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#जय श्री राम 🔥 चरित्र की अग्नि-परीक्षा: जब श्रीराम ने ली लक्ष्मण की परीक्षा!🌿 यह प्रसंग उस वनवास काल का है, जब चित्रकूट की पावन धरा प्राकृतिक सौंदर्य से खिली हुई थी। चारों ओर शांति थी, और वन का एकांत वातावरण किसी के भी मन को मोह लेने के लिए पर्याप्त था। एक समय की बात है, माता सीता और लक्ष्मण जी एक शिला पर एकांत में बैठे थे। दोनों ही युवावस्था में थे। माता सीता का सौंदर्य अलौकिक था, और लक्ष्मण का तेज सूर्य समान। उसी समय, प्रभु श्रीराम वहाँ पधारे। उन्होंने देखा कि इस निर्जन वन में, जहाँ वसंत का प्रभाव है, सीता और लक्ष्मण अकेले बैठे हैं। प्रभु राम, जो स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, ने अपने अनुज लक्ष्मण के आत्म-संयम और चरित्र की गहराई को दुनिया के सामने लाने के लिए एक प्रश्न-रूपी लीला रची। राम जी ने लक्ष्मण की आँखों में देखते हुए एक बड़ा ही मनोवैज्ञानिक प्रश्न किया: 📜 श्रीराम का प्रथम प्रश्न: > पुष्पं दृष्ट्वा फलं दृष्ट्वा, दृष्ट्वा स्त्रीणां च यौवनम्। > त्रीणि रत्नानि दृष्ट्वैव, कस्य नो चलते मनः।। अर्थात: "हे लक्ष्मण! संसार में सुंदर खिले हुए पुष्प, रसीले फल और किसी स्त्री का अद्भुत यौवन—इन तीन रत्नों को एक साथ देखकर, भला किस पुरुष का मन विचलित नहीं होता?" (यह प्रश्न साधारण नहीं था। यह एक युवा तपस्वी के संयम की सीधी चुनौती थी।) लक्ष्मण जी ने विचलित हुए बिना, बड़ी विनम्रता और दृढ़ता से उत्तर दिया: 📜 लक्ष्मण का उत्तर: > पिता यस्य शुचिर्भूतो, माता यस्य पतिव्रता। > उभाभ्यामेव संभूतो, तस्य नो चलते मनः।। भावार्थ: "भैया! जिस पुत्र का पिता पवित्र आचरण वाला हो, और जिसकी माता पूर्ण रूप से पतिव्रता हो—उन दोनों के पवित्र संस्कारों से जन्में पुत्र का मन, संसार का कोई भी प्रलोभन विचलित नहीं कर सकता।" (लक्ष्मण जी ने यहाँ अपने चरित्र का श्रेय अपने माता-पिता के संस्कारों को दिया।) किंतु श्रीराम की परीक्षा अभी समाप्त नहीं हुई थी। उन्होंने प्रश्न को और अधिक कठिन और तीखा बना दिया। 📜 श्रीराम का द्वितीय प्रश्न: > अग्निकुण्डसमा नारी, घृतकुम्भसमः पुमान्। > पार्श्वे स्थिता सुन्दरी चेत्, कस्य नो चलते मनः।। अर्थात: "लक्ष्मण! शास्त्र कहते हैं कि नारी 'अग्निकुंड' के समान है और पुरुष 'घी के घड़े' के समान। यदि अग्नि और घी एक-दूसरे के अत्यंत समीप हों, तो पिघलना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में यदि कोई अपूर्व सुंदरी एकांत में पास बैठी हो, तो किसका मन नहीं डोलता?" (यह प्रश्न प्रकृति के नियम पर आधारित था, जिसे काटना असंभव सा लगता है।) तब लक्ष्मण जी ने जो उत्तर दिया, वह आज के युग के लिए भी चरित्र-निर्माण का मूल मंत्र है: 📜 लक्ष्मण का अद्वितीय उत्तर: > मनो धावति सर्वत्र, मदोन्मत्तगजेन्द्रवत्। > ज्ञानाङ्कुशसमा, बुद्धिस्तस्य नो चलते मनः।। भावार्थ: "हे रघुनन्दन! आप सत्य कहते हैं। यह मन एक मदमस्त हाथी की तरह है जो सदैव विषयों (भोग-विलास) की ओर दौड़ता है। किंतु... जिसके पास 'ज्ञान' और 'विवेक' रूपी अंकुश है, वह इस पागल हाथी को भी नियंत्रित कर लेता है। जिसकी बुद्धि ज्ञान के अंकुश से बंधी है, उसका मन कभी विचलित नहीं हो सकता, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो।" लक्ष्मण जी का यह उत्तर केवल संवाद नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का गौरव है। यह सिद्ध करता है कि संयम बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि भीतरी 'विवेक' और 'संस्कारों' से आता है। धन्य है वह भारत-भूमि, जहाँ लक्ष्मण जैसे 'जितेंद्रिय' (इन्द्रियों को जीतने वाले) महापुरुषों ने जन्म लिया। उनका चरित्र हमें सिखाता है कि सुंदरता वस्तुओं में नहीं, देखने वाले की दृष्टि और पवित्रता में होती है। सत्य ही शिव है, और शिव ही सुंदर है! 💐
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