#जय श्री कृष्ण
एक बार सत्यभामा ने जिज्ञासा से रुक्मिणी से पूछा —
“दीदी, क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि श्रीकृष्ण बार-बार द्रौपदी के पास क्यों जाते हैं? ऐसा तो कोई साधारण भाई-बहन के रिश्ते में भी नहीं होता… मुझे तो कुछ रहस्य लगता है।”🚩
रुक्मिणी मुस्कुराईं और बोलीं —
“तुम व्यर्थ के संदेह में मत पड़ो, यह संबंध बहुत पवित्र है।”
लेकिन सत्यभामा के मन में यह बात बैठ गई।
कुछ समय बाद जब श्रीकृष्ण कहीं जाने लगे, तो सत्यभामा ने पूछा “प्रभु, आप कहाँ जा रहे हैं?”
श्रीकृष्ण ने सहज भाव से कहा मैं द्रौपदी से मिलने जा रहा हूँ।” यह सुनते ही सत्यभामा का संदेह और बढ़ गया। उन्होंने तुरंत रुक्मिणी से कहा —🚩
“देखा दीदी, फिर वही!”
तब श्रीकृष्ण ने दोनों से कहा —
“यदि चाहो तो तुम भी मेरे साथ चल सकती हो।”
दोनों तैयार हो गईं।
जब वे द्रौपदी के महल पहुँचीं, तो देखा कि द्रौपदी अपने केश सजा रही थीं। श्रीकृष्ण ने हँसते हुए कहा —
“अरे द्रौपदी, आज तुम्हारी भाभियाँ आई हैं, अब ये ही तुम्हारे केश संवारेंगी।”
फिर उन्होंने सत्यभामा से कहा —
“तुम इनके बालों में तेल लगाओ,”
और रुक्मिणी से —
“तुम चोटी बना दो।”
सत्यभामा मन ही मन सोचने लगीं —
“आज मौका मिला है, देखती हूँ इसका अभिमान कैसे टूटता है।”
जैसे ही उन्होंने द्रौपदी के बालों में हाथ लगाया और एक बाल खींचा, उसी क्षण धीमी सी आवाज आई —
“हे कृष्ण…”
उन्होंने फिर दूसरा बाल खींचा —
“हे कृष्ण…”
तीसरी बार भी वही हुआ —
“हे कृष्ण…”
अब सत्यभामा चौंक गईं। उन्होंने रुक्मिणी से कहा —
“दीदी, यह क्या रहस्य है? हर बार बाल छूने पर कृष्ण का नाम क्यों सुनाई देता है?”🚩
रुक्मिणी भी आश्चर्य में थीं।
तभी पीछे से श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले —
“सत्यभामा, तुम यही जानना चाहती थीं ना कि मैं द्रौपदी के पास बार-बार क्यों आता हूँ?”
उन्होंने आगे कहा —🚩
“इस पृथ्वी पर ऐसा कोई नहीं जो दिन-रात इतनी भक्ति में लीन हो। द्रौपदी का हर श्वास, हर रोम मेरा नाम जपता है। उनका मन, वचन और शरीर — सब मुझमें ही रमा हुआ है। इसलिए मैं स्वयं उनके पास खिंचा चला आता हूँ।”
फिर श्रीकृष्ण बोले —🚩
“सच्चा स्नान केवल जल से नहीं होता…
जब मनुष्य अपने हर रोम में भगवान का स्मरण कर लेता है, तभी वह वास्तविक ‘स्नान’ कहलाता है।”
🌼 संदेश (Moral)
सिर्फ शरीर को साफ करना ‘नहाना’ है,
लेकिन मन और आत्मा को भगवान के नाम में डुबो देना ही असली ‘स्नान’ है।
🙏 जय श्री राधे कृष्णा


