#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣9️⃣3️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
पञ्चनवतितमोऽध्यायः
दक्ष प्रजापति से लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंश की परम्परा का वर्णन...(दिन 293)
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जनमेजय उवाच
श्रुतस्त्वत्तो मया ब्रह्मन् पूर्वेषां सम्भवो महान् । उदाराश्चापि वंशेऽस्मिन् राजानो मे परिश्रुताः ।। १ ।।
जनमेजय बोले- ब्रह्मन् ! मैंने आपके मुखसे पूर्ववर्ती राजाओंकी उत्पत्तिका महान् वृत्तान्त सुना। इस पूरुवंशमें उत्पन्न हुए उदार राजाओंके नाम भी मैंने भलीभाँति सुन लिये ।। १ ।।
किंतु लघ्वर्थसंयुक्तं प्रियाख्यानं न मामति । प्रीणात्यतो भवान् भूयो विस्तरेण ब्रवीतु मे ।। २ ।।
एतामेव कथां दिव्यामाप्रजापतितो मनोः । तेषामाजननं पुण्यं कस्य न प्रीतिमावहेत् ।। ३ ।।
परंतु संक्षेपसे कहा हुआ यह प्रिय आख्यान सुनकर मुझे पूर्णतः तृप्ति नहीं हो रही है। अतः आप पुनः विस्तारपूर्वक मुझसे इसी दिव्य कथाका वर्णन कीजिये। दक्ष प्रजापति और मनुसे लेकर उन सब राजाओंका पवित्र जन्म-प्रसंग किसको प्रसन्न नहीं करेगा? ।। २-३ ।।
सद्धर्मगुणमाहात्म्यैरभिवर्धितमुत्तमम् ।
विष्टभ्य लोकांस्त्रीनेषां यशः स्फीतमवस्थितम् ।। ४ ।।
उत्तम धर्म और गुणोंके माहात्म्यसे अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त हुआ इन राजाओंका श्रेष्ठ और उज्ज्वल यश तीनों लोकोंमें व्याप्त हो रहा है ।। ४ ।।
गुणप्रभाववीर्योजः सत्त्वोत्साहवतामहम् । न तृप्यामि कथां शृण्वन्नमृतास्वादसम्मिताम् ।। ५ ।।
ये सभी नरेश उत्तम गुण, प्रभाव, बल-पराक्रम, ओज, सत्त्व (धैर्य) और उत्साहसे सम्पन्न थे। इनकी कथा अमृतके समान मधुर है, उसे सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ।। ५ ।।
वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् पुरा सम्यङ्मया द्वैपायनाच्छ्रुतम् ।
प्रोच्यमानमिदं कृत्स्नं स्ववंशजननं शुभम् ।। ६ ।।
वैशम्पायनजीने कहा- राजन् ! पूर्वकालमें मैंने महर्षि कृष्णद्वैपायनके मुखसे जिसका भलीभाँति श्रवण किया था, वह सम्पूर्ण प्रसंग तुम्हें सुनाता हूँ। अपने वंश की उत्पत्ति का वह शुभ वृत्तान्त सुनो ।। ६ ।।
दक्षाददितिरदितेर्विवस्वान् विवस्वतो मनुर्मनो-रिला इलायाः पुरूरवाः पुरूरवस आयुरायुषो नहुषो नहुषाद् ययातिः; ययातेर्डे भार्ये बभूवतुः ।। ७ ।।
उशनसो दुहिता देवयानी; वृषपर्वणश्च दुहिता शर्मिष्ठा नाम ।। ८ ।।
दक्षसे अदिति, अदितिसे विवस्वान् (सूर्य), विवस्वान्से मनु, मनुसे इला, इलासे पुरूरवा, पुरूरवासे आयु, आयुसे नहुष और नहुषसे ययातिका जन्म हुआ। ययातिकी दो पत्नियाँ थीं पहली शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा दूसरी वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा ।। ८ ।।
अत्रानुवंशश्लोको भवति-
यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।
द्रुह्यं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ।। ९ ।।
यहाँ उनके वंशका परिचय देनेवाला यह श्लोक कहा जाता है-देवयानीने यदु और तुर्वसु नामवाले दो पुत्रोंको जन्म दिया और वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु तथा पूरु- ये तीन पुत्र उत्पन्न किये ।। ९ ।।
तत्र यदोर्यादवाः; पूरोः पौरवाः ।। १० ।।
इनमें यदुसे यादव और पूरुसे पौरव हुए ।। १० ।।
पूरोस्तु भार्या कौसल्या नाम । तस्यामस्य जज्ञे जनमेजयो नाम; यस्त्रीनश्वमेधानाजहार, विश्वजिता चेष्ट्वा वनं विवेश ।। ११ ।।
पूरुकी पत्नीका नाम कौसल्या था (उसीको पौष्टी भी कहते हैं)। उसके गर्भसे पूरुके जनमेजय नामक पुत्र हुआ (इसीका दूसरा नाम प्रवीर है); जिसने तीन अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था और विश्वजित् यज्ञ करके वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया था ।। ११ ।।
जनमेजयः खल्वनन्तां नामोपयेमे माधवीम् । तस्यामस्य जज्ञे प्राचिन्वान्; यः प्राचीं दिशं जिगाय यावत् सूर्योदयात्, ततस्तस्य प्राचिन्वत्त्वम् ।। १२ ।।
जनमेजयने मधुवंशकी कन्या अनन्ताके साथ विवाह किया था। उसके गर्भसे उनके प्राचिन्वान् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसने उदयाचलसे लेकर सारी प्राची दिशाको एक ही दिनमें जीत लिया था; इसीलिये उसका नाम प्राचिन्वान् हुआ ।। १२ ।।
प्राचिन्वान् खल्वश्मकीमुपयेमे यादवीम् । तस्यामस्य जज्ञे संयातिः ।। १३ ।।
प्राचिन्वान्ने यदुकुलकी कन्या अश्मकीको अपनी पत्नी बनाया। उसके गर्भसे उन्हें संयाति नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।। १३ ।।
१४ ।।
संयातिः खलु दृषद्वतो दुहितरं वराङ्गीं नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे अहंयातिः ।।
संयातिने दृषद्वान्की पुत्री वरांगीसे विवाह किया। उसके गर्भसे उन्हें अहंयाति नामक पुत्र हुआ ।। १४ ।।
अहंयातिः खलु कृतवीर्यदुहितरमुपयेमे भानुमर्ती नाम । तस्यामस्य जज्ञे सार्वभौमः ।। १५ ।।
अहंयातिने कृतवीर्यकुमारी भानुमतीको अपनी पत्नी बनाया। उसके गर्भसे अहंयातिके सार्वभौम नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ।। १५ ।।
सार्वभौमः खलु जित्वा जहार कैकेयीं सुनन्दां नाम। तामुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे
जयत्सेनो नाम ।। १६ ।।
सार्वभौमने युद्धमें जीतकर केकयकुमारी सुनन्दाका अपहरण किया और उसीको अपनी पत्नी बनाया। उससे उनको जयत्सेन नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।। १६ ।।
जयत्सेनो खलु वैदर्भीमुपयेमे सुश्रवां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अवाचीनः ।। १७ ।।
जयत्सेनने विदर्भराजकुमारी सुश्रवासे विवाह किया। उसके गर्भसे उनके अवाचीन नामक पुत्र हुआ ।। १७ ।।
अवाचीनोऽपि वैदर्भीमपरामेवोपयेमे मर्यादां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अरिहः ।। १८ ।।
अवाचीनने भी विदर्भराजकुमारी मर्यादाके साथ विवाह किया, जो आगे बतायी जानेवाली देवातिथिकी पत्नीसे भिन्न थी। उसके गर्भसे उन्हें 'अरिह' नामक पुत्र हुआ ।। १८ ।।
अरिहः खल्वाङ्गीमुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे महाभौमः ।। १९ ।।
अरिहने अंगदेशकी राजकुमारीसे विवाह किया और उसके गर्भसे उन्हें महाभौम नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।। १९ ।।
महाभौमः खलु प्रासेनजितीमुपयेमे सुयज्ञा नाम । तस्यामस्य जज्ञे अयुतनायी; यः पुरुषमेधानामयुतमानयत्, तेनास्यायुतनायित्वम् ।। २० ।।
महाभौमने प्रसेनजित्की पुत्री सुयज्ञासे विवाह किया। उसके गर्भसे उन्हें अयुतनायी नामक पुत्र प्राप्त हुआ; जिसने दस हजार पुरुषमेध 'यज्ञ' किये। अयुत यज्ञोंका आनयन (अनुष्ठान) करनेके कारण ही उनका नाम अयुतनायी हुआ ।। २० ।।
अयुतनायी खलु पृथुश्रवसो दुहितरमुपयेमे कामां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अक्रोधनः ।। २१ ।।
अयुतनायीने पृथुश्रवाकी पुत्री कामासे विवाह किया, जिसके गर्भसे अक्रोधनका जन्म हुआ ।। २१ ।।
स खलु कालिङ्गीं करम्भां नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे देवातिथिः ।। २२ ।। अक्रोधनने कलिंगदेशकी राजकुमारी करम्भासे विवाह किया। जिसके गर्भसे उनके देवातिथि नामक पुत्रका जन्म हुआ ।। २२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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