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#चाणक्य हम सबके गुरू आचार्य चाणक्य जी कहते है कि अपचन में उपवास करके केवल पानी (उबालकर ठंडा किया हुआ जल) का सेवन दवा का काम करता है, भोजन के पच जाने पर सेवन किया जल बलदायक है। भोजन के बीच में थोड़ा - थोड़ा पानी पीना भोजन के प्रति रुचि बढ़ाते हुए अमृत के समान लाभकारी (भोजन भली भांति पच जाता है) है। भोजन के तुरन्त बाद जल का सेवन विष के समान हानिकारक है।
चाणक्य - (१९) अजीर्णे भेषजं वारि, जीर्णें वारि बलप्रदम् भोजने चामृतं वारि, भोजनान्ते विषप्रदम्।। (वृद्धचाणक्य ) जलपान ~ अजीर्ण में (भोजन न करके केवल ) पानी का सेवन औषधि का काम करता है भोजन पच जाने पर ( अर्थात् भोजन के ३ घण्टे के उपरान्त ) सेवन किया हुआ जल (पाचन में बाधा उत्पन्न न करने के कारण ) बलदायक होता है भोजन के बीच में (घूँट घूँट सेवन किया हुआ ) जल 'সমপালববল্লি' স ?6, देखिए) रुचि उत्पन्न करने के कारण अमृत के समान होता है और श्लोक किया  भोजन करके तुरन्त सेवन हुआ जल (पाचकरसों को पतला करके भोजन को जल्दी महास्रोत में नीचे ले जाने के कारण ) विषसम ( अहितकर ) होता है (१९) अजीर्णे भेषजं वारि, जीर्णें वारि बलप्रदम् भोजने चामृतं वारि, भोजनान्ते विषप्रदम्।। (वृद्धचाणक्य ) जलपान ~ अजीर्ण में (भोजन न करके केवल ) पानी का सेवन औषधि का काम करता है भोजन पच जाने पर ( अर्थात् भोजन के ३ घण्टे के उपरान्त ) सेवन किया हुआ जल (पाचन में बाधा उत्पन्न न करने के कारण ) बलदायक होता है भोजन के बीच में (घूँट घूँट सेवन किया हुआ ) जल 'সমপালববল্লি' স ?6, देखिए) रुचि उत्पन्न करने के कारण अमृत के समान होता है और श्लोक किया  भोजन करके तुरन्त सेवन हुआ जल (पाचकरसों को पतला करके भोजन को जल्दी महास्रोत में नीचे ले जाने के कारण ) विषसम ( अहितकर ) होता है - ShareChat