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गज़ल #✒ शायरी
✒ शायरी - মড়াল वफाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी 3[ 305" मुझको अपने घर जाने की जल्दी थी मगर इस बार था कि मैं कुछ देर तूफां = IHC इरादा मगर बेचारे दरिया को उतर जाने की जल्दी थी मैं अपनी मुट्ठियों में क़ैद कर लेता ज़मीनों को मगर मेरे कबीले को बिखर की जल्दी थी जाने मैं आखिर कौनसा मौसम नाम कर देता तुम्हारे  यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी वो शाखों से जुदा होते हुए पत्तों पे हँसते थे बड़े जिंदा ्नज़र थे जिनको मर जाने की जल्दी थी मैं साबित किस तरह करता कि हर आईना झूठा है कई कम-्जर्फ चेहरों को उतर जाने की जल्दी थी Moiivational Vicleos Appl Want মড়াল वफाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी 3[ 305" मुझको अपने घर जाने की जल्दी थी मगर इस बार था कि मैं कुछ देर तूफां = IHC इरादा मगर बेचारे दरिया को उतर जाने की जल्दी थी मैं अपनी मुट्ठियों में क़ैद कर लेता ज़मीनों को मगर मेरे कबीले को बिखर की जल्दी थी जाने मैं आखिर कौनसा मौसम नाम कर देता तुम्हारे  यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी वो शाखों से जुदा होते हुए पत्तों पे हँसते थे बड़े जिंदा ्नज़र थे जिनको मर जाने की जल्दी थी मैं साबित किस तरह करता कि हर आईना झूठा है कई कम-्जर्फ चेहरों को उतर जाने की जल्दी थी Moiivational Vicleos Appl Want - ShareChat