्गमें $ সঙ্কানাঙ্কা ! क्या वह मोहित और आश्रयरहित ন্িহা-7িহা पुरुष बादलकी भाँति दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं   हो ভানা? Il ৪৫ Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः | शक्योउवाप्तुमुपायतः  वश्यात्मना तुःयतता 1 जिसका मन वशमें किया हुआ नहीं है॰ ऐसे पुरुषद्वारा योग दुष्प्राप्य है और वशमें किये हुए मनवाले प्रयत्नशील पुरुषद्वारा साधनसे उसका प्राप्त होना सहज है यह मेरा मत है Il ३६ ।। अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः 4 अप्राप्य योगसंसिद्धि कां गतिं कृष्ण गच्छति ११ अर्जुन बोले- हे श्रीकृष्ण ! जो योगमें  श्रद्धा किन्तु T & रखनेवाला है ; संयमी इस कारण जिसका मन अन्तकालमें योगसे विचलित गोता अध्याय १२ रलोक ९ को टिप्णोमें इसका विस्तार देखना   चाहिवे। हो गया है, ऐसा साधक योगकी सिद्धिको अर्थात् भगवत्साक्षात्कारको न प्राप्त होकर किस गतिको प्राप्त होता है Il ३७ ।l कच्चिन्नोभयविश्रष्टश्छिन्नाश्रमिव नश्यति 4 अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि११ भगवत्प्राप्तिके मार्गमें $ সঙ্কানাঙ্কা ! क्या वह मोहित और आश्रयरहित ন্িহা-7িহা पुरुष बादलकी भाँति दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं   हो ভানা? Il ৪৫ Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता - ShareChat