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।। ॐ ।। यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।। जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में मुझ परमात्मा को देखता है, व्याप्त देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ परमात्मा के ही अन्तर्गत देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। यह प्रेरक का आमने-सामने मिलन है, सख्यभाव है, सामीप्य मुक्ति है। #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
यथार्थ गीता - || 3 | | यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति। | में मुझ परमात्मा को जो पुरुष भूतों সম্পুত  देखता है, व्याप्त देखता है और सम्पूर्ण भूतों परमात्मा के ही अन्तर्गत देखता है, को मुझ  उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। यह प्रेरक का आमने सामने मिलन है, सख्यभाव है सामीप्य मुक्ति है। || 3 | | यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति। | में मुझ परमात्मा को जो पुरुष भूतों সম্পুত  देखता है, व्याप्त देखता है और सम्पूर्ण भूतों परमात्मा के ही अन्तर्गत देखता है, को मुझ  उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। यह प्रेरक का आमने सामने मिलन है, सख्यभाव है सामीप्य मुक्ति है। - ShareChat