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कलाम अल्लाज मंसूर #सूफी काव्य
सूफी काव्य - "কলাম" ऐ सर्व-एन्नाज़ रौनक़ एन्बुस्तान एन्मा तुई ऐ नूर एनदीदः शम ए॰ -शबिस्तान एन्मा तुई ऐ सर्व-एन्नाज़ हमारे बाग़ की रौनक़ तू ही है हमारी शबि स्ताँ की शम्अ का रंग और रौग़न तू ही है अज़ बार-ए-ग़म चे ग़म चु तुई दस्तगीर एन्मा अज़ दर्द-एनदिल चे बाक चु दर्मान ए॰मा तुई दस्तगीर है तो बार-ए ग़म का क्या डर Jq76HRI तू ख़ुद इ॰्लाज है तो मुझे दर्द ए॰दि ल का क्या डर Uq मा रा बर आँ चे हुक्म कुनी ए॰तिराज़ नीस्त मा बन्दःऐम हाकिम ओ सुल्तान ए॰मा तुई तू मुझे जो भी हुक्म दे मुझे उस पर क्या ए॰्तराज़ कि मैं बंदा हूँ और तू मेरा सुल्ता न॰ओ ्हाकि म है कुंज ए-दिल ए-' हुसैन' न-शुद जा-एन्हेच कस मानिन्द एन्गंज दर दिल ए॰्वीरान ए॰मा तुई के दि ल में कोई मकीन नहीं हो सकता हुसैन हमारे वीरान दि ल में तू ख़ज़ाने की तरह है (अल्लाज मंसूर) Motivational VideosApp Want "কলাম" ऐ सर्व-एन्नाज़ रौनक़ एन्बुस्तान एन्मा तुई ऐ नूर एनदीदः शम ए॰ -शबिस्तान एन्मा तुई ऐ सर्व-एन्नाज़ हमारे बाग़ की रौनक़ तू ही है हमारी शबि स्ताँ की शम्अ का रंग और रौग़न तू ही है अज़ बार-ए-ग़म चे ग़म चु तुई दस्तगीर एन्मा अज़ दर्द-एनदिल चे बाक चु दर्मान ए॰मा तुई दस्तगीर है तो बार-ए ग़म का क्या डर Jq76HRI तू ख़ुद इ॰्लाज है तो मुझे दर्द ए॰दि ल का क्या डर Uq मा रा बर आँ चे हुक्म कुनी ए॰तिराज़ नीस्त मा बन्दःऐम हाकिम ओ सुल्तान ए॰मा तुई तू मुझे जो भी हुक्म दे मुझे उस पर क्या ए॰्तराज़ कि मैं बंदा हूँ और तू मेरा सुल्ता न॰ओ ्हाकि म है कुंज ए-दिल ए-' हुसैन' न-शुद जा-एन्हेच कस मानिन्द एन्गंज दर दिल ए॰्वीरान ए॰मा तुई के दि ल में कोई मकीन नहीं हो सकता हुसैन हमारे वीरान दि ल में तू ख़ज़ाने की तरह है (अल्लाज मंसूर) Motivational VideosApp Want - ShareChat