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एक बार महर्षि नारद ने भगवान विष्णु से पूछकर एक नि:संतान स्त्री को बताया कि उसके भाग्य में संतान का सुख नहीं है। यह सुनकर वह स्त्री अत्यंत दुखी हुई। कुछ समय बाद, उस गाँव में एक साधु आए। उस स्त्री की सेवा और श्रद्धा से प्रसन्न होकर साधु ने उसे पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया और फलतः उसे एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जब नारदजी ने उस स्त्री को पुत्र के साथ देखा, तो वे चकित रह गए और भगवान से इसका कारण पूछा। भगवान ने नारद से उनकी बीमारी के बहाने धरती से एक कटोरी मानव-रक्त लाने को कहा। नारदजी कई द्वारों पर गए, पर कोई भी अपना रक्त देने को तैयार नहीं हुआ। अंत में वही साधु मिला, जिसने बिना एक क्षण सोचे भगवान के लिए अपने शरीर से रक्त निकालकर दे दिया। तब भगवान ने समझाया कि जो भक्त अपने आराध्य के लिए प्राण देने को तत्पर हो, उसके वचनों को पूरा करने के लिए भगवान स्वयं भाग्य का लिखा (विधि का विधान) भी बदल देते हैं। निष्कर्ष: सच्ची भक्ति और पूर्ण समर्पण में इतनी शक्ति होती है कि वह प्रारब्ध की रेखाओं को भी मिटा सकती है। #जय श्री राम 🙏 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस
जय श्री राम 🙏 - বিখি কা লস্ত্রা লল সক, তী ষ্ী ঈম 3RU भक्त हेतु भगवान भी, बदलें सुब अधिकारण जय श्री नारायण বিখি কা লস্ত্রা লল সক, তী ষ্ী ঈম 3RU भक्त हेतु भगवान भी, बदलें सुब अधिकारण जय श्री नारायण - ShareChat
महान क्रांतिकारी तात्या टोपे जी की पुण्यतिथि पर कोटि कोटि नमन 🙏 तात्या टोपे जी की सोच थी कि देश आजाद हो। वे 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के एक महान सूरमा थे और रानी लक्ष्मीबाई के प्रमुख सहायक भी थे। देश के प्रति उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। तात्या टोपे का जन्म 16 फरवरी 1814 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के येवला गांव में पांडुरंग त्र्यंबकं भट्ट और रुक्मणि बाई के घर हुआ था। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्हें विश्वासघाती मानसिंह के धोखे के कारण पकड़ा गया और 18 अप्रैल 1859 को मध्य प्रदेश के शिवपुरी में फांसी दे दी गई थी। जय श्री राम 🙏 #जय श्री राम 🙏 #🤟 सुपर स्टेटस #📜 Whatsapp स्टेटस
जय श्री राम 🙏 - महान क्रांतिकारी तात्या टोपे जी | पुण्यतिथि पर की कोटि कोटि नमन महान क्रांतिकारी तात्या टोपे जी | पुण्यतिथि पर की कोटि कोटि नमन - ShareChat
ईश्वर की इच्छा में मंगल: राजा और मंत्री की कथा १. अटूट विश्वास और अप्रिय घटना: एक समय की बात है, एक प्रतापी राजा का एक अत्यंत बुद्धिमान और धार्मिक मंत्री था। मंत्री का यह दृढ़ विश्वास था कि संसार में जो कुछ भी घटित होता है, वह ईश्वर की मर्जी से होता है और उसमें अंततः मनुष्य का कल्याण ही छिपा होता है। एक दिन शिकार के दौरान एक दुर्घटना हुई और राजा का अपना अंगूठा कट गया। जब पीड़ा से व्याकुल राजा ने मंत्री को यह बताया, तो मंत्री ने अपने स्वभाव और विश्वास के अनुसार सहज ही कह दिया— "महाराज, चिंता न करें, भगवान ने जो किया, अच्छा ही किया।" २. राजा का क्रोध और मंत्री को कारावास: पीड़ा में डूबे राजा को मंत्री की यह बात संवेदनहीन और उपहास जैसी लगी। उन्हें लगा कि उनका अंग कट गया है और मंत्री इसे 'अच्छा' बता रहा है। क्रोध में आकर राजा ने तुरंत आदेश दिया कि मंत्री को कालकोठरी में डाल दिया जाए। जब सैनिक मंत्री को बंदी बनाकर ले जा रहे थे, तब भी मंत्री के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी और उन्होंने शांत भाव से पुनः वही कहा— "इसमें भी भगवान की कोई इच्छा होगी, उन्होंने जो किया अच्छा ही किया।" राजा को उसकी इस बात पर और भी अधिक आश्चर्य और झुंझलाहट हुई। ३. संकट का समय और दैवीय रक्षा: कुछ समय बीतने के बाद, राजा फिर से वन में शिकार के लिए निकले। इस बार वे अपने सैनिकों से बिछड़कर घने जंगल के भीतर एक कबीले के लोगों द्वारा बंदी बना लिए गए। वह कबीला अपने देवता को प्रसन्न करने के लिए एक 'नरबलि' की तैयारी कर रहा था। राजा को बलि के लिए वेदी पर लाया गया। पूरी विधि संपन्न होने ही वाली थी कि तभी कबीले के मुख्य पुजारी की दृष्टि राजा के हाथ पर पड़ी। उन्होंने देखा कि राजा का अंगूठा कटा हुआ है। शास्त्रों और परंपरा के अनुसार, 'अंग-भंग' (अपूर्ण) व्यक्ति की बलि स्वीकार्य नहीं होती। अशुद्ध और खंडित मानकर कबीले वालों ने राजा को मुक्त कर दिया। ४. बोध और क्षमायाचना: सकुशल अपने महल लौटने पर राजा को तुरंत मंत्री की वह बात याद आई। उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ कि यदि उस दिन अंगूठा न कटा होता, तो आज उनका जीवन समाप्त हो गया होता। उन्होंने तुरंत मंत्री को जेल से रिहा करवाया और उनसे क्षमा मांगी। राजा ने पूछा, "मित्र, मेरा अंगूठा कटना तो मेरे प्राण बचाने का कारण बना, इसलिए वह अच्छा था। लेकिन मेरा तुम्हें जेल भेजना तुम्हारे लिए कैसे अच्छा हुआ?" ५. निष्कर्ष और जीवन की सीख: मंत्री ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, "महाराज, मैं आपका मुख्य मंत्री हूँ और सदैव छाया की तरह आपके साथ रहता हूँ। यदि आप मुझे जेल न भेजते, तो शिकार पर मैं निश्चित रूप से आपके साथ होता। जब कबीले वालों ने आपका अंग भंग देखकर आपको छोड़ा, तो वे 'पूर्ण अंग' वाले मुझे बलि के लिए चुन लेते। अतः मुझे जेल भेजकर भगवान ने मेरे प्राण भी बचा लिए।" सार: यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ या अचानक आई विपदाएँ वास्तव में 'कड़वी औषधि' की तरह होती हैं। जिस प्रकार कड़वी दवा बीमारी को जड़ से मिटाती है, उसी प्रकार वर्तमान का कष्ट भविष्य के किसी बड़े अनिष्ट को टालने का ईश्वर का एक गुप्त तरीका हो सकता है। हमें कठिन समय में अपना 'धैर्य' (धीर) नहीं खोना चाहिए #जय श्री राम 🙏 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
जय श्री राम 🙏 - विपदा में धीरज धरे, तजे न मन का धीर। कड़वी औषधि रूप में, हरते हरि सब पीर।। ' मंन्त्री को जेल ಹnidh Aall |dul স াল दो! JUIuI इसका अंगूठा कटा हे! अंग भंग की बलि 1843! कहानी : भगवान की हर लीला में मंगल छुपा होता है विपदा में धीरज धरे, तजे न मन का धीर। कड़वी औषधि रूप में, हरते हरि सब पीर।। ' मंन्त्री को जेल ಹnidh Aall |dul স াল दो! JUIuI इसका अंगूठा कटा हे! अंग भंग की बलि 1843! कहानी : भगवान की हर लीला में मंगल छुपा होता है - ShareChat
बच्चे को बचाने स्वयं भगवान ने रूप बदल कर उसकी रक्षा की है, लंगूर रूप में । ।।जय श्री राम।। ।।जय श्री हनुमान जी।। #जय श्री राम 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस
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महाकवि कालिदास की यह कथा अज्ञान से परम पांडित्य तक की यात्रा का एक जीवंत उदाहरण है। प्राचीन काल में, राजकुमारी विद्योत्तमा को शास्त्रार्थ में पराजित करने के लिए कुछ प्रतिशोधी पंडितों ने कालिदास जैसे एक सरल और अल्पज्ञानी व्यक्ति को विद्वान बताकर छल से उनका विवाह करा दिया। विवाह के पश्चात जब कालिदास की वास्तविकता उजागर हुई, तो राजकुमारी ने उन्हें अपमानित कर घर से निकाल दिया और विद्वान बनकर ही लौटने की चुनौती दी। इस तिरस्कार से व्यथित होकर कालिदास ने उज्जैन की माँ गढ़कालिका के चरणों में शरण ली और कठोर तप किया। उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर माँ ने उनकी जिव्हा पर सरस्वती मंत्र अंकित किया, जिससे वे जड़ से चेतन हो गए और उनमें ज्ञान का अपार प्रवाह उमड़ पड़ा। अंततः, उन्होंने अपनी पत्नी के तिरस्कारपूर्ण शब्दों को ही मंगलाचरण बनाकर 'कुमारसंभवम्', 'मेघदूतम्' और 'रघुवंशम्' जैसे कालजयी महाकाव्यों की रचना की। यह कथा सिद्ध करती है कि संकल्प और दैवीय कृपा से कोई भी व्यक्ति 'शून्य' से 'शिखर' तक की यात्रा तय कर सकता है। #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
📜 Whatsapp स्टेटस - मूर्ख न कोई जगत में, न कोई विद्वान | शून्य विसर्जित जब करे, तब जागे भगवान ।। गढ़कालिका 4 मूर्ख न कोई जगत में, न कोई विद्वान | शून्य विसर्जित जब करे, तब जागे भगवान ।। गढ़कालिका 4 - ShareChat
प्राचीन काल की बात है, जब पृथ्वी पर 'ज्वरासुर' नामक एक भयंकर असुर का आतंक फैल गया था। वह असुर रोगों का साक्षात स्वरूप था। उसके स्पर्श मात्र से लोगों के शरीर तपने लगते, अंगों पर दाने निकल आते और पूरी मानवता महामारी की चपेट में आ गई थी। शक्ति का प्राकट्य जब हाहाकार मच गया, तब समस्त देवगण भगवान शिव की शरण में गए। महादेव के अंश से और आदिशक्ति की कृपा से एक देवी का प्राकट्य हुआ, जिनका स्वरूप अत्यंत शीतल और ममतामयी था। उन्हें 'शीतला' कहा गया। वे नीम की पत्तियों के गहने पहने, हाथ में कलश और झाड़ू लिए गधे पर सवार होकर पृथ्वी पर उतरीं। माँ शीतला ने जैसे ही अपनी झाड़ू से रोगों को बुहारना और कलश के जल से शांति फैलाना शुरू किया, ज्वरासुर और उसके सहायक प्रेत-पिशाच क्रोधित हो उठे। उन्होंने माता के कार्य में विघ्न डालना शुरू कर दिया ताकि महामारी बनी रहे। तब देवी की सहायता के लिए महादेव ने अपने रौद्र रूप 'भैरव' को प्रकट किया। भगवान शिव ने भैरव से कहा: "हे भैरव! तुम देवी के अंगरक्षक और क्षेत्रपाल बनकर उनके साथ रहो। जो भी आसुरी शक्तियाँ या रोगरूपी दानव देवी के मार्ग में आएंगे, उनका संहार करना तुम्हारा उत्तरदायित्व है।" अगर आपको कथा संग्रह की पोस्ट पसंद आती है तो आज ही सब्सक्राइब करें कथा संग्रह भैरव जी ने माता के आदेश को शिरोधार्य किया। तंत्र ग्रंथों के अनुसार, भैरव ने जहाँ एक ओर दुष्टों के लिए काल का रूप धरा, वहीं भक्तों के लिए वे 'बटुक भैरव' (बालक रूप) बनकर माता के साथ चलने लगे। उन्होंने ज्वरासुर का मान मर्दन किया और उसे माता के चरणों में झुकने पर विवश कर दिया। तब से यह परंपरा बन गई कि माँ शीतला जहाँ भी निवास करती हैं, वहाँ भैरव द्वारपाल या क्षेत्रपाल के रूप में पहरा देते हैं। बिना भैरव की अनुमति और उनके दर्शन के, शीतला माता की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। इस कथा का आध्यात्मिक सार यह कहानी केवल दो शक्तियों के मिलन की नहीं है, बल्कि आयुर्वेद और सुरक्षा का संगम है: माँ शीतला: आरोग्य और स्वच्छता का प्रतीक हैं। भैरव: अनुशासन और सुरक्षा का प्रतीक हैं। निष्कर्ष: माँ शीतला की झाड़ू गंदगी (बीमारी की जड़) साफ करती है, कलश का जल घावों को भरता है और भैरव का दंड उन बाहरी नकारात्मक ऊर्जाओं को रोकता है जो दोबारा बीमारी ला सकती हैं। #🤟 सुपर स्टेटस #📜 Whatsapp स्टेटस #जय श्री राम 🙏
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हिंदू परंपरा में देवी षष्ठी को बच्चों की रक्षक देवी माना जाता है और बिल्ली को उनका वाहन कहा जाता है। देवी षष्ठी की पूजा विशेष रूप से नवजात बच्चों की रक्षा और उनके सुख-समृद्ध जीवन के लिए की जाती है। पुराणों के अनुसार देवी षष्ठी प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न देवी हैं, इसलिए उनका नाम “षष्ठी” पड़ा। कुछ ग्रंथों में उन्हें **कार्तिकेय की पत्नी देवसेना का रूप भी माना गया है। राजा प्रियव्रत की कथा पुराणों में एक प्रसिद्ध कथा राजा प्रियव्रत से जुड़ी है। राजा प्रियव्रत धर्मात्मा और प्रतापी राजा थे, लेकिन उन्हें संतान नहीं थी। बहुत समय बाद उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराया। यज्ञ के प्रभाव से उनकी पत्नी को पुत्र हुआ, लेकिन दुर्भाग्य से बच्चा जन्म लेते ही मृत हो गया। राजा अपने मृत पुत्र को गोद में लेकर श्मशान पहुँचे और अत्यंत दुखी होकर विलाप करने लगे। तभी आकाश से एक दिव्य रथ उतरा और उसमें से देवी षष्ठी प्रकट हुईं। देवी ने कहा: “मैं बच्चों की रक्षक देवी हूँ। जो मेरी पूजा करता है उसे संतान सुख और बालकों की रक्षा का आशीर्वाद मिलता है।” राजा ने देवी की स्तुति की और उनसे कृपा माँगी। देवी प्रसन्न हुईं और उस मृत बालक को पुनः जीवित कर दिया। इसके बाद देवी ने कहा कि हर महीने की षष्ठी तिथि पर और बच्चे के जन्म के छठे दिन उनकी पूजा करनी चाहिए। तभी से छठी की पूजा की परंपरा प्रारंभ हुई। इसी मान्यता के कारण हिंदू परंपरा में यह विश्वास है कि बच्चे के जन्म के छठे दिन (छठी) देवी षष्ठी आती हैं वे बच्चे के भाग्य का लेखन करती हैं उस दिन माता विशेष व्रत और पूजा करती है कई स्थानों पर बिल्ली को भी देवी का वाहन मानकर सम्मान दिया जाता है देवी षष्ठी बच्चों की रक्षा और उनके कल्याण की देवी मानी जाती हैं। उनकी पूजा से संतान की रक्षा, स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। #जय श्री राम 🙏 #🤟 सुपर स्टेटस #📜 Whatsapp स्टेटस
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प्राचीन काल में शिलाद मुनि ने भगवान शिव के समान 'मृत्युहीन' और 'अयोनिज' (गर्भ से जन्म न लेने वाले) पुत्र की प्राप्ति के लिए कठोर तप किया। प्रसन्न होकर शिव जी ने स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लेने का वरदान दिया। मुनि जब यज्ञ भूमि जोत रहे थे, तब उनके पसीने की एक बूंद से दिव्य बालक नंदी का प्राकट्य हुआ, जो साक्षात् रुद्र रूप थे। जब नंदी सात वर्ष के हुए, तब मुनि मित्र और वरुण ने उनके अल्पायु होने की भविष्यवाणी की। पिता को शोकाकुल देख नंदी ने शिव की शरण में जाने का निर्णय लिया और वन जाकर घोर तपस्या की। उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव और माता पार्वती प्रकट हुए। शिव जी ने बताया कि वे मुनि तो केवल परीक्षा लेने आए थे, नंदी तो स्वयं शिव का रूप हैं जिन्हें काल का कोई भय नहीं। भगवान शिव ने नंदी को अजर-अमर होने का वरदान दिया, अपने गले की दिव्य कमल माला पहनाई और उन्हें अपने गणों का अध्यक्ष (गणाध्यक्ष) नियुक्त किया। इस प्रकार, नंदी सदा के लिए शिव के समीप स्थित हो गए और मृत्यु पर विजय प्राप्त कर 'अक्षय' पद के अधिकारी बने। हर हर महादेव 🙏 #🤟 सुपर स्टेटस #📜 Whatsapp स्टेटस
🤟 सुपर स्टेटस - ३ नंदी कथाः भक्ति और अनुग्रह का सार सदा पार्श्व में वास हो, नंदी यही प्रतीक| स्वामी के सम्मुख रहे भक्ति यही है ठीक।। ३ नंदी कथाः भक्ति और अनुग्रह का सार सदा पार्श्व में वास हो, नंदी यही प्रतीक| स्वामी के सम्मुख रहे भक्ति यही है ठीक।। - ShareChat
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