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#जयगुरुदेव नाम प्रभु का #जयगुरुदेव
जयगुरुदेव नाम प्रभु का - কম্ালী সুনাসা ক্রী सभी जानते हैं कि कृष्ण के मित्र सुदामा बहुत गरीब थे। उनके जीवन में एक बार ऐसा समय आया कि रात में भोजन के लिए घर में कोई सामग्री नर्ही थी। बच्चे भूखे सो गए। सुदामा बर्तन टटोल रहे थे कि क्हीं कोई एक दाना ही मिल जाय। अचानक उनकी Fe एक पतीली पर पड़ी जिसमें सुबह चावल बना था उसमें दो चावल के दाने दिखाई दिए। उन्होंने भगवान का शुक्रिया अदा किया और  दोनों के भात के दानों को उसमें से निकाला, एक खुद लिया और பித दूसरा & Ru सुदामा का नियम था कि भगवान को भोग लगाकर ही कुछ ग्रहण करते उन्होंने अपने हिस्से में से आधा भात लिया और भगवान का ঘুক্কিয়া গবা কনে हुए कहा कि॰तेरी दया है कि इस समय भोग लगाने के लिए भात काएक कण तो সিল যমা | उस समय भगवान कृष्ण रुकमिणी के साथ बैठे हुए थे। सुदामा ने भोग लगाया और उधर कृष्ण ने लम्बी डकार ली। रुकमिणी ने पूछा कि भगवान आप ने तो ऐसी डकार ली जैसे खूब खाना खाया हो। कृष्ण बोले कि हां रुकमिणी आज सुदामा ने ऐसा भोग लगाया जो आज तक किसी ने नर्ही लगाया।  रुकमिणी ने कहा कि आप का मित्र सुदामा तो बहुत गरीब है फिर उसने  एसा भोग केसे लगा दिया कृष्ण ने जवाब दिया कि सुदामा मेरा भक्त है॰ मेरा मित्र भी॰ हे। रुकमिणी ने कहा कि॰ आप उस पर दया क्यों नही करते उसको दे दीजिए। कुछ कृष्ण ने कहा कि रुकमिणी भक्त होने के नाते सुदामा  बर्दाश्त की मुझमें ताकत मांगता है, अपनी हर स्थिति में वो मेरी मर्जी को शामिल कर लेता है और यही सोचता है कि भगवान जो करता है अच्छे के लिए ही करता है। है वो जानता है कि दुख और सुख प्रारब्ध में लिखा होता है जितस शोगसुादहा  SIT पड़ता है। इसलिए वो कोई शिकायत नर्ही करता क्योंकि भोगे बगैर कर्म काटे नर्हीजा #೧ | सुदामा मेरा मित्र है।वो मुझसे इस नाते भी कुछ नर्हीं मांगता क्योंकि वो नीतिज्ञ है और नीति यह कहती है कि मित्र से भी तभी H ச जब अपने पास कुछ देने की क्षमता हो। सुदामा जानता ২ কি বী সুপ্সর  कुछ देने की स्थिति में नर्ही हे। इसलिए मित्र होते हुए भी मेरे पास नहीं आता। কম্ালী সুনাসা ক্রী सभी जानते हैं कि कृष्ण के मित्र सुदामा बहुत गरीब थे। उनके जीवन में एक बार ऐसा समय आया कि रात में भोजन के लिए घर में कोई सामग्री नर्ही थी। बच्चे भूखे सो गए। सुदामा बर्तन टटोल रहे थे कि क्हीं कोई एक दाना ही मिल जाय। अचानक उनकी Fe एक पतीली पर पड़ी जिसमें सुबह चावल बना था उसमें दो चावल के दाने दिखाई दिए। उन्होंने भगवान का शुक्रिया अदा किया और  दोनों के भात के दानों को उसमें से निकाला, एक खुद लिया और பித दूसरा & Ru सुदामा का नियम था कि भगवान को भोग लगाकर ही कुछ ग्रहण करते उन्होंने अपने हिस्से में से आधा भात लिया और भगवान का ঘুক্কিয়া গবা কনে हुए कहा कि॰तेरी दया है कि इस समय भोग लगाने के लिए भात काएक कण तो সিল যমা | उस समय भगवान कृष्ण रुकमिणी के साथ बैठे हुए थे। सुदामा ने भोग लगाया और उधर कृष्ण ने लम्बी डकार ली। रुकमिणी ने पूछा कि भगवान आप ने तो ऐसी डकार ली जैसे खूब खाना खाया हो। कृष्ण बोले कि हां रुकमिणी आज सुदामा ने ऐसा भोग लगाया जो आज तक किसी ने नर्ही लगाया।  रुकमिणी ने कहा कि आप का मित्र सुदामा तो बहुत गरीब है फिर उसने  एसा भोग केसे लगा दिया कृष्ण ने जवाब दिया कि सुदामा मेरा भक्त है॰ मेरा मित्र भी॰ हे। रुकमिणी ने कहा कि॰ आप उस पर दया क्यों नही करते उसको दे दीजिए। कुछ कृष्ण ने कहा कि रुकमिणी भक्त होने के नाते सुदामा  बर्दाश्त की मुझमें ताकत मांगता है, अपनी हर स्थिति में वो मेरी मर्जी को शामिल कर लेता है और यही सोचता है कि भगवान जो करता है अच्छे के लिए ही करता है। है वो जानता है कि दुख और सुख प्रारब्ध में लिखा होता है जितस शोगसुादहा  SIT पड़ता है। इसलिए वो कोई शिकायत नर्ही करता क्योंकि भोगे बगैर कर्म काटे नर्हीजा #೧ | सुदामा मेरा मित्र है।वो मुझसे इस नाते भी कुछ नर्हीं मांगता क्योंकि वो नीतिज्ञ है और नीति यह कहती है कि मित्र से भी तभी H ச जब अपने पास कुछ देने की क्षमता हो। सुदामा जानता ২ কি বী সুপ্সর  कुछ देने की स्थिति में नर्ही हे। इसलिए मित्र होते हुए भी मेरे पास नहीं आता। - ShareChat