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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - अंग राग न रंग जाकहि जाति पाति न नाम।। गर्ब गंजन दुसट भंजन दाइक काम।। मुकति हे भाई!साधारण मनुष्यों की पहचान उनके शरीर और उनके HoT रंग रूप से होती है। लेकिन परमात्मा के लिए यह सब लागृ नहीं होता। वह अशरीरी है॰ उसका कोई भौतिक ढांचा नहीं है।उसे किसी विशेष रंग (गोरा, काला, सांवला) में नहीं बांधा जा सकता। उसका किसी के प्रति कोई विशेष मोह या लगे पक्षपात नहीं है, वह सबके लिए एक समान है। दुनिया में इंसान अपनी जाति, कुल और नाम पहचाना गुरु साहब कहते हैं कि परमात्मा इन सबसे ऊपर जाता तेरा है। उसकी कोई जाति नहीं है॰ इसलिए वह किसी एक समुदाय का नहीं बल्कि सबका है। उसका कोई एक स्थायी नाम नहीं है। लोग उसे अपनी भाषा और भावना के अनुसार वाहेगुरु' कहते हैं॰ पर वह इन नामों की अल्लाहा रम% सीमा से भी परे है।इतिहास गवाह है कि जब भी किसी भाणा व्यक्ति या शक्ति ने स्वयं को ईश्वर से बड़ा माना, परमात्मा ने उसका घमंड चकनाचूर कर दिया। यह पंक्ति हमें विनम्र रहने की सीख देती है। ईश्वर केवल दयालु ही नहीं वह न्यायकारी भी है।वह संसार के मोहन्माया और जन्म ्मरण के चक्र 8, से 'मुक्ति देने वाला है।वह जीवन का अंतिम लक्ष्य है जिसे प्राप्त करके पाना शेष नहीं रहता। ईश्वर को किसी मूर्ति या रूप में सीमित न कुछ देखें। वह निर्गुण (बिना गुणों के, निराकार) भी है और सरगुण (्याय और दया के रूप में सक्रिय) भी है। अंग राग न रंग जाकहि जाति पाति न नाम।। गर्ब गंजन दुसट भंजन दाइक काम।। मुकति हे भाई!साधारण मनुष्यों की पहचान उनके शरीर और उनके HoT रंग रूप से होती है। लेकिन परमात्मा के लिए यह सब लागृ नहीं होता। वह अशरीरी है॰ उसका कोई भौतिक ढांचा नहीं है।उसे किसी विशेष रंग (गोरा, काला, सांवला) में नहीं बांधा जा सकता। उसका किसी के प्रति कोई विशेष मोह या लगे पक्षपात नहीं है, वह सबके लिए एक समान है। दुनिया में इंसान अपनी जाति, कुल और नाम पहचाना गुरु साहब कहते हैं कि परमात्मा इन सबसे ऊपर जाता तेरा है। उसकी कोई जाति नहीं है॰ इसलिए वह किसी एक समुदाय का नहीं बल्कि सबका है। उसका कोई एक स्थायी नाम नहीं है। लोग उसे अपनी भाषा और भावना के अनुसार वाहेगुरु' कहते हैं॰ पर वह इन नामों की अल्लाहा रम% सीमा से भी परे है।इतिहास गवाह है कि जब भी किसी भाणा व्यक्ति या शक्ति ने स्वयं को ईश्वर से बड़ा माना, परमात्मा ने उसका घमंड चकनाचूर कर दिया। यह पंक्ति हमें विनम्र रहने की सीख देती है। ईश्वर केवल दयालु ही नहीं वह न्यायकारी भी है।वह संसार के मोहन्माया और जन्म ्मरण के चक्र 8, से 'मुक्ति देने वाला है।वह जीवन का अंतिम लक्ष्य है जिसे प्राप्त करके पाना शेष नहीं रहता। ईश्वर को किसी मूर्ति या रूप में सीमित न कुछ देखें। वह निर्गुण (बिना गुणों के, निराकार) भी है और सरगुण (्याय और दया के रूप में सक्रिय) भी है। - ShareChat