ShareChat
click to see wallet page
search
#जय श्री कृष्ण 🌼 जब लाल जू के नन्हे चरणों ने किया महाकाय दानव का अंत: शकटासुर उद्धार की दिव्य लीला 🌼 📍 स्थान: नंदबाबा का पावन आँगन, गोकुल आज ब्रज की भूमि पर आनंद का महासागर उमड़ पड़ा था। नंदभवन में उत्सव की धूम थी। अवसर था नन्हे कान्हा के 'उठान संस्कार' (करवट बदलने की रस्म) का। पूरा गोकुल उमड़ पड़ा था अपने लाडले को आशीर्वाद देने के लिए। मंगल गीतों की गूंज, ढोल-मृदंग की थाप, गोपियों के नूपुरों की झंकार और हवा में तैरती माखन-मिश्री व पकवानों की सौंधी सुगंध... वातावरण अलौकिक था। मैया यशोदा आज फूली नहीं समा रही थीं। उत्सव की व्यस्तता बढ़ती जा रही थी। अतिथियों का तांता लगा था। मैया यशोदा ने देखा कि उनका लाला अब सो गया है। उन्होंने बड़े स्नेह से बालकृष्ण को आँगन में खड़ी एक विशाल, पुरानी लकड़ी की बैलगाड़ी (शकट) के नीचे पालने में सुला दिया। मैया ने सोचा कि बालक यहाँ धूप से बचा रहेगा और सुरक्षित आराम कर सकेगा। पर विधाता की लीला को कौन जान पाया है? उन्हें क्या पता था कि जिस गाड़ी की छांव में वे अपने जिगर के टुकड़े को सुला रही हैं, उसी में साक्षात मृत्यु छिपी बैठी है। उधर मथुरा में, पापी कंस का भय बढ़ता ही जा रहा था। बालकृष्ण को समाप्त करने के अपने कुटिल प्रयासों में, पूतना के बाद इस बार उसने एक मायावी और क्रूर दानव 'शकटासुर' को भेजा। शकटासुर के पास अदृश्य होकर किसी भी वस्तु में प्रवेश करने की आसुरी शक्ति थी। वह गोकुल पहुँचा और नंदभवन के आँगन में खड़ी उसी भारी-भरकम गाड़ी में एक प्रेत के रूप में समा गया। उसका उद्देश्य स्पष्ट था—जैसे ही अवसर मिले, इस भारी गाड़ी को बालक के ऊपर गिराकर उसका अंत कर देना। मृत्यु, लकड़ी का भेष धरकर, जीवन की प्रतीक्षा कर रही थी। कुछ समय बीता। उत्सव अपने चरम पर था। तभी नन्हे कान्हा की कमल-नयन आँखें खुलीं। बालक को भूख सताने लगी। माँ पास नहीं थीं, तो कन्हैया मचल गए और जोर-जोर से रोने लगे। उत्सव के शोर-शराबे और ढोल-नगाड़ों की आवाज़ में शिशु कृष्ण का रुदन दब गया। मैया यशोदा तक उनकी आवाज़ नहीं पहुँच सकी। जब रोने से बात न बनी, तो बालहठ में प्रभु ने अपनी कोमल टांगें हवा में चलानी शुरू कर दीं। वे रोते-रोते हाथ-पाँव पटक रहे थे। और तभी... बाल सुलभ चंचलता में फेंका गया उनका एक नन्हा-सा, रक्तिम, कमल-कोमल चरण ऊपर खड़ी उस विशाल गाड़ी के पहिये से जा टकराया। वह स्पर्श कोई साधारण स्पर्श नहीं था। वह अनंत शक्ति का प्रहार था। एक पल के लिए समय थम गया। और अगले ही क्षण, एक प्रलयकारी गड़गड़ाहट से पूरा नंदभवन थर्रा उठा। * धड़ाम! वह विशाल और भारी गाड़ी तिनकों की तरह बिखर गई। * उसके मजबूत पहिए टूटकर दूर जा गिरे। * गाड़ी का धुरा चकनाचूर हो गया। * मिट्टी के बर्तन फूट गए और सारा सामान बिखर गया। और उस मलबे के बीच, गाड़ी में छिपा शकटासुर अपने विकराल, असली रूप में प्रकट होकर ज़मीन पर आ गिरा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। भयानक धमाके से उत्सव थम गया। संगीत रुक गया। लोग बदहवास होकर आँगन की ओर दौड़े। सबसे आगे थीं मैया यशोदा। उनका कलेजा मुँह को आ गया था। अनहोनी की आशंका से कांपते हुए वे टूटी गाड़ी के मलबे के पास पहुँचीं। वहाँ का दृश्य अद्भुत था! एक ओर महाकाय असुर का शव पड़ा था, और दूसरी ओर, टूटी लकड़ियों और बिखरे सामान के बीच, बालकृष्ण शांत भाव से लेटे थे। वे अपने पैर के अंगूठे को मुँह में लेकर चूस रहे थे, मानो कुछ हुआ ही न हो। मैया यशोदा ने झपटकर अपने लाल को छाती से लगा लिया। उनकी आँखों से भय और आनंद के आँसू एक साथ बह निकले। वे बार-बार कान्हा का मुख चूमतीं, उनके अंगों को टटोलतीं कि कहीं चोट तो नहीं आई। उनका रोम-रोम ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था— "हे नारायण! मेरे लाल की रक्षा आपने ही की है।" ग्वाले, गोपियाँ और ब्रज के वृद्धजन आश्चर्य में डूबे थे। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि एक नन्हे से बालक के पैर के स्पर्श से इतनी विशाल गाड़ी कैसे टूट सकती है। कोई कहता, "यह बालक साधारण नहीं है, इसके पुण्य प्रताप ने इसकी रक्षा की।" तो कोई कहता, "निश्चित ही नंदबाबा के कुलदेवता ने आज साक्षात आकर बालक को बचाया है।" ब्रजवासी इसे देवकृपा मान रहे थे, वे नहीं जानते थे कि देवों के देव तो स्वयं उनके आँगन में खेल रहे हैं। यह केवल एक वध नहीं था, यह मुक्ति थी। शकटासुर प्रतीक है हमारे जीवन के अनावश्यक 'भार' (अहंकार और पापों की गाड़ी) का, जिसे हम ढोते रहते हैं। जब जीव भगवान के चरणों का आश्रय लेता है, या जब भगवान की कृपा का एक हल्का सा स्पर्श भी जीवन को मिलता है, तो जन्मो-जन्मों के पापों का यह भारी 'शकट' क्षण भर में चूर-चूर हो जाता है। धन्य है प्रभु की करुणा! जो उन्हें मारने आया, उसे भी उन्होंने अपने श्रीचरणों का स्पर्श देकर मोक्ष प्रदान कर दिया। बोलो बाल कृष्ण लाल की जय! 🙌
जय श्री कृष्ण - ShareChat