#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣5️⃣0️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डु का कुन्ती को पुत्र-प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने का आदेश...(दिन 352)
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वैशम्पायन उवाच
तत्रापि तपसि श्रेष्ठे वर्तमानः स वीर्यवान् । सिद्धचारणसङ्घानां बभूव प्रियदर्शनः ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! वहाँ भी श्रेष्ठ तपस्यामें लगे हुए पराक्रमी राजा पाण्डु सिद्ध और चारणोंके समुदायको अत्यन्त प्रिय लगने लगे- इन्हें देखते ही वे प्रसन्न हो जाते थे ।। १ ।।
शुश्रूषुरनहंवादी संयतात्मा जितेन्द्रियः । स्वर्गं गन्तुं पराक्रान्तः स्वेन वीर्येण भारत ।। २ ।।
भारत ! वे ऋषि-मुनियोंकी सेवा करते, अहंकारसे दूर रहते और मनको वशमें रखते थे। उन्होंने सम्पूर्ण इन्द्रियोंको जीत लिया था। वे अपनी ही शक्तिसे स्वर्गलोकमें जानेके लिये सदा सचेष्ट रहने लगे ।। २ ।।
केषांचिदभवद् भ्राता केषांचिदभवत् सखा । ऋषयस्त्वपरे चैनं पुत्रवत् पर्यपालयन् ।। ३ ।।
कितने ही ऋषियोंका उनपर भाईके समान प्रेम था। कितनोंके वे मित्र हो गये थे और दूसरे बहुत-से महर्षि उन्हें अपने पुत्रके समान मानकर सदा उनकी रक्षा करते थे ।। ३ ।।
स तु कालेन महता प्राप्य निष्कल्मषं तपः । ब्रह्मर्षिसदृशः पाण्डुर्बभूव भरतर्षभ ।। ४ ।।
भरतश्रेष्ठ जनमेजय ! राजा पाण्डु दीर्घकालतक पापरहित तपस्याका अनुष्ठान करके ब्रह्मर्षियोंके समान प्रभावशाली हो गये थे ।। ४ ।।
अमावास्यां तु सहिता ऋषयः संशितव्रताः । ब्रह्माणं द्रष्टुकामास्ते सम्प्रतस्थुर्महर्षयः ।। ५ ।।
एक दिन अमावास्या तिथिको कठोर व्रतका पालन करनेवाले बहुत-से ऋषि-महर्षि एकत्र हो ब्रह्माजीके दर्शनकी इच्छासे ब्रह्मलोकके लिये प्रस्थित हुए ।। ५ ।।
सम्प्रयातानृषीन् दृष्ट्वा पाण्डुर्वचनमब्रवीत् । भवन्तः क्व गमिष्यन्ति ब्रूत मे वदतां वराः ।। ६ ।।
ऋषियोंको प्रस्थान करते देख पाण्डुने उनसे पूछा- 'वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वरो ! आपलोग कहाँ जायेंगे? यह मुझे बताइये' ।। ६ ।।
ऋषय ऊचुः
समवायो महानद्य ब्रह्मलोके महात्मनाम् । देवानां च ऋषीणां च पितॄणां च महात्मनाम् । वयं तत्र गमिष्यामो द्रष्टुकामाः स्वयम्भुवम् ।। ७ ।।
ऋषि बोले- राजन् ! आज ब्रह्मलोकमें महात्मा देवताओं, ऋषि-मुनियों तथा महामना पितरोंका बहुत बड़ा समूह एकत्र होनेवाला है। अतः हम वहीं स्वयम्भू ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये जायेंगे ।। ७ ।।
वैशम्पायन उवाच
पाण्डुरुत्थाय सहसा गन्तुकामो महर्षिभिः । स्वर्गपारं तितीर्षुः स शतशृङ्गादुदङ्मुखः ।। ८ ।।
प्रतस्थे सह पत्नीभ्यामब्रुवंस्तं च तापसाः ।
उपर्युपरि गच्छन्तः शैलराजमुदङ्मुखाः ।। ९ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन्! यह सुनकर महाराज पाण्डु भी महर्षियोंके साथ जानेके लिये सहसा उठ खड़े हुए। उनके मनमें स्वर्गके पार जानेकी इच्छा जाग उठी और वे उत्तरकी ओर मुँह करके अपनी दोनों पत्नियोंके साथ शतशृंग पर्वतसे चल दिये। यह देख गिरिराज हिमालयके ऊपर-ऊपर उत्तराभिमुख यात्रा करनेवाले तपस्वी मुनियोंने कहा ।। ८-९ ।।
दृष्टवन्तो गिरौ रम्ये दुर्गान् देशान् बहून् वयम् । विमानशतसम्बाधां गीतस्वरनिनादिताम् ।। १० ।।
आक्रीडभूमिं देवानां गन्धर्वाप्सरसां तथा । उद्यानानि कुबेरस्य समानि विषमाणि च ।। ११ ।।
'भरतश्रेष्ठ! इस रमणीय पर्वतपर हमने बहुत से ऐसे प्रदेश देखे हैं, जहाँ जाना बहुत कठिन है। वहाँ देवताओं, गन्धवों तथा अप्सराओंकी क्रीड़ाभूमि है, जहाँ सैकड़ों विमान खचाखच भरे रहते हैं और मधुर गीतोंके स्वर गूंजते रहते हैं। इसी पर्वतपर कुबेरके अनेक उद्यान हैं, जहाँकी भूमि कहीं समतल है और कहीं नीची-ऊँची ।। १०-११ ।।
महानदीनितम्बांश्च गहनान् गिरिगह्वरान् । सन्ति नित्यहिमा देशा निर्वृक्षमृगपक्षिणः ।। १२ ।।
'इस मार्गमें हमने कई बड़ी-बड़ी नदियोंके दुर्गम तट और कितनी ही पर्वतीय घाटियाँ देखी हैं। यहाँ बहुत-से ऐसे स्थल हैं, जहाँ सदा बर्फ जमी रहती है तथा जहाँ वृक्ष, पशु और पक्षियोंका नाम भी नहीं है ।। १२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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