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गज़ल #✒ शायरी
✒ शायरी - जाँ निसार अख़्तर गज़ल ஈ க1 5 बचाते   रहे তত্মান ম   ৪ম লদ্কা रहे   हैं इतने कभी 4 हम मजबूर हालात नश्शा -ए-मय से कहीं प्यास बुझी है दिल की से और तिश्नगी लाए ಹT ख़राजात 6 तो मिल के भी जैसे न मिले हों तुझ से आज থ   কম্ী   নহী {ೆಫ उठते 2 हम मुलाक़ात इश्क़   में आज भी॰  है नीम - निगाही সলন का हैं   उसी   हुस्न-ए- रिवायात करते से प्यार हम मर्कज़ -ए-दीदा - ए-ख़ुबान - ए-जहाँ हैं भी तो क्या निस्बत भी तो रखते हैं तिरी ज़ात से हम एक A99 Wani Moiivational Vicleos| जाँ निसार अख़्तर गज़ल ஈ க1 5 बचाते   रहे তত্মান ম   ৪ম লদ্কা रहे   हैं इतने कभी 4 हम मजबूर हालात नश्शा -ए-मय से कहीं प्यास बुझी है दिल की से और तिश्नगी लाए ಹT ख़राजात 6 तो मिल के भी जैसे न मिले हों तुझ से आज থ   কম্ী   নহী {ೆಫ उठते 2 हम मुलाक़ात इश्क़   में आज भी॰  है नीम - निगाही সলন का हैं   उसी   हुस्न-ए- रिवायात करते से प्यार हम मर्कज़ -ए-दीदा - ए-ख़ुबान - ए-जहाँ हैं भी तो क्या निस्बत भी तो रखते हैं तिरी ज़ात से हम एक A99 Wani Moiivational Vicleos| - ShareChat