यह दोहा भगवान विष्णु की अनन्य भक्ति और भगवान शिव की उदारता के संगम का प्रतीक है। जब दैत्यों का अत्याचार बढ़ा, तब विष्णु जी ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए एक हज़ार कमल के पुष्प चढ़ाने का संकल्प लिया। यह दोहा उस चरम क्षण का वर्णन करता है जब एक पुष्प कम होने पर नारायण ने स्वयं का एक नेत्र ही अर्पित करने का निर्णय लिया।
प्रथम पंक्ति (परम समर्पण): भगवान विष्णु का एक नाम 'कमलनयन' है। जब उन्होंने देखा कि सहस्र (1000) कमल के फूलों में एक फूल कम पड़ रहा है, तो उन्होंने अपनी भक्ति और संकल्प को खंडित नहीं होने दिया, उन्होंने निश्चय किया कि वे फूल के स्थान पर अपना एक 'नेत्र' (आँख) निकालकर शिव जी के चरणों में चढ़ा देंगे। जैसे ही नारायण का हाथ अपने नेत्र की ओर बढ़ा, वह पल त्याग और प्रेम की पराकाष्ठा बन गया।
द्वितीय पंक्ति (शक्ति का उपहार): विष्णु जी के इस अद्भुत त्याग और निष्ठा को देखकर महादेव (शिव नाथ) अत्यंत प्रसन्न (खुश) हो गए। उन्होंने नारायण का हाथ थाम लिया और उस भक्ति के प्रतिफल के रूप में अपनी अमोघ शक्ति से उत्पन्न 'सुदर्शन चक्र' उन्हें भेंट कर दिया। यह चक्र संसार में धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश का सबसे शक्तिशाली प्रतीक बना।
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