कर्म (साधना-पथ) को साधक के स्वभाव में उपलब्ध क्षमता के अनुसार चार भागों में बांटा गया है। कर्म को समझकर मनुष्य जब से आरम्भ करता है, उस आरम्भिक अवस्था में वह शूद्र है। क्रमशः विधि पकड़ आयी तो भी वैश्य है। प्रकृति के संघर्ष को झेलने की क्षमता और शौर्य आने पर वही व्यक्ति क्षत्रिय है और ब्रह्म के तद्रूप होने की क्षमता - ज्ञान(वास्तविक जानकारी), विज्ञान (ईश्वरीय वाणी का मिलन), उस अस्तित्व पर निर्भर रहने की क्षमता ऐसी योग्यताओं के आने पर वही ब्राह्मण है।
श्रीमद्भगवद्गीता: यथार्थ गीता/उपशम
स्वामी अड़गड़ानन्द जी
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