"दिल-ए-बहार"
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एक दिन सँवरकर के,
निकले जो बाहर को...
और ऐसे ही फिर,
यूँ दिख आया कोई!
कभी-कभी साथ हुए,
तो कभी पास हुए...
कुछ हौले से ही,
फिर समझ आया कोई!
कुछ दूर जाकर ही,
कुछ ऐसी बात हुई...
पलटकर के देख यूँ,
फिर से शर्माया कोई!
फिर कुछ फसाने हुए,
और कुछ इशारे हुए...
समझकर बात फिर,
अपनेआप में इतराया कोई!
कभी नजाकत दिखे,
तो कभी अदावत दिखे...
उलझाकर बेखुदी मे ही,
फिर से इठलाया कोई!
कदम-कदम चलने लगे,
यूँ ही नासमझ बन....
चोरी-चोरी ही फिर से,
पीछे-पीछे आया कोई!
बहुत गौर से देखा जब,
कोई नजर ना आया...
बड़े धीमे से ही फिर,
कहीं से मुस्कुराया कोई!
समझे की शायद वही,
अनजानी सी बात है...
तभी सामने जोरों से ही,
एकाएक खिलखिलाया कोई!
सच इस दिल को भी...
गुदगुदा यूँ भाया कोई!!💕💞
...........✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
🌳🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳🌳
#🌹प्यार के नगमे💖 #❤️ आई लव यू #💔पुराना प्यार 💔 #💝 शायराना इश्क़ #❤️Love You ज़िंदगी ❤️


