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#Eek Tu Hi Guru Ji
Eek Tu Hi Guru Ji - Cr पुत्तर मनुष्य के जीवन मे सुविधा , धन, पद और प्रतिष्ठा - ये आवरण हैं ये शरीर को आराम दे सकते हैं, बाहरी Hq Tu अहंकार को तृप्त कर सकते हैं, लेकिन उस गहरे खालीपन को नहीं भर सकते जो उसके मन के भीतर होता है..!! लोगों के पास सब सुख सुविधा और धन होते हुए भी वे गहरे Hi अवसाद और दुख में डूबे रहते है इसका कारण यह है कि के मोह में दुख का मूल कारण उनके अटैचमेंट और दूसरों Tw होता है, जिसे कोई भौतिक वस्तु नहीं मिटा सकती उसका दुख तब मिटने लगता है जब वह अपने भ्रम की काई और के विष को वह स्मृतियों ' Guu जलाकर राख कर देता है..!! खुद को समय देना और अपनी शांति को प्राथमिकता देना ही फिर उसके आत्मन्जागरण की पहली सीढ़ी है, यह वह अवस्था है जहाँ वह రేగ Ji दूसरों गलतियों का बोझ अपने मन पर ढोना बंद कर देते हैं..!! ऊँ नमःशिवाय शिवा शिव जी सदा सहाय! ! Cr पुत्तर मनुष्य के जीवन मे सुविधा , धन, पद और प्रतिष्ठा - ये आवरण हैं ये शरीर को आराम दे सकते हैं, बाहरी Hq Tu अहंकार को तृप्त कर सकते हैं, लेकिन उस गहरे खालीपन को नहीं भर सकते जो उसके मन के भीतर होता है..!! लोगों के पास सब सुख सुविधा और धन होते हुए भी वे गहरे Hi अवसाद और दुख में डूबे रहते है इसका कारण यह है कि के मोह में दुख का मूल कारण उनके अटैचमेंट और दूसरों Tw होता है, जिसे कोई भौतिक वस्तु नहीं मिटा सकती उसका दुख तब मिटने लगता है जब वह अपने भ्रम की काई और के विष को वह स्मृतियों ' Guu जलाकर राख कर देता है..!! खुद को समय देना और अपनी शांति को प्राथमिकता देना ही फिर उसके आत्मन्जागरण की पहली सीढ़ी है, यह वह अवस्था है जहाँ वह రేగ Ji दूसरों गलतियों का बोझ अपने मन पर ढोना बंद कर देते हैं..!! ऊँ नमःशिवाय शिवा शिव जी सदा सहाय! ! - ShareChat
#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - केते लै लै मुकरु पाहिए।केते मूरख खाही खाहि " केतिआ दूख भूख सद मारााएहि भि दाति तेरी दातारा मीठा हे भाई! कितने ही ऐसे जीव हैं जो ईश्वर से सांसारिक सुख और दातें ले-्लेकर मुकर जाते हैं। वे यह स्वीकार ही नहीं करते कि यह सब उस परमात्मा की देन है। कितने ही ऐसे लगे मूर्ख हैं जो जीवन भर सिर्फ भोगते और खाते ही रहते हैं, पर कभी उस दातार देने वाले को याद नहीं करते।कितने ही लोग ऐसे हैं जिन्हें निरंतर दुख भूख और कष्टों की मार নহা झेलनी पडती है।गुरु साहिब कहते हैं कि दुख भी परमात्मा लिए का एक उपहार है। ऐसा इस जब इंसान सुखों में होता है, तो वह अक्सर अहंकार में आकर ईश्वर को भूल QTUTT जाता है।, लेकिन जब दुख आते है, तो मनुष्य का अहंकार टूटता है और उसे उस परम शक्ति की याद आती है। इसलिए, दुख वह माध्यम रास्ता है जो हमें वापस परमात्मा के मार्ग पर ले जाता है। केते लै लै मुकरु पाहिए।केते मूरख खाही खाहि " केतिआ दूख भूख सद मारााएहि भि दाति तेरी दातारा मीठा हे भाई! कितने ही ऐसे जीव हैं जो ईश्वर से सांसारिक सुख और दातें ले-्लेकर मुकर जाते हैं। वे यह स्वीकार ही नहीं करते कि यह सब उस परमात्मा की देन है। कितने ही ऐसे लगे मूर्ख हैं जो जीवन भर सिर्फ भोगते और खाते ही रहते हैं, पर कभी उस दातार देने वाले को याद नहीं करते।कितने ही लोग ऐसे हैं जिन्हें निरंतर दुख भूख और कष्टों की मार নহা झेलनी पडती है।गुरु साहिब कहते हैं कि दुख भी परमात्मा लिए का एक उपहार है। ऐसा इस जब इंसान सुखों में होता है, तो वह अक्सर अहंकार में आकर ईश्वर को भूल QTUTT जाता है।, लेकिन जब दुख आते है, तो मनुष्य का अहंकार टूटता है और उसे उस परम शक्ति की याद आती है। इसलिए, दुख वह माध्यम रास्ता है जो हमें वापस परमात्मा के मार्ग पर ले जाता है। - ShareChat
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satnam waheguru ji - नमसर्त अरनंते ।l नमसर्तभर्हते।। नमसतसतु रागे। नमसत सुहागे 11 #dT हे भाई! उस ईश्वर को नमन है जो अनंत है जिसकी कोई सीमा नहीं है। परमात्मा अनंत भिखारी भी है और महान भी। यानी वह सूक्ष्म से सूक्ष्म मौजूद  है और विशाल से विशाल भी। वह हर जगह ' है। उस महान स्वरूप को नमन है जो जिओ सबसे श्रेष्ठ और महान है। उस शक्ति को प्रणाम है जो प्रेम और राग भाव के रूप में विद्यमान है।ईश्वर केवल कठोर नियम नहीं, 46TT बल्कि वह हमारे भीतर का राग (प्रेम, संगीत, और लगाव) भी है। वह भावनाओं का स्रोत हैl उस सौभाग्य और कल्याणकारी रूप को वाले नमन है जो जीवन को प्रकाशित करता है। ईश्वर वह शक्ति जो जीवन में मंगल और शुभता लाती है। ईश्वर को केवल मंदिर या मूर्ति बाबा में न खोजें, बल्कि उसे अनंतता , महानता , प्रेम और सौभाग्य हर सकारात्मक रूप में पहचानें और नमन करें। ईश्वर सर्वव्यापी है। वह जी और स्थान से परे (अनंत ) है, गरिमा में सबसे ऊँचा (महंत) है, समय और हमारे जीवन की सुंदरता व प्रेम (राग सुहाग ) का आधार है। नमसर्त अरनंते ।l नमसर्तभर्हते।। नमसतसतु रागे। नमसत सुहागे 11 #dT हे भाई! उस ईश्वर को नमन है जो अनंत है जिसकी कोई सीमा नहीं है। परमात्मा अनंत भिखारी भी है और महान भी। यानी वह सूक्ष्म से सूक्ष्म मौजूद  है और विशाल से विशाल भी। वह हर जगह ' है। उस महान स्वरूप को नमन है जो जिओ सबसे श्रेष्ठ और महान है। उस शक्ति को प्रणाम है जो प्रेम और राग भाव के रूप में विद्यमान है।ईश्वर केवल कठोर नियम नहीं, 46TT बल्कि वह हमारे भीतर का राग (प्रेम, संगीत, और लगाव) भी है। वह भावनाओं का स्रोत हैl उस सौभाग्य और कल्याणकारी रूप को वाले नमन है जो जीवन को प्रकाशित करता है। ईश्वर वह शक्ति जो जीवन में मंगल और शुभता लाती है। ईश्वर को केवल मंदिर या मूर्ति बाबा में न खोजें, बल्कि उसे अनंतता , महानता , प्रेम और सौभाग्य हर सकारात्मक रूप में पहचानें और नमन करें। ईश्वर सर्वव्यापी है। वह जी और स्थान से परे (अनंत ) है, गरिमा में सबसे ऊँचा (महंत) है, समय और हमारे जीवन की सुंदरता व प्रेम (राग सुहाग ) का आधार है। - ShareChat
#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana #Eek Tu Hi Guru Ji
satnam waheguru ji - मेरी खामोशी लेगी बदला मेरा जब भी में तेरे वर्तमान की शिकायतों औरतेरे पुरानी ' किये झूठे वादों को साफ करके देखता हूं तो मेरे मन मे रिश्तों के प्रति ताजगी खत्म हो जाती है..!! तेरी खुद की कही हुई इधर उधर की झूठी बातों को पकड़ कर बैठना मेरे मन में उस कचरे के समान है जिसने तेरे मेरे रिश्तों की आत्मीयता का दम గే| qlc f2uT గే!! గౌdld शब्द वह विष हैं जो हुए झूठे वर्षो तक मेरे रक्त में घुले रहेंगे .!!! तेरे वह झूठे बोले शब्द सौ साल तक मेरे मन को मिली क्षति को भर नही सकते जो तेरी झूठ की स्याही से लिखे गए है..!! मेरी खामोशी लेगी बदला मेरा जब भी में तेरे वर्तमान की शिकायतों औरतेरे पुरानी ' किये झूठे वादों को साफ करके देखता हूं तो मेरे मन मे रिश्तों के प्रति ताजगी खत्म हो जाती है..!! तेरी खुद की कही हुई इधर उधर की झूठी बातों को पकड़ कर बैठना मेरे मन में उस कचरे के समान है जिसने तेरे मेरे रिश्तों की आत्मीयता का दम గే| qlc f2uT గే!! గౌdld शब्द वह विष हैं जो हुए झूठे वर्षो तक मेरे रक्त में घुले रहेंगे .!!! तेरे वह झूठे बोले शब्द सौ साल तक मेरे मन को मिली क्षति को भर नही सकते जो तेरी झूठ की स्याही से लिखे गए है..!! - ShareChat
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satnam waheguru ji - ತಃr sfr ~rFT ভরতীী]] न्ाो बोज्ज[ अखिज्जे GfauIl समसतं प्रसिज्जे।। यहाँ 'जीव' शबद दर्शाता है प्रथम संसारी जीव (हम और मै तेरा 3/&: ।द्वितीय जीवंः वह शुद्ध चेतना या 'परमात्मा' जो हर जीव आप के भीतर विद्यमान है। हे भाई!उस चैतन्य सत्ता को नमस्कार है भिखारी जो जीवन का भी जीवन है। यह स्वीकारोक्ति है कि शरीर नश्वर है, लेकिन उसके भीतर का जीव रूह शाश्वत है। नमो बीज ব্রীতী; নীত' ক্কা সথ কীনা वह मूल शक्ति जहाँ से सब उत्पन्न जिओ हुआ। जैसे एक छोटे से बीज में विशाल वटवृक्ष छिपा होता है, वैसे ही आत्मा में अनंत ज्ञान और शक्ति छिपी है। बीजेः यानी वह परम तत्व जो सृष्टि और मोक्ष दोनों का आधार है। इसे পঙ্াভা करने का अर्थ है अपनी मूल जड़ से जुड़ना। नमस्कार जिसका कभी क्षय नहीं होताे। समय, बुढ़ापा या मृत्यु अखिज्जे इसे कम नहीं कर सकते। अभिज्जेःजिसे कोई शस्त्र काट नर्ह वाले सकता , अग्नि जला नहीं सकती और शस्त्र भेद नहीं सकते। यह पूर्णतः अखंड है। समसतं प्रसिज्जेः जो समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाला है या जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड की पूर्णता बाबा समाहित है। उस परम तत्व की शरण में जाने या उसे पहचानने से समस्त कार्यों में सिद्धि और आत्मिक शांति प्राप्त होती है। जा गुरु गोबिंद सिंह जी बाणी मे समझा रहे है, हम केवल मांसन्मज्जा का शरीर नहीं, बल्कि एक अविनाशी जीव हैं। हमारे मौजूद है। हमें संसार की कोई भी भीतर अनंत शक्तियों का बीज शक्ति नष्ट (अखिज्जे) या खंडित ( अभिज्जे) नहीं कर सकती। ತಃr sfr ~rFT ভরতীী]] न्ाो बोज्ज[ अखिज्जे GfauIl समसतं प्रसिज्जे।। यहाँ 'जीव' शबद दर्शाता है प्रथम संसारी जीव (हम और मै तेरा 3/&: ।द्वितीय जीवंः वह शुद्ध चेतना या 'परमात्मा' जो हर जीव आप के भीतर विद्यमान है। हे भाई!उस चैतन्य सत्ता को नमस्कार है भिखारी जो जीवन का भी जीवन है। यह स्वीकारोक्ति है कि शरीर नश्वर है, लेकिन उसके भीतर का जीव रूह शाश्वत है। नमो बीज ব্রীতী; নীত' ক্কা সথ কীনা वह मूल शक्ति जहाँ से सब उत्पन्न जिओ हुआ। जैसे एक छोटे से बीज में विशाल वटवृक्ष छिपा होता है, वैसे ही आत्मा में अनंत ज्ञान और शक्ति छिपी है। बीजेः यानी वह परम तत्व जो सृष्टि और मोक्ष दोनों का आधार है। इसे পঙ্াভা करने का अर्थ है अपनी मूल जड़ से जुड़ना। नमस्कार जिसका कभी क्षय नहीं होताे। समय, बुढ़ापा या मृत्यु अखिज्जे इसे कम नहीं कर सकते। अभिज्जेःजिसे कोई शस्त्र काट नर्ह वाले सकता , अग्नि जला नहीं सकती और शस्त्र भेद नहीं सकते। यह पूर्णतः अखंड है। समसतं प्रसिज्जेः जो समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाला है या जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड की पूर्णता बाबा समाहित है। उस परम तत्व की शरण में जाने या उसे पहचानने से समस्त कार्यों में सिद्धि और आत्मिक शांति प्राप्त होती है। जा गुरु गोबिंद सिंह जी बाणी मे समझा रहे है, हम केवल मांसन्मज्जा का शरीर नहीं, बल्कि एक अविनाशी जीव हैं। हमारे मौजूद है। हमें संसार की कोई भी भीतर अनंत शक्तियों का बीज शक्ति नष्ट (अखिज्जे) या खंडित ( अभिज्जे) नहीं कर सकती। - ShareChat
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satnam waheguru ji - रंगी रंगी भाती करि करि जिनसी माइआ जिनि उपाई।।करि करि देखै कीता आपणा जिउ तिस दी वडिआई ]l HoT अर्थः परमात्मा ने कई रंगों, कई किस्मों और कई प्रकार की वस्तुओं वाली यह माया पैदा की है। परमात्मा ने जान (f೬) बूझकर इस संसार को तरह-्तरह के रंगों और किस्मों में बनाया है। यह उसकी रचनात्मकता का उत्सव है। ईश्वर केवल इस लगे संसार को बनाने वाला ही नहीं है, बल्कि वह इसका प्रेक्षक भी है। वह अपनी बनाई हुई इस रचना को स्वयं ही पैदा करके देख रहा है उसकी संभाल कर रहा है और यह सब उसकी तेरा अपनी महिमा के अनुसार हो रहा है। वह सृष्टि बनाकर अलग नहीं बैठ गया बल्कि वह अपनी रचना में खुद समाया हुआ है और बड़े चाव से इसे निहार रहा है। जैसे उसकी महानता है, वैसे ही उसके खेल और उसकी रचना का विस्तार है। मनुष्य भाणा को उसकी रज़ा को स्वीकार करना चाहिए , न कि दोष इसमें ढूँढना चाहिए क्योंकि यह सब उसकी महानता का ही विस्तार है।यह पूरी कायनात ईश्वर का एक भव्य खेल है वह अपनी रचना से प्रेम करता है और उसे देखन्देखकर प्रसन्न होता है। रंगी रंगी भाती करि करि जिनसी माइआ जिनि उपाई।।करि करि देखै कीता आपणा जिउ तिस दी वडिआई ]l HoT अर्थः परमात्मा ने कई रंगों, कई किस्मों और कई प्रकार की वस्तुओं वाली यह माया पैदा की है। परमात्मा ने जान (f೬) बूझकर इस संसार को तरह-्तरह के रंगों और किस्मों में बनाया है। यह उसकी रचनात्मकता का उत्सव है। ईश्वर केवल इस लगे संसार को बनाने वाला ही नहीं है, बल्कि वह इसका प्रेक्षक भी है। वह अपनी बनाई हुई इस रचना को स्वयं ही पैदा करके देख रहा है उसकी संभाल कर रहा है और यह सब उसकी तेरा अपनी महिमा के अनुसार हो रहा है। वह सृष्टि बनाकर अलग नहीं बैठ गया बल्कि वह अपनी रचना में खुद समाया हुआ है और बड़े चाव से इसे निहार रहा है। जैसे उसकी महानता है, वैसे ही उसके खेल और उसकी रचना का विस्तार है। मनुष्य भाणा को उसकी रज़ा को स्वीकार करना चाहिए , न कि दोष इसमें ढूँढना चाहिए क्योंकि यह सब उसकी महानता का ही विस्तार है।यह पूरी कायनात ईश्वर का एक भव्य खेल है वह अपनी रचना से प्रेम करता है और उसे देखन्देखकर प्रसन्न होता है। - ShareChat
#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana #Eek Tu Hi Guru Ji
satnam waheguru ji - # खामोशी लेगी बदला मेरा जब से अपनों की आंखों में खटकने लगे हूं तो वहां से हट जाना ही मेरा बड़प्पन है..!! ऐसे जबरदस्ती के रिश्तों में रहने से अच्छा है अपनी गरिमा के साथ अकेले रहना..!!टूटे हुए रिश्तो की राख को कुरेदना बंद कर दिया है मैने जो रिश्ते जल चुके हैं 8 उनमें से उजाला नहीं केवल धुआं निकलेगा जो आंखों को ही जलाएगा पर सा़फ कुछ भी दिखाई नहीं देगा..!! किनारे कर दिया है मैने स्वयं को उन झूठे रिश्तों के शोर से जहां हैं लेकिन चेहरे तो सबके मुस्कुराते ' दिल भरे पड़े हैं फरेबो की भारी पड़ी नफरतों से.!! अकेले रहना बेहतर है बजाए तुम जैसे दोग़ले और झूठे लोगों के बीच घिरे रहने से लाख गुना बेहतर है मेरे लिए ..!! धोखा मुझे तुमसे मिला और नफरत मुझको सभी के संग हो गई है..!! # खामोशी लेगी बदला मेरा जब से अपनों की आंखों में खटकने लगे हूं तो वहां से हट जाना ही मेरा बड़प्पन है..!! ऐसे जबरदस्ती के रिश्तों में रहने से अच्छा है अपनी गरिमा के साथ अकेले रहना..!!टूटे हुए रिश्तो की राख को कुरेदना बंद कर दिया है मैने जो रिश्ते जल चुके हैं 8 उनमें से उजाला नहीं केवल धुआं निकलेगा जो आंखों को ही जलाएगा पर सा़फ कुछ भी दिखाई नहीं देगा..!! किनारे कर दिया है मैने स्वयं को उन झूठे रिश्तों के शोर से जहां हैं लेकिन चेहरे तो सबके मुस्कुराते ' दिल भरे पड़े हैं फरेबो की भारी पड़ी नफरतों से.!! अकेले रहना बेहतर है बजाए तुम जैसे दोग़ले और झूठे लोगों के बीच घिरे रहने से लाख गुना बेहतर है मेरे लिए ..!! धोखा मुझे तुमसे मिला और नफरत मुझको सभी के संग हो गई है..!! - ShareChat
#Eek Tu Hi Guru Ji
Eek Tu Hi Guru Ji - पुत्तर जब मन में ईश्वर की आत्मनशक्ति का वास होता सकती है, है, तब दुनिया की कड़वाहट तुम का छू तो पर तुम को तोड़ नहीं @ के रिश्ते अस्थाई हो सकते हैं और [ सकती.. ! ! उनसे धोखा मिलना स्वाभाविक है, लेकिन अध्यात्म Tu कहता है कि परमात्मा का प्रेम ही एकमात्र शाश्वत যযে है, जब भी तुम उस परम शक्ति पर भरोसा करते हैं, तो Hi इंसानी फरेब और नफरत आपको डराना बंद कर देती है...!! जब भी तुम भयभीत होते हो, तो असली कारण Tu सिर्फ एक ही होता हैः परमात्मा से प्रेम नहीं है, जिसका परमात्मा से प्रेम है, उसके मन के सारे भय विसर्जित हो Guu जाते हैं....!! जब भी तुम की पसंद राय और दूसरों उनके हिसाब से खुद को ढालेंगे , तो तुम कभी पूर्ण नहीं हो पाएंगे क्योकिं दुनिया तो मौसम की तरह Ji बदलती रहती है..!! ऊँ नमःशिवाय शिवा शिव जी सदा सहाय! ! पुत्तर जब मन में ईश्वर की आत्मनशक्ति का वास होता सकती है, है, तब दुनिया की कड़वाहट तुम का छू तो पर तुम को तोड़ नहीं @ के रिश्ते अस्थाई हो सकते हैं और [ सकती.. ! ! उनसे धोखा मिलना स्वाभाविक है, लेकिन अध्यात्म Tu कहता है कि परमात्मा का प्रेम ही एकमात्र शाश्वत যযে है, जब भी तुम उस परम शक्ति पर भरोसा करते हैं, तो Hi इंसानी फरेब और नफरत आपको डराना बंद कर देती है...!! जब भी तुम भयभीत होते हो, तो असली कारण Tu सिर्फ एक ही होता हैः परमात्मा से प्रेम नहीं है, जिसका परमात्मा से प्रेम है, उसके मन के सारे भय विसर्जित हो Guu जाते हैं....!! जब भी तुम की पसंद राय और दूसरों उनके हिसाब से खुद को ढालेंगे , तो तुम कभी पूर्ण नहीं हो पाएंगे क्योकिं दुनिया तो मौसम की तरह Ji बदलती रहती है..!! ऊँ नमःशिवाय शिवा शिव जी सदा सहाय! ! - ShareChat
#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - नमो नित्त नाराइणे क्रूर करमे।। नमो प्रेत अप्रेत देवे सुधरमे ।। मै तेरा हे भाई! उस सदा रहने वाले (नित्त) नारायण को नमस्कार है।जो क्रूर कर्म' (कठोर दंड देने वाले या विनाशकारी रूप का भी कर्ता है। यहाँ गुरु भिखारी साहिब समझाते हैं कि परमात्मा केवल कोमल ही नहीं है, बल्कि जब अधर्म जिओ बढ़ता है, तब वह काल या विनाशक का रूप धरकर दुष्टों का संहार भी करता है। वह सृजनकर्ता भी है और संहारकर्ता भी। जो प्रेत; अंधकारमयी योनियों और अप्रेत; जो प्रेत नहीं हैं, यानी पवित्र आत्माएं दोनों में मौजूद है। जो स्वयं 46TST प्रकाशमान (देव) है और श्रेष्ठ धर्म का स्वरूप है। ईश्वर की व्यापकता इतनी है वाले किवह केवल ' अच्छाई' तक सीमित नहीं हैः वह प्रकाश और अंधकार , सुंदर और डरावने , दोनों ही रूपों का आधार है। वह हर योनि और हर जीव में व्याप्त Iq है। गुरु साहिब कह रहे हैं कि जिसे दुनिया 'बुरा' या ' अपवित्र (प्रेत) कहकर त्याग देती है, परमात्मा वहाँ भी मौजूद है। ईश्वर केवल स्वर्ग में या सुंदर जगहों Gt पर नहीं बैठा। वह सृष्टि के हर कण में है  चाहे वह उजाला हो या गहरा ajekTI नमो नित्त नाराइणे क्रूर करमे।। नमो प्रेत अप्रेत देवे सुधरमे ।। मै तेरा हे भाई! उस सदा रहने वाले (नित्त) नारायण को नमस्कार है।जो क्रूर कर्म' (कठोर दंड देने वाले या विनाशकारी रूप का भी कर्ता है। यहाँ गुरु भिखारी साहिब समझाते हैं कि परमात्मा केवल कोमल ही नहीं है, बल्कि जब अधर्म जिओ बढ़ता है, तब वह काल या विनाशक का रूप धरकर दुष्टों का संहार भी करता है। वह सृजनकर्ता भी है और संहारकर्ता भी। जो प्रेत; अंधकारमयी योनियों और अप्रेत; जो प्रेत नहीं हैं, यानी पवित्र आत्माएं दोनों में मौजूद है। जो स्वयं 46TST प्रकाशमान (देव) है और श्रेष्ठ धर्म का स्वरूप है। ईश्वर की व्यापकता इतनी है वाले किवह केवल ' अच्छाई' तक सीमित नहीं हैः वह प्रकाश और अंधकार , सुंदर और डरावने , दोनों ही रूपों का आधार है। वह हर योनि और हर जीव में व्याप्त Iq है। गुरु साहिब कह रहे हैं कि जिसे दुनिया 'बुरा' या ' अपवित्र (प्रेत) कहकर त्याग देती है, परमात्मा वहाँ भी मौजूद है। ईश्वर केवल स्वर्ग में या सुंदर जगहों Gt पर नहीं बैठा। वह सृष्टि के हर कण में है  चाहे वह उजाला हो या गहरा ajekTI - ShareChat
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satnam waheguru ji - धरमु दइआ का पूतु।।संतोखु थापि रखिआ जिनि सूतिIl धौलु जे को बुझै होवै सचिआरु।।धवलै उपरि केता भारु।। धरती होरु परै होरु होरु।।तिस ते भारु तलै कवणु जोरु।। अर्थःपुराने समय में यह माना जाता था कि धरती एक बैल (धवल ) के सीँगों पर टिकी है। गुरु नानक देव जी ने इस तर्क को चुनौती दीः HoT वह समझाते हैं कि ब्रह्मॉंड की अनंतता में कोई एक भौतिक सहारा जैसे बैल या खंभा नहीं हो सकता। असल में, यह पूरी कायनात कुदरती नियमों के सहारे टिकी है, जिसे उन्होंने ' धर्म कहा है। यहाँ लगे धर्म' का अर्थ पूजा पाठ नहीं, बल्कि संतुलन है। जैसे एक माँ वैसे ही अपनी दया और प्रेम से परिवार को जोड़कर रखती है, परमात्मा की 'दया' इस पूरी सृष्टि को बिखरने से रोकती है। धरम ने तेरा जब नियमों में अपनी मर्यादा अनुसार संतोष को जन्म दिया है। संतोष और ठहराव होता है, तभी सृष्टि मर्यादा में रहती है। यदि ग्रहों की चाल में संतोष ( अनुशासन) न हो, तो सब आपस में टकराकर भाणा नष्ट हो जाएँगे। सृष्टि का संतुलन तभी बना रहता है जब दया हो और संतोष' (संयम ) हो। बिना नियमों के यह संसार करुणा बिखर जाएगा। धरमु दइआ का पूतु।।संतोखु थापि रखिआ जिनि सूतिIl धौलु जे को बुझै होवै सचिआरु।।धवलै उपरि केता भारु।। धरती होरु परै होरु होरु।।तिस ते भारु तलै कवणु जोरु।। अर्थःपुराने समय में यह माना जाता था कि धरती एक बैल (धवल ) के सीँगों पर टिकी है। गुरु नानक देव जी ने इस तर्क को चुनौती दीः HoT वह समझाते हैं कि ब्रह्मॉंड की अनंतता में कोई एक भौतिक सहारा जैसे बैल या खंभा नहीं हो सकता। असल में, यह पूरी कायनात कुदरती नियमों के सहारे टिकी है, जिसे उन्होंने ' धर्म कहा है। यहाँ लगे धर्म' का अर्थ पूजा पाठ नहीं, बल्कि संतुलन है। जैसे एक माँ वैसे ही अपनी दया और प्रेम से परिवार को जोड़कर रखती है, परमात्मा की 'दया' इस पूरी सृष्टि को बिखरने से रोकती है। धरम ने तेरा जब नियमों में अपनी मर्यादा अनुसार संतोष को जन्म दिया है। संतोष और ठहराव होता है, तभी सृष्टि मर्यादा में रहती है। यदि ग्रहों की चाल में संतोष ( अनुशासन) न हो, तो सब आपस में टकराकर भाणा नष्ट हो जाएँगे। सृष्टि का संतुलन तभी बना रहता है जब दया हो और संतोष' (संयम ) हो। बिना नियमों के यह संसार करुणा बिखर जाएगा। - ShareChat