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#इक बार कहो तुम मेरी हो।
इक बार कहो तुम मेरी हो। - हम घूम चुके बस्ती-बन में फाँस लिए मन में इक आस का कोई साजन हो, कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अंधेरी हो कहो तुम मेरी हो। इक बार छाए हों जब सावन बादल जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो कहो तुम मेरी हो। इक बार हाँ दिल का दामन फैला है क्यों गोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोखे में तक दूर झरोखे में तुम कब दीद से दिल की सेरी हो q कहो तुम मेरी हो। 325 ~R झगड़ा सूद ख़सारे का क्या ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया , दुनिया ले जाए ப7=-3=7 " I हम घूम चुके बस्ती-बन में फाँस लिए मन में इक आस का कोई साजन हो, कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अंधेरी हो कहो तुम मेरी हो। इक बार छाए हों जब सावन बादल जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो कहो तुम मेरी हो। इक बार हाँ दिल का दामन फैला है क्यों गोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोखे में तक दूर झरोखे में तुम कब दीद से दिल की सेरी हो q कहो तुम मेरी हो। 325 ~R झगड़ा सूद ख़सारे का क्या ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया , दुनिया ले जाए ப7=-3=7 " I - ShareChat