श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
चतुर्नवतितमोऽध्यायः
पूरुवंश का वर्णन...(दिन 289)
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जनमेजय उवाच
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पूरोर्वंशकरान् नृपान् । यद्वीर्यान् यादृशांश्चापि यावतो यत्पराक्रमान् ।। १ ।।
जनमेजय बोले- भगवन ! अब मैं पूरुके वंशका विस्तार करनेवाले राजाओंका परिचय सुनना चाहता हूँ। उनका बल और पराक्रम कैसा था? वे कैसे और कितने थे? ।। १ ।।
न ह्यस्मिन् शीलहीनो वा निर्वीर्यो वा नराधिपः । प्रजाविरहितो वापि भूतपूर्वः कथंचन ।। २ ।।
मेरा विश्वास है कि इस वंशमें पहले कभी किसी प्रकार भी कोई ऐसा राजा नहीं हुआ है, जो शीलरहित, बल-पराक्रमसे शून्य अथवा संतानहीन रहा हो ।। २ ।।
तेषां प्रथितवृत्तानां राज्ञां विज्ञानशालिनाम् ।
चरितं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण तपोधन ।। ३ ।।
तपोधन ! जो अपने सदाचारके लिये प्रसिद्ध और विवेकसम्पन्न थे, उन सभी पूरुवंशी राजाओंके चरित्रको मुझे विस्तारपूर्वक सुननेकी इच्छा है ।। ३ ।।
वैशम्पायन उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि । पूरोर्वशधरान् वीराञ्छक्रप्रतिमतेजसः । भूरिद्रविणविक्रान्तान् सर्वलक्षणपूजितान् ।। ४ ।।
वैशम्पायनजीने कहा- जनमेजय ! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा। पूरुके वंशमें उत्पन्न हुए वीर नरेश इन्द्रके समान तेजस्वी, अत्यन्त धनवान्, परम पराक्रमी तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्मानित थे (उन सबका परिचय देता हूँ) ।। ४ ।।
प्रवीरेश्वररौद्राश्वास्त्रयः पुत्रा महारथाः ।
पूरोः पौष्ट्यामजायन्त प्रवीरो वंशकृत् ततः ।। ५ ।।
पूरु के पौष्टी नामक पत्नी के गर्भ से प्रवीर, ईश्वर तथा रौद्राश्व नामक तीन महारथी पुत्र हुए। इनमेंसे प्रवीर अपनी वंश-परम्पराको आगे बढ़ानेवाले हुए ।। ५ ।।
मनस्युरभवत् तस्माच्छूरसेनीसुतः प्रभुः । पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता राजीवलोचनः ।। ६ ।।
प्रवीरके पुत्रका नाम मनस्यु था, जो शूरसेनीके पुत्र और शक्तिशाली थे। कमलके समान नेत्रवाले मनस्युने चारों समुद्रोंसे घिरी हुई समस्त पृथ्वीका पालन किया ।। ६ ।।
शक्तः संहननो वाग्मी सौवीरीतनयास्त्रयः । मनस्योरभवन् पुत्राः शूराः सर्वे महारथाः ।। ७ ।।
मनस्युके सौवीरीके गर्भसे तीन पुत्र हुए- शक्त, संहनन और वाग्मी। वे सभी शूरवीर और महारथी थे ।। ७ ।।
अन्वग्भानुप्रभृतयो मिश्रकेश्यां मनस्विनः । रौद्राश्वस्य महेष्वासा दशाप्सरसि सूनवः ।। ८ ।।
यज्वानो जज्ञिरे शूराः प्रजावन्तो बहुश्रुताः । सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपरायणाः ।। ९ ।।
पूरुके तीसरे पुत्र मनस्वी रौद्राश्वके मिश्रकेशी अप्सराके गर्भसे अन्वग्भानु आदि दस महाधनुर्धर पुत्र हुए, जो सभी यज्ञकर्ता, शूरवीर, संतानवान्, अनेक शास्त्रोंके विद्वान, सम्पूर्ण अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा धर्मपरायण थे ।। ८-९ ।।
ऋचेयुरथ कक्षेयुः कृकणेयुश्च वीर्यवान् । स्थण्डिलेयुर्वनेयुश्च जलेयुश्च महायशाः ।। १० ।।
तेजेयुर्बलवान् धीमान् सत्येयुश्चेन्द्रविक्रमः । धर्मेयुः संनतेयुश्च दशमो देवविक्रमः ।। ११ ।।
(उन सबके नाम इस प्रकार हैं-) ऋचेयु, कक्षेयु, पराक्रमी कृकणेयु, स्थण्डिलेयु, वनेयु, महायशस्वी जलेयु, बलवान् और बुद्धिमान् तेजेयु, इन्द्रके समान पराक्रमी सत्येयु, धर्मयु तथा दसवें देवतुल्य पराक्रमी संनतेयु ।। १०-११ ।।
अनाधृष्टिरभूत् तेषां विद्वान् भुवि तथैकराट् । ऋचेयुरथ विक्रान्तो देवानामिव वासवः ।। १२ ।।
ऋचेयु जिनका एक नाम अनाधृष्टि भी है, अपने सब भाइयोंमें वैसे ही विद्वान् और पराक्रमी हुए, जैसे देवताओंमें इन्द्र। वे भूमण्डलके चक्रवर्ती राजा थे ।। १२ ।।
अनाधृष्टिसुतस्त्वासीद् राजसूयाश्वमेधकृत् । मतिनार इति ख्यातो राजा परमधार्मिकः ।। १३ ।।
अनाधृष्टिके पुत्रका नाम मतिनार था। राजा मतिनार राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञ करनेवाले एवं परम धर्मात्मा थे ।। १३ ।।
मतिनारसुता राजंश्चत्वारोऽमितविक्रमाः ।
तंसुर्महानतिरथो द्रुह्युश्चाप्रतिमद्युतिः ।। १४ ।।
राजन् ! मतिनारके चार पुत्र हुए, जो अत्यन्त पराक्रमी थे। उनके नाम ये हैं-तंसु, महान्, अतिरथ और अनुपम तेजस्वी द्रुह्यु ।। १४ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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