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#☝ मेरे विचार
☝ मेरे विचार - विज्ञान धर्मका अक्षत गुप्ता, लेखक व पौराणिक विषयों के ज्ञाता  akshat supta0204@8mail.com; होली सिर्फ रंगों का खेल नहीं , सूक्ष्म वैज्ञानिक सर्जरी' भी अक्सर हम होली को केवल हुड़दंग और गुलाल तक सीमित कर देते हैँ लेकिन अगर हम अपने प्राचीन ग्रंथों को खंगालें तो पता चलता है कि होली दरअसल ऋतु परिवर्तन के समय शरीर और मन को   रीसेट करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। हमारे शास्त्रों में होली को नवान्नेष्टि यज्ञ' कहा गया है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जब सर्दी खत्म होती है और वसंत का आगमन होता है, तो हवा में बैक्टीरिया की संख्या तेजी से बढ़ती है। जब हम होलिका दहन के चारों ओर परिक्रमा करते हैं॰ तो उस अग्नि का तापमान लगभग ५०२६० तक पहुंच जाता है। इतनी गर्मी में हमारे शरीर के रोम छिद्र खुल जाते हैं और पसीने के जरिए विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, इस दौरान अग्नि में  हवा में मौजूद सूक्ष्म कीटाणु मर  कपूर' और ` गोबर के कंडे जलाने से जाते हैं, जिससे पूरा इलाका सैनिटाइज हो जाता है। क्रोमोथैरैपी काप्राचीन रूप आयुर्वेद और ' क्रोमोथेरेपी ' (रंग चिकित्सा ) के अनुसार, रंगों का हमारे  अंतःस्रावी तंत्र पर सीधा प्रभाव पड़ता है। वसंत के समय शरीर में की अधिकता होती है जिससे आलस और सुस्ती बढ़ती है। कफ पीले और लाल रंग शरीर में ऊर्जा का संचार करते हैं और ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाते हैं समय में पलाश ( टेसू ) के फूलों का रंग पुराने इस्तेमाल होता था, जो त्वचा के रोगों के लिए सबसे अचूक दवा है। यह रंग न केवल बाहर से चढ़ता था, बल्कि त्वचा के जरिए अवशोषित होकर हमारी  बढ़ाता था। इम्युनिटी पानी और कीचड़ प्राकृतिक औषधिभी  कुछ प्राचीन ग्रंथों में होली पर मिट्टी और कीचड़ से खेलने का भी वर्णन है।  मेडिकल रिसर्च भी कहती है कि ` मड बाथ' से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है और शरीर रिलेक्स मोड में हो जाता है। होली के दौरान जब हम अपनों से मिलते हैं॰ गले लगते हैं और सामूहिक रूप से उत्सव मनाते हैं तो मस्तिष्क में ' ऑक्सीटोसिन ( लव हार्मोन ) और  डोपामाइन का स्तर बढ़ जाता है। यह तनाव को जड़ से मिटाने की एक प्राकृतिक औषधि है। संगीत और हौली का तालमेल होली के गीतों में ढोल और नगाड़ों का इस्तेमाल क्यों होता है ? दरअसल  ढोल की तेज आवाज और कंपन हमारे नसों के ब्लॉकेज खोलने में मदद करते हैं। यह एक तरह की साउंड हीलिंग है, जो हमें अवसाद से बाहर निकालती है। परपरा कासम्मान होली मनाना केवल रस्म नहीं है बल्कि पूर्वजों द्वारा  दिया गया एक   हेल्थ पैकेज' है। जब हम केमिकल प्राकृतिक रंगों और प्रेम के साथ होली मनाते  छोडकर हैं तो हम न केवल परंपरा को जीवित रखते है बल्कि शरीर और प्रकृति का भी भला करते हैं। इस कॉलम को मोबाइल पर सुनने अगली बार जब आप गुलाल छुएं तो याद रखिएगा  कि आप केवल रंग नहीं लगा रहे बल्कि खुशियों के लिए QR कोड को स्कैन करें।  और स्वास्थ्य का संचार कर रहे हैं। विज्ञान धर्मका अक्षत गुप्ता, लेखक व पौराणिक विषयों के ज्ञाता  akshat supta0204@8mail.com; होली सिर्फ रंगों का खेल नहीं , सूक्ष्म वैज्ञानिक सर्जरी' भी अक्सर हम होली को केवल हुड़दंग और गुलाल तक सीमित कर देते हैँ लेकिन अगर हम अपने प्राचीन ग्रंथों को खंगालें तो पता चलता है कि होली दरअसल ऋतु परिवर्तन के समय शरीर और मन को   रीसेट करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। हमारे शास्त्रों में होली को नवान्नेष्टि यज्ञ' कहा गया है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जब सर्दी खत्म होती है और वसंत का आगमन होता है, तो हवा में बैक्टीरिया की संख्या तेजी से बढ़ती है। जब हम होलिका दहन के चारों ओर परिक्रमा करते हैं॰ तो उस अग्नि का तापमान लगभग ५०२६० तक पहुंच जाता है। इतनी गर्मी में हमारे शरीर के रोम छिद्र खुल जाते हैं और पसीने के जरिए विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, इस दौरान अग्नि में  हवा में मौजूद सूक्ष्म कीटाणु मर  कपूर' और ` गोबर के कंडे जलाने से जाते हैं, जिससे पूरा इलाका सैनिटाइज हो जाता है। क्रोमोथैरैपी काप्राचीन रूप आयुर्वेद और ' क्रोमोथेरेपी ' (रंग चिकित्सा ) के अनुसार, रंगों का हमारे  अंतःस्रावी तंत्र पर सीधा प्रभाव पड़ता है। वसंत के समय शरीर में की अधिकता होती है जिससे आलस और सुस्ती बढ़ती है। कफ पीले और लाल रंग शरीर में ऊर्जा का संचार करते हैं और ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाते हैं समय में पलाश ( टेसू ) के फूलों का रंग पुराने इस्तेमाल होता था, जो त्वचा के रोगों के लिए सबसे अचूक दवा है। यह रंग न केवल बाहर से चढ़ता था, बल्कि त्वचा के जरिए अवशोषित होकर हमारी  बढ़ाता था। इम्युनिटी पानी और कीचड़ प्राकृतिक औषधिभी  कुछ प्राचीन ग्रंथों में होली पर मिट्टी और कीचड़ से खेलने का भी वर्णन है।  मेडिकल रिसर्च भी कहती है कि ` मड बाथ' से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है और शरीर रिलेक्स मोड में हो जाता है। होली के दौरान जब हम अपनों से मिलते हैं॰ गले लगते हैं और सामूहिक रूप से उत्सव मनाते हैं तो मस्तिष्क में ' ऑक्सीटोसिन ( लव हार्मोन ) और  डोपामाइन का स्तर बढ़ जाता है। यह तनाव को जड़ से मिटाने की एक प्राकृतिक औषधि है। संगीत और हौली का तालमेल होली के गीतों में ढोल और नगाड़ों का इस्तेमाल क्यों होता है ? दरअसल  ढोल की तेज आवाज और कंपन हमारे नसों के ब्लॉकेज खोलने में मदद करते हैं। यह एक तरह की साउंड हीलिंग है, जो हमें अवसाद से बाहर निकालती है। परपरा कासम्मान होली मनाना केवल रस्म नहीं है बल्कि पूर्वजों द्वारा  दिया गया एक   हेल्थ पैकेज' है। जब हम केमिकल प्राकृतिक रंगों और प्रेम के साथ होली मनाते  छोडकर हैं तो हम न केवल परंपरा को जीवित रखते है बल्कि शरीर और प्रकृति का भी भला करते हैं। इस कॉलम को मोबाइल पर सुनने अगली बार जब आप गुलाल छुएं तो याद रखिएगा  कि आप केवल रंग नहीं लगा रहे बल्कि खुशियों के लिए QR कोड को स्कैन करें।  और स्वास्थ्य का संचार कर रहे हैं। - ShareChat