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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - एकु नामु तारे संसास्त्ागुर परसादी पिआस्राबिनु नामै मुकति किनै नाम पाई।।पूरे " థౌ్కౌరనీ uIకే] गुरते " न মীঠা अर्थः केवल परमात्मा का 'नाम ही इस संसार रूपी सागर से पार उतारने वाला है। गुरु की कृपा से ही लगे हृदय में उस नाम के प्रति प्रेम और लगन पैदा प्रभु के होती है। बिना ' नाम' के आज तक किसी को भी (सांसारिक बंधनों और विकारों से) मुक्ति प्राप्त नहीं तेरा यह अनमोल 'नाम केवल पूर्ण गुरु के माध्यम हुई है। से ही प्राप्त किया जा सकता है; क्योंकि गैरनहम व्ह भाणा समर्थ मार्गदर्शक है, जो शिष्य की झोली नाम की दात ( उपहार ) डालता है। एकु नामु तारे संसास्त्ागुर परसादी पिआस्राबिनु नामै मुकति किनै नाम पाई।।पूरे " థౌ్కౌరనీ uIకే] गुरते " न মীঠা अर्थः केवल परमात्मा का 'नाम ही इस संसार रूपी सागर से पार उतारने वाला है। गुरु की कृपा से ही लगे हृदय में उस नाम के प्रति प्रेम और लगन पैदा प्रभु के होती है। बिना ' नाम' के आज तक किसी को भी (सांसारिक बंधनों और विकारों से) मुक्ति प्राप्त नहीं तेरा यह अनमोल 'नाम केवल पूर्ण गुरु के माध्यम हुई है। से ही प्राप्त किया जा सकता है; क्योंकि गैरनहम व्ह भाणा समर्थ मार्गदर्शक है, जो शिष्य की झोली नाम की दात ( उपहार ) डालता है। - ShareChat
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satnam waheguru ji - तीरथु तप्रु दइआ दतु दानु। जेको पावै तिल का मानुँग श्री गुरु नानक देव जी यहाँ यह समझाना चाहते हैं कि मै तेरा केवल तीर्थों पर नहाने या दान देने जैसे बाहरी भिखारी दिखावों से पूर्ण मोक्ष या ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। इनका फल बहुत सीमित है। असली फल उसे मिलता जिओ है जिसने प्रभु का नाम सुना, उस पर विश्वास किया और मन में उसके प्रति प्रेम पैदा किया। अपने हृदय के पहाडा भीतर के तीर्थ में नाम रूपी अमृत से स्नान करना ही বাল सबसे बड़ा पुण्य है। अर्थः तीर्थ स्थानों की यात्रा करना, शरीर को कष्ट देकर तप करना , पर दया दूसरों 1 बाबा करना और दान पुण्य करना ये सभी कर्म धार्मिक माने जाते हैं। लेकिन इन बाहरी कर्मों से परमात्मा की जी दरगाह में केवल तिल मात्र मान सम्मान ही मिलता है। तीरथु तप्रु दइआ दतु दानु। जेको पावै तिल का मानुँग श्री गुरु नानक देव जी यहाँ यह समझाना चाहते हैं कि मै तेरा केवल तीर्थों पर नहाने या दान देने जैसे बाहरी भिखारी दिखावों से पूर्ण मोक्ष या ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। इनका फल बहुत सीमित है। असली फल उसे मिलता जिओ है जिसने प्रभु का नाम सुना, उस पर विश्वास किया और मन में उसके प्रति प्रेम पैदा किया। अपने हृदय के पहाडा भीतर के तीर्थ में नाम रूपी अमृत से स्नान करना ही सबसे बड़ा पुण्य है। अर्थः तीर्थ स्थानों की यात्रा करना, शरीर को कष्ट देकर तप करना , पर दया दूसरों 1 बाबा करना और दान पुण्य करना ये सभी कर्म धार्मिक माने जाते हैं। लेकिन इन बाहरी कर्मों से परमात्मा की जी दरगाह में केवल तिल मात्र मान सम्मान ही मिलता है। - ShareChat
#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana #Eek Tu Hi Guru Ji
satnam waheguru ji - खामोशी लेगी बदला मेरा मैने कभी भी अपनी जिंदगी को अहमियत नही मेरा अपना बोला उनको दी बल्कि जो भी मुझको दी..!! वह सभी मेरी जिन्दगी के उस हिस्से को जानते है जो उन्होंने देखा लेकिन मेरी अंदरूनी घुटन और संघर्षों का गवाह सिर्फ में आप ही हूं..!! अब तो किसी को कुछ भी हो जाए बस सिर्फ मौन और शांति को अपना लिया है जो यह मेरे बिखरे हुए जीवन की एक सबसे बड़ी मरहम के सम्मान है..!! मैने पूरी जिंदगी इस इंतजार में गुजार दी कि कोई मेरे जैसा ही आएगा और मुझको संभालेगा। लेकिन सच यह है कि जिन्दगी के अकेले सफर में मेरे खुद से बेहतर हमदर्द और कोई नहीं होे सकता, जब कोई न हो, तो खुद के লিব ' में वह सहारा बना जिसकी तलाश में सदा में कर रहा था..!! शिकायतें अब किसी से दूसरों नहीं रही, क्योंकि मैंने समझ लिया है कि उम्मीदें गैरों से नहीं, खुद की खुद से ही पूरी होनी चाहिए। के कंधों पर रखे बोझ ने मेरी दूसरों अपनी उड़ान रोक रखी थी॰ अब अपने जीवन में अकेला हूँ तो अपने आप को हल्का महसूस ٤٠٠ करता खामोशी लेगी बदला मेरा मैने कभी भी अपनी जिंदगी को अहमियत नही मेरा अपना बोला उनको दी बल्कि जो भी मुझको दी..!! वह सभी मेरी जिन्दगी के उस हिस्से को जानते है जो उन्होंने देखा लेकिन मेरी अंदरूनी घुटन और संघर्षों का गवाह सिर्फ में आप ही हूं..!! अब तो किसी को कुछ भी हो जाए बस सिर्फ मौन और शांति को अपना लिया है जो यह मेरे बिखरे हुए जीवन की एक सबसे बड़ी मरहम के सम्मान है..!! मैने पूरी जिंदगी इस इंतजार में गुजार दी कि कोई मेरे जैसा ही आएगा और मुझको संभालेगा। लेकिन सच यह है कि जिन्दगी के अकेले सफर में मेरे खुद से बेहतर हमदर्द और कोई नहीं होे सकता, जब कोई न हो, तो खुद के লিব ' में वह सहारा बना जिसकी तलाश में सदा में कर रहा था..!! शिकायतें अब किसी से दूसरों नहीं रही, क्योंकि मैंने समझ लिया है कि उम्मीदें गैरों से नहीं, खुद की खुद से ही पूरी होनी चाहिए। के कंधों पर रखे बोझ ने मेरी दूसरों अपनी उड़ान रोक रखी थी॰ अब अपने जीवन में अकेला हूँ तो अपने आप को हल्का महसूस ٤٠٠ करता - ShareChat
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satnam waheguru ji - #9 खामोशी लेगी बदला मेरा मैंने उन चेहरों कोभभी बदलते देखा है, जो कभी दावा करते थे कि॰वे हर कदम पर मेरे साथ हैंl आज की कड़वी हकीकत यही है कि रिश्तों की डोर अबदिल की धड़कन से नहीं, बल्कि 'जरूरत के गणित' से बंधी होती है। अपनों का यह संसार अब एक ऐसा बाजार बन चुका है, जिहाँ भावनाओं की कोई कद्र नहीं, बस फायदे का तमाशा होता है। जब तक मैं काम आता रहा, मैं उनका 'अजीज ' बना रहा। जैसे ही मेरी उपयोगिता खत्म हुई उनकी बातों की मिठास बेरुखी में बदल गई। आज समझ आया कि उन्हें मेरी मौजूदगी से कभी प्यार था ही नहीं, उन्हें तो बस मुझसे होने वाले काम से लगाव था। #9 खामोशी लेगी बदला मेरा मैंने उन चेहरों कोभभी बदलते देखा है, जो कभी दावा करते थे कि॰वे हर कदम पर मेरे साथ हैंl आज की कड़वी हकीकत यही है कि रिश्तों की डोर अबदिल की धड़कन से नहीं, बल्कि 'जरूरत के गणित' से बंधी होती है। अपनों का यह संसार अब एक ऐसा बाजार बन चुका है, जिहाँ भावनाओं की कोई कद्र नहीं, बस फायदे का तमाशा होता है। जब तक मैं काम आता रहा, मैं उनका 'अजीज ' बना रहा। जैसे ही मेरी उपयोगिता खत्म हुई उनकी बातों की मिठास बेरुखी में बदल गई। आज समझ आया कि उन्हें मेरी मौजूदगी से कभी प्यार था ही नहीं, उन्हें तो बस मुझसे होने वाले काम से लगाव था। - ShareChat
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satnam waheguru ji - न पोत्रै न पुत्रै IIन सत्त्रै न मित्रैIl नःतातै न मातै।न जातै न पातैIl अर्थः हे भाई! जब परमात्मा का कोई शत्रु या मित्र नहीं है, तो इसका अर्थ है कि वह किसी के प्रति पक्षपाती नहीं है। इसी तरह, जब इंसान अपनी 'तृष्णा' पर विजय पा लेता है, तो वह भी के द्वंद्व से ऊपर उठकर साक्षी शत्रु मित्र भाव में आ जाता है। परमात्मा का कोई परिवार नहीं है, फिर भी वह पूर्ण है। यह इस बात का प्रतीक है कि पूर्णता बाहर के रिश्तों में नहीं, बल्कि अपने भीतर के 'सत्य' में होती है। दुनियावी पहचान आत्मा के स्तर पर कोई मायने नहीं रखती। बाणी की यह पंक्तियाँ इंसान को उस परमनशांति की ओर ले जाती हैं जहाँ वह बाहरी दुनिया के शोर और रिश्तों की जटिलताओं से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप को देख सके। न पोत्रै न पुत्रै IIन सत्त्रै न मित्रैIl नःतातै न मातै।न जातै न पातैIl अर्थः हे भाई! जब परमात्मा का कोई शत्रु या मित्र नहीं है, तो इसका अर्थ है कि वह किसी के प्रति पक्षपाती नहीं है। इसी तरह, जब इंसान अपनी 'तृष्णा' पर विजय पा लेता है, तो वह भी के द्वंद्व से ऊपर उठकर साक्षी शत्रु मित्र भाव में आ जाता है। परमात्मा का कोई परिवार नहीं है, फिर भी वह पूर्ण है। यह इस बात का प्रतीक है कि पूर्णता बाहर के रिश्तों में नहीं, बल्कि अपने भीतर के 'सत्य' में होती है। दुनियावी पहचान आत्मा के स्तर पर कोई मायने नहीं रखती। बाणी की यह पंक्तियाँ इंसान को उस परमनशांति की ओर ले जाती हैं जहाँ वह बाहरी दुनिया के शोर और रिश्तों की जटिलताओं से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप को देख सके। - ShareChat
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satnam waheguru ji - सचु वखरु धनु रासि लै पाईऐ गुर परगासिII जिउ अगनि मरै जलि पाइऐ तिउ त्रिसना दासनि दासिपाजम जंदारु न लगई इउ भउजलु तरै तरासि।। 7|67 अर्थः हे भाई! सत्य का व्यापार करो और सत्य की पूंजी इकट्ठी करो; यह अनमोल धन केवल गुरु के ज्ञान रूपी प्रकाश से ही प्राप्त होता है। जैसे जल डालने से अग्नि शांत हो जाती है, वैसे ही लगे गुरु के ज्ञान से मन की तृष्णा और इच्छाओं की आग शांत हो जाती है और माया की इच्छाएं आपकी दासी बन जाती हैं अर्थात् तेरा आप उन पर नियंत्रण पा लेते हैं। जब इंसान अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है, तो परिस्थितियाँ उसे विचलित नहीं कर तो मृत्यु ` पातीं| जब मन में सत्य बस जाता है, का भय और भविष्य की चिंता समाप्त हो जाती है। ऐसे व्यक्ति को मौत का डर भाणा (यमदूत ) नहीं सताता और वह इस भयानक संसार रूपी सागर को बहुत आसानी से पार कर लेता है। देखो ठीक लिखा है जी सचु वखरु धनु रासि लै पाईऐ गुर परगासिII जिउ अगनि मरै जलि पाइऐ तिउ त्रिसना दासनि दासिपाजम जंदारु न लगई इउ भउजलु तरै तरासि।। 7|67 अर्थः हे भाई! सत्य का व्यापार करो और सत्य की पूंजी इकट्ठी करो; यह अनमोल धन केवल गुरु के ज्ञान रूपी प्रकाश से ही प्राप्त होता है। जैसे जल डालने से अग्नि शांत हो जाती है, वैसे ही लगे गुरु के ज्ञान से मन की तृष्णा और इच्छाओं की आग शांत हो जाती है और माया की इच्छाएं आपकी दासी बन जाती हैं अर्थात् तेरा आप उन पर नियंत्रण पा लेते हैं। जब इंसान अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है, तो परिस्थितियाँ उसे विचलित नहीं कर तो मृत्यु ` पातीं| जब मन में सत्य बस जाता है, का भय और भविष्य की चिंता समाप्त हो जाती है। ऐसे व्यक्ति को मौत का डर भाणा (यमदूत ) नहीं सताता और वह इस भयानक संसार रूपी सागर को बहुत आसानी से पार कर लेता है। देखो ठीक लिखा है जी - ShareChat
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satnam waheguru ji - मेरी खामोशी लेगी बदला मेरा बहुत करीब होने काजो स्वांग रचाते थे मेरे अपने अक्सर आज उन्हीं अपनों की महफ़िल में खुद को कोसों दूर पाया है मैंने...!! जिन्हें मेरी जरूरत थी, वे तो हक जताकर पास आ बैठे,पर जब मुझे किसी कंधे की दरकार थी॰ तो हर हाथ खाली पाया है मैंने.. ! ! रिश्तों की इस नुमाइश में, सभी ने हाल तो पूछा मेरा,मगर सब ठीक है॰ के नकाब के पीछे, अपनों से ही अपना दर्द छुपाया है मैंने.. !! अजीब कशमकश है इस मतलबी दौर ए रिश्तेदारी की,जहाँ बिना जरूरत के, अपनों को भी गैरों की कतार में खड़ा पाया है मैंने..!! आज खामोशी की ओढ़नी ओढ़ ٩, कर, शोर से किनारा कर लिया है अपनों की भीड़ का हिस्सा बनने से बेहतर, खुद को खुद के साथ अकेला खडा पाया है মন ! ! मेरी खामोशी लेगी बदला मेरा बहुत करीब होने काजो स्वांग रचाते थे मेरे अपने अक्सर आज उन्हीं अपनों की महफ़िल में खुद को कोसों दूर पाया है मैंने...!! जिन्हें मेरी जरूरत थी, वे तो हक जताकर पास आ बैठे,पर जब मुझे किसी कंधे की दरकार थी॰ तो हर हाथ खाली पाया है मैंने.. ! ! रिश्तों की इस नुमाइश में, सभी ने हाल तो पूछा मेरा,मगर सब ठीक है॰ के नकाब के पीछे, अपनों से ही अपना दर्द छुपाया है मैंने.. !! अजीब कशमकश है इस मतलबी दौर ए रिश्तेदारी की,जहाँ बिना जरूरत के, अपनों को भी गैरों की कतार में खड़ा पाया है मैंने..!! आज खामोशी की ओढ़नी ओढ़ ٩, कर, शोर से किनारा कर लिया है अपनों की भीड़ का हिस्सा बनने से बेहतर, खुद को खुद के साथ अकेला खडा पाया है মন ! ! - ShareChat
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satnam waheguru ji - गावै को ताणु होंवै किसै ताणुा {KIUII गावै को दाति जाणै अर्थः जिस किसी के पास परमात्मा की दी हुई शक्ति मै तेरा है, वह उसकी शक्ति के गीत गाता है। यानी, जिसे परमात्मा की असीम शक्ति का अहसास होता है, वह भिखारी उसकी सामर्थ्य की महिमा करता है। कोई उसकी 1}37 बख्शिशों के गीत गाता है और उन दी हुई दातों को ही प्रभु की कृपा का निशान यानी पहचान मानता है। उसे पहाडा लगता है कि जो कुछ उसे मिला है, वही उस परमात्मा की मौजूदगी का प्रमाण है। सच्चाई यह है कि परमात्मा বাল इतना महान है कि उसे पूरी तरह बयान नहीं किया जा सकता। इंसान की जितनी बुद्धि होती है, वह उतना ही @IqT अंत में गुरु साहिब कहते हैं उसका वर्णन कर पाता है। जी कि वह परमात्मा हमेशा विगासै वेपरवाहु यानी अपनी मौज में प्रसन्न और बेपरवाह रहता है। गावै को ताणु होंवै किसै ताणुा {KIUII गावै को दाति जाणै अर्थः जिस किसी के पास परमात्मा की दी हुई शक्ति मै तेरा है, वह उसकी शक्ति के गीत गाता है। यानी, जिसे परमात्मा की असीम शक्ति का अहसास होता है, वह भिखारी उसकी सामर्थ्य की महिमा करता है। कोई उसकी 1}37 बख्शिशों के गीत गाता है और उन दी हुई दातों को ही प्रभु की कृपा का निशान यानी पहचान मानता है। उसे पहाडा लगता है कि जो कुछ उसे मिला है, वही उस परमात्मा की मौजूदगी का प्रमाण है। सच्चाई यह है कि परमात्मा इतना महान है कि उसे पूरी तरह बयान नहीं किया जा सकता। इंसान की जितनी बुद्धि होती है, वह उतना ही @IqT अंत में गुरु साहिब कहते हैं उसका वर्णन कर पाता है। जी कि वह परमात्मा हमेशा विगासै वेपरवाहु यानी अपनी मौज में प्रसन्न और बेपरवाह रहता है। - ShareChat