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#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣8️⃣3️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्विनवतितमोऽध्यायः अष्टक-ययाति-संवाद और ययाति द्वारा दूसरों के दिये हुए पुण्य दान को अस्वीकार करना...(दिन 283) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अष्टक उवाच पृच्छामि त्वां मा प्रपत प्रपातं यदि लोकाः पार्थिव सन्ति मेऽत्र । यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि स्थिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ।। ९ ।। अष्टक बोले- महाराज ! मेरा विश्वास है कि आप पारलौकिक धर्मके ज्ञाता हैं। मैं आपसे एक बात पूछता हूँ-क्या अन्तरिक्ष या स्वर्गलोकमें मुझे प्राप्त होनेवाले पुण्यलोक भी हैं? यदि हों तो (उनके प्रभावसे) आप नीचे न गिरें, आपका पतन न हो ।। ९ ।। ययातिरुवाच यावत् पृथिव्यां विहितं गवाश्वं सहारण्यैः पशुभिः पार्वतैश्च । तावल्लोका दिवि ते संस्थिता वै तथा विजानीहि नरेन्द्रसिंह ।। १० ।। ययातिने कहा- नरेन्द्रसिंह! इस पृथ्वीपर जंगली और पर्वतीय पशुओंके साथ जितने गाय, घोड़े आदि पशु रहते हैं, स्वर्गमें तुम्हारे लिये उतने ही लोक विद्यमान हैं। तुम इसे निश्चय जानो ।। १० ।। अष्टक उवाच तांस्ते ददामि मा प्रपत प्रपातं ये मे लोका दिवि राजेन्द्र सन्ति । यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः ।। ११ ।। अष्टक बोले- राजेन्द्र ! स्वर्गमें मेरे लिये जो लोक विद्यमान हैं, वे सब आपको देता हूँ; परंतु आपका पतन न हो। अन्तरिक्ष या द्युलोकमें मेरे लिये जो स्थान हैं, उनमें आप शीघ्र ही मोहरहित होकर चले जायें ।। ११ ।। ययातिरुवाच नास्मद्विधो ब्राह्मणो ब्रह्मविच्च प्रतिग्रहे वर्तते राजमुख्य । यथा प्रदेयं सततं द्विजेभ्य-स्तथाददं पूर्वमहं नरेन्द्र ।। १२ ।। ययातिने कहा-नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण ही प्रतिग्रह लेता है। मेरे-जैसा क्षत्रिय कदापि नहीं। नरेन्द्र ! जैसे दान करना चाहिये, उस विधिसे पहले मैंने भी सदा उत्तम ब्राह्मणोंको बहुत दान दिये हैं ।। १२ ।। नाब्राह्मणः कृपणो जातु जीवेद् याच्ञापि स्याद् ब्राह्मणी वीरपत्नी । सोऽहं नैवाकृतपूर्वं चरेयं विधित्समानः किमु तत्र साधु ।। १३ ।। जो ब्राह्मण नहीं है, उसे दीन याचक बनकर कभी जीवन नहीं बिताना चाहिये। याचना तो विद्यासे दिग्विजय करनेवाले विद्वान् ब्राह्मणकी पत्नी है अर्थात् ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणको ही याचना करनेका अधिकार है। मुझे उत्तम सत्कर्म करनेकी इच्छा है; अतः ऐसा कोई कार्य कैसे कर सकता हूँ, जो पहले कभी नहीं किया हो ।। १३ ।। प्रतर्दन उवाच पृच्छामि त्वां स्पृहणीयरूप प्रतर्दनोऽहं यदि मे सन्ति लोकाः । यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ।। १४ ।। प्रतर्दन बोले- वांछनीय रूपवाले श्रेष्ठ पुरुष! मैं प्रतर्दन हूँ और आपसे पूछता हूँ, यदि अन्तरिक्ष अथवा स्वर्गमें मेरे भी लोक हों तो बताइये। मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ।। १४ ।। ययातिरुवाच सन्ति लोका बहवस्ते नरेन्द्र अप्येकैकः सप्तसप्ताप्यहानि । मधुच्युतो घृतपृक्ता विशोका-स्ते नान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति ।। १५ ।। ययातिने कहा- नरेन्द्र ! आपके तो बहुत लोक हैं, यदि एक-एक लोकमें सात-सात दिन रहा जाय तो भी उनका अन्त नहीं है। वे सब-के-सब अमृतके झरने बहाते हैं एवं घृत (तेज) से युक्त हैं। उनमें शोकका सर्वथा अभाव है। वे सभी लोक आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ।। १५ ।। प्रतर्दन उवाच तांस्ते ददानि मा प्रपत प्रपातं ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु । यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः ।। १६ ।। प्रतर्दन बोले- महाराज! वे सभी लोक मैं आपको देता हूँ, आप नीचे न गिरें। जो मेरे लोक हैं वे सब आपके हो जायें। वे अन्तरिक्षमें हों या स्वर्गमें, आप शीघ्र मोहरहित होकर उनमें चले जाइये ।। १६ ।। ययातिरुवाच न तुल्यतेजाः सुकृतं कामयेत योगक्षेमं पार्थिव पार्थिवः सन् । दैवादेशादापदं प्राप्य विद्वां-श्चरेन्नृशंसं न हि जातु राजा ।। १७ ।। ययातिने कहा- राजन् ! कोई भी राजा समान तेजस्वी होकर दूसरेसे पुण्य तथा योग-क्षेमकी इच्छा न करे। विद्वान् राजा दैववश भारी आपत्तिमें पड़ जानेपर भी कोई पापमय कार्य न करे ।। १७ ।। धर्म्य मार्ग यतमानो यशस्यं कुर्यान्नृपो धर्ममवेक्षमाणः । न मद्विधो धर्मबुद्धिः प्रजानन् कुर्यादेवं कृपणं मां यथाऽऽत्थ ।। १८ ।। धर्मपर दृष्टि रखनेवाले राजाको उचित है कि वह प्रयत्नपूर्वक धर्म और यशके मार्गपर ही चले। जिसकी बुद्धि धर्ममें लगी हो उस मेरे-जैसे मनुष्यको जान-बूझकर ऐसा दीनतापूर्ण कार्य नहीं करना चाहिये, जिसके लिये आप मुझसे कह रहे हैं ।। १८ ।। कुर्यादपूर्व न कृतं यदन्यै-र्विधित्समानः किमु तत्र साधु । (धर्माधर्मों सुविनिश्चित्य सम्यक् कार्याकार्येष्वप्रमत्तश्चरेद् यः । स वै धीमान् सत्यसन्धः कृतात्मा राजा भवेल्लोकपालो महिम्ना ।। यदा भवेत् संशयो धर्मकार्ये कामार्थे वा यत्र विन्दन्ति सम्यक् । कार्य तत्र प्रथमं धर्मकार्य न तौ कुर्यादर्थकामौ स धर्मः ।।) ब्रुवाणमेनं नृपतिं ययातिं नृपोत्तमो वसुमानब्रवीत् तम् ।। १९ ।। जो शुभ कर्म करनेकी इच्छा रखता है, वह ऐसा काम नहीं कर सकता, जिसे अन्य राजाओंने नहीं किया हो। जो धर्म और अधर्मका भलीभाँति निश्चय करके कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें सावधान होकर विचरता है, वही राजा बुद्धिमान्, सत्यप्रतिज्ञ और मनस्वी है। वह अपनी महिमासे लोकपाल होता है। जब धर्मकार्यमें संशय हो अथवा जहाँ न्यायतः काम और अर्थ दोनों आकर प्राप्त हों, वहाँ पहले धर्मकार्यका ही सम्पादन करना चाहिये, अर्थ और कामका नहीं। यही धर्म है। इस प्रकारकी बातें कहनेवाले राजा ययातिसे नृपश्रेष्ठ वसुमान् बोले ।। १९ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते द्विनवतितमोऽध्यायः ।।९२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक बानबेवॉअध्याय पूरा हुआ ।। ९२ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत
महाभारत - श्रीमहाभाखतमू श्रीमहाभाखतमू - ShareChat