चंद्रमा का तेज किसने छीन लिया था? 🌙 जानिये प्रथम ज्योतिर्लिंग 'सोमनाथ' के प्राकट्य का अद्भुत रहस्य! 🔱👇
प्रजापति दक्ष के समझाने पर भी जब चंद्रदेव (सोम) के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया, तो क्रोधित होकर दक्ष ने उन्हें शरीर क्षय (नष्ट) होने का भयंकर श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से चंद्रदेव को क्षय रोग ने जकड़ लिया और उनका सारा तेज और दिव्य सौंदर्य छिन गया। चंद्रदेव की अन्य पत्नियों की प्रार्थना के बाद भी दक्ष अपना श्राप वापस लेने में असमर्थ रहे।
✨ महादेव की शरण और घोर तपस्या:
श्राप से मुक्ति का मार्ग खोजने चंद्रदेव परमपिता ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी के मार्गदर्शन पर, वे सीधे 'प्रभास तीर्थ' गए और वहां विधिवत एक शिवलिंग की स्थापना की। महादेव को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने पूरे छः महीने तक एक पैर पर खड़े रहकर 'महामृत्युंजय मंत्र' का 10 करोड़ बार जाप किया!
🕉️ श्राप से मुक्ति और 'सोमनाथ' का प्राकट्य:
इस घोर तपस्या से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने चंद्रदेव को वरदान दिया कि क्षय रोग से उनकी मृत्यु नहीं होगी, बल्कि कृष्ण पक्ष में 15 दिन उनकी कांति घटेगी और शुक्ल पक्ष में प्रतिदिन बढ़ते हुए पूर्णिमा को वे अपनी पूर्ण कांति प्राप्त कर लेंगे।
चंद्रदेव की भावपूर्ण प्रार्थना पर, महादेव माता पार्वती के साथ उसी ज्योतिर्लिंग में सदा के लिए विराजमान हो गए। चंद्रदेव का एक नाम 'सोम' भी है, इसीलिए उनके द्वारा स्थापित यह पावन शिवलिंग 'सोमेश्वर' या 'सोमनाथ' कहलाया।
मान्यता है कि सोमनाथ महादेव की पूजा करने से व्यक्ति हर प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्त हो जाता है। 🙏
राधे राधे 🌺
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हर हर महादेव 🙏
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अनेकों शोध से पता चलता है की वनस्पति विज्ञान का पितामह होने का श्रेय किसी को दिया जाना चाहिए तो वह ''ऋषि पराशर'' हैं।
इस एक ग्रंथ में ही किसी बीच के पौधे बनने से लेकर पेड़ बनने तक संपूर्णता के साथ वैज्ञानिक विवेचन दिया गया है, वह विस्मयकारी है। इस ''वृक्ष आयुर्वेद'' पुस्तक के छह भाग हैं
अद्भुत ग्रंथ-पाराशर वृक्ष आयुर्वेद ::
इस पुस्तक के 6 भाग हैं-
(1). बीजोत्पत्ति काण्ड, (2). वानस्पत्य काण्ड, (3). गुल्म काण्ड, (4).वनस्पति काण्ड, (5). विरुध वल्ली काण्ड एवं (6) चिकित्सा काण्ड।
इस ग्रंथ के प्रथम भाग बीजोत्पत्ति काण्ड में आठ अध्याय हैं, जिनमें बीज के वृक्ष बनने तक का विवरण है। इसका, इसमें महर्षि पाराशर कहते हैं-
आपोहि कललं भुत्वा यत् पिण्डस्थानुकं भवेत्। तदेवं व्यूहमानत्वात् बीजत्वमघि गच्छति॥
(1). बीजोत्पत्ति सूत्राध्याय :: पहले पानी जैली जैसे पदार्थ को ग्रहण कर न्यूक्लियस बनता है और फिर वह धीरे-धीरे पृथ्वी से ऊर्जा और पोषक तत्व ग्रहण करता है। फिर उसका आदि बीज के रूप में विकास होता है और आगे चलकर कठोर बनकर वृक्ष का रूप धारण करता है। आदि बीज यानी प्रोटोप्लाज्म के बनने की प्रक्रिया है जिसकी अभिव्यक्ति बीजत्व अधिकरण में की गई है।
(2). भूमि वर्गाध्याय :: इसमें मिट्टी के प्रकार, गुण आदि का विस्तृत वर्णन है।
(3). वन वर्गाध्याय :: इसमें 14 प्रकार के वनों का उल्लेख है।
(4). वृक्षांग सूत्राध्याय :: इसमें प्रकाश संश्लेषण यानी फोटो सिंथेसिस की क्रिया के लिए कहा है :- पत्राणि तु वातातपरञ्जकानि अभिगृहन्ति। यह स्पष्ट है कि वात कार्बन डाय आक्साइड, सूर्य प्रकाश और क्लोरोफिल से अपना भोजन वृक्ष बनाते हैं।
(5). पुष्पांग सूत्राध्याय :: इसमें कितने प्रकार के फूल होते हैं, उनके कितने भाग होते हैं, उनका उस आधार पर वर्गीकरण किया गया है। उनमें पराग कहाँ होता है, पुष्पों के हिस्से क्या हैं आदि का उल्लेख है।
(6). फलांग सूत्राध्याय :: इसमें फलों के प्रकार, फलों के गुण और रोग का वर्गीकरण किया गया है।
(7). वृक्षांग सूत्राध्याय :: इसमें वृक्ष के अंगों का वर्णन करते हुए पाराशर कहते है- पत्रं (पत्ते) पुष्प (फूल) मूलं (जड़) त्वक् (शिराओं सहित त्वचा) काण्डम् (स्टिम्) सारं (कठोर तना) सारसं र्नियासा बीजं (बीज) प्ररोहम्-इन सभी अंगों का परस्पर सम्बन्ध होता है।
(8). बीज से पेड़ का विकास :: पाराशर कहते हैं-
बीज मातृका तु बीजस्यम् बीज पत्रन्तुबीजमातृकायामध्यस्थमादि।
पत्रञ्च मातृकाछदस्तु तनुपत्रकवत् मातृकाछादनञ्च कञ्चुकमित्याचक्षते॥
बीजन्तु प्रकृत्या द्विविधं भवति एकमातृकं द्विमातृकञ्च।
तत्रैकपत्रप्ररोहानां वृक्षाणां बीजमेकमातृकं भवति। द्वि पत्र प्ररोहानान्तु द्विमातृकञ्च।
मोनोकॉटिलिडेन और डायकॉटिलिडेन। यानी एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री बीजों का वर्णन है। किस प्रकार बीज धीरे-धीरे रस ग्रहण करके बढ़ते हैं और वृक्ष का रूपधारण करते हैं। कौन सा बीज कैसे उगता है, इसका वर्गीकरण के साथ स्पष्ट वर्णन है। बीज के विभिन्न अंगों के कार्य अंकुरण (जर्मिनेशन) के समय कैसे होते हैं। [वृक्ष आयुर्वेद-द्विगणीयाध्याय]
अंकुरनिर्विते बीजमात्रकाया रस: संप्लवते प्ररोहांगेषु।
यदा प्ररोह: स्वातन्त्रेन भूम्या: पार्थिवरसं गृहणाति तदा बीज मातृका प्रशोषमा पद्यमे॥
वृक्ष रस ग्रहण करता है, बढ़ता है। जड़ बन जाने के बाद बीज मात्रिका यानी बीज पत्रों की आवश्यकता नहीं रहती, वह समाप्त हो जाती है। फिर पत्तों और फलों की संरचना के बारे में कहा है कि वृक्ष का भोजन पत्तों से बनता है। पार्थिव रस जड़ में से स्यंदिनी नामक वाहिकाओं के द्वारा ऊपर आता है। यह रस पत्तों में पहुंच जाता है। जहां पतली-पतली शिराएं जाल की तरह फैली रहती हैं। ये शिरायें दो प्रकार की हैं- “उपसर्प” और “अपसर्प”। वे रस प्रवाह को ऊपर भी ले जाती हैं और नीचे भी ले जाती हैं। दोनों रास्ते अलग-अलग हैं।
“रंजकेन पश्च्यमानात” किसी रंग देने वाली प्रक्रिया से यह पचता है-यानी फोटो सिंथेसिस। यह बड़ा महत्वपूर्ण है।
“उत्पादं-विसर्जयन्ति” पत्तियां फोटो सिंथेसिस से दिन में आक्सीजन निकालती हैं और रात में कार्बन डाय अक्साइड।
दिन में कार्बन डाय आक्साइड लेकर भोजन बनाती हैं। अतिरिक्त वाष्प का विसर्जन करती हैं, जिसे ट्रांसपिरेशन कहते हैं।
जब उसमें से वाष्प का विसर्जन होता है तब उसमें ऊर्जा उत्पन्न होती है, यानी श्वसन की क्रिया का वर्णन है। यह वर्णन बताता है कि किस प्रकार रस का ऊपर चढ़ना, पंक्तियों में जाना, भोजन बनाना, फिर श्वसन द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करना होता है।
इस सारी क्रमिक क्रिया से पेड़ बनता है। इसके अतिरिक्त आज भी कोई दूसरी प्रक्रिया वृक्षों के बढ़ने की ज्ञात नहीं है।
अंग्रेजो ने इसलिए ही संस्कृत भाषा और हमारे प्रामाणिक ग्रंथ हटाकर यह भ्रम पैदा किया की
ये तो धार्मिक ग्रंथ है लोगो को विज्ञान पढ़ना चाहिए
क्या ये ग्रंथ विज्ञान के नही थे.....सोचिए हमने क्या खोया और क्या पाया...??
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श्री दामोदर लीला
यह कथा भगवान श्रीकृष्ण के भक्त-वत्सल स्वरूप को दर्शाती है, जहाँ ब्रह्मांड के स्वामी अपनी माया को छोड़कर भक्त के प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं।
बाल हठ और क्रोध: माता यशोदा जब दूध गरम करने रसोई में गईं, तो बालक कृष्ण ने क्रोधवश माखन के घड़े फोड़ दिए। यह उनकी लीला थी ताकि माता का ध्यान कर्म (काम) से हटकर पूर्णतः उन पर (ईश्वर) पर केंद्रित हो जाए।
पकड़ से परे परमात्मा: यशोदा मैया उन्हें दंड देने के लिए पीछे दौड़ीं। जो परमात्मा योगियों के ध्यान में नहीं आते, वे आज एक मैया के डर से भाग रहे थे। अंततः जब माता थक गईं, तो प्रभु स्वयं ही उनके हाथों में आ गए।
दो अंगुल का अंतर: मैया ने उन्हें ओखली से बाँधना चाहा, पर हर बार रस्सी 'दो अंगुल' छोटी पड़ जाती थी। ये दो अंगुल वास्तव में जीव का 'अहंकार' और 'प्रयास' हैं। जब तक मनुष्य को लगता है कि वह अपने बल पर ईश्वर को पा लेगा, तब तक परमात्मा हाथ नहीं आते।
बंधन का स्वीकार: जब माता पूरी तरह थक गईं और उनका ममत्व (प्रेम) चरम पर पहुँचा, तब श्रीकृष्ण ने स्वयं को बंधवाना स्वीकार किया। प्रेम की इसी रस्सी के कारण उनका नाम 'दामोदर' (दाम = रस्सी, उदर = पेट) पड़ा।
उद्धार की कृपा: बंधे होने के बावजूद प्रभु ने ओखली घसीटते हुए नलकुबेर और मणिग्रीव का उद्धार किया, जो जड़वत (वृक्ष) होकर अपने कर्मों का फल भोग रहे थे।
निष्कर्ष: दामोदर लीला यह सिखाती है कि भगवान को रस्सी से नहीं, बल्कि केवल अनन्य प्रेम और समर्पण से ही बाँधा जा सकता है। जो सारे जगत को बांधते हैं, वे प्रेम के कारण स्वयं बंधने को भी तैयार रहते हैं।
राधे राधे
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एक बार देवर्षि नारद ने पृथ्वीलोक का भ्रमण करने के बाद भगवान विष्णु से शिकायत की कि संसार में न्याय नहीं हो रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि पापियों को सुख मिल रहा है और धर्म की राह पर चलने वाले कष्ट भोग रहे हैं।
नारद जी ने अपनी बात सिद्ध करने के लिए एक घटना बताई—
पापी चोर: एक चोर ने दलदल में फंसी गाय पर पैर रखकर उसे और कष्ट दिया, लेकिन आगे जाने पर उसे सोने की मोहरों से भरी थैली मिली।
धर्मात्मा साधु: उसी गाय को बचाने के लिए एक साधु ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन गाय को मुक्त कराने के बाद वह आगे जाकर गड्ढे में गिर गया।
भगवान विष्णु का समाधान:
प्रभु ने नारद को समझाया कि यह अन्याय नहीं, बल्कि कर्मों का परिमार्जन है।
चोर का भाग्य: चोर के भाग्य में पूर्व कर्मों के कारण वास्तव में एक बड़ा खजाना लिखा था, लेकिन गाय को कष्ट देने के पाप के कारण उसका भाग्य सिमट गया और उसे केवल कुछ मोहरें ही मिलीं।
साधु का भाग्य: साधु के भाग्य में उस समय मृत्यु लिखी थी, लेकिन गाय की रक्षा करने के पुण्य के कारण उसकी अकाल मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई।
निष्कर्ष:
यह कथा सिखाती है कि ईश्वर का न्याय मनुष्य की सीमित बुद्धि से परे है। हमारे पुण्य बड़े संकटों को छोटा कर देते हैं और हमारे पाप हमारे बड़े सुखों को कम कर देते हैं। अंततः, नियति और कर्म का संतुलन कभी नहीं बिगड़ता।
राधे राधे
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जब धन की देवी माता लक्ष्मी और पालनहार भगवान विष्णु अपने-अपने वाहन पर विराजमान होकर कृपा बरसाते हैं, तब इसका अर्थ सिर्फ सोना-चांदी नहीं होता। यह संकेत है कि जहां लक्ष्मी आती हैं वहां समृद्धि आती है, और जहां विष्णु जी की कृपा होती है वहां स्थिरता, सुरक्षा और जीवन में संतुलन आता है। धन तभी टिकता है जब घर में शांति, धर्म और सद्बुद्धि हो। इसलिए केवल कमाने पर नहीं, सही कर्म, सेवा और संयम पर भी ध्यान देना चाहिए।
अगर जीवन में बार-बार धन आता है लेकिन रुकता नहीं, तो रोज सुबह भगवान विष्णु का स्मरण करें और माता लक्ष्मी को दीपक अर्पित करें। धीरे-धीरे रास्ते खुलने लगते हैं, मन शांत होता है और बरकत बढ़ती है।
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जब माता पार्वती ने महादेव से उनके गले में मौजूद मुंडों का रहस्य जान लिया, तब उन्होंने अमर होने की इच्छा प्रकट की। इसी के फलस्वरूप महादेव ने उन्हें अमर कथा सुनाई..
माता पार्वती के हठ करने पर भगवान शिव उन्हें अमरत्व का ज्ञान देने के लिए तैयार हुए। उन्होंने एक ऐसे स्थान का चयन किया जहाँ कोई अन्य जीव उस गोपनीय कथा को न सुन सके। इसके लिए उन्होंने अमरनाथ गुफा को चुना।
गुफा की ओर जाते समय महादेव ने अपने सभी आभूषणों और गणों का त्याग किया (जैसे नंदी को पहलगाम में, चंद्रमा को चंदनवाड़ी में और सर्पों को शेषनाग झील पर छोड़ा)।
गुफा में प्रवेश कर महादेव ने चारों ओर अग्नि प्रज्वलित कर दी ताकि कोई भी जीवित प्राणी अंदर न आ सके।
कथा शुरू होने से पहले, गुफा के भीतर एक सुख चुके पेड़ के खोखल में एक तोते का अंडा पड़ा था। महादेव की उपस्थिति और वहां की ऊर्जा से वह अंडा फूट गया और उसमें से एक छोटा सा शुक (तोता) निकला। अग्नि के घेरे के कारण वह बाहर नहीं जा सका और चुपचाप वहीं छिपा रहा।
महादेव ने माता पार्वती को अमर कथा (ब्रह्म ज्ञान) सुनाना शुरू किया। कथा बहुत लंबी थी। सुनते-सुनते माता पार्वती को थकान महसूस हुई और वे गहरी निद्रा में सो गईं।
महादेव को लगा कि माता कथा सुन रही हैं क्योंकि बीच-बीच में "हुंकारी" (हूँ-हूँ की आवाज) सुनाई दे रही थी।
वास्तव में, वह हुंकारी माता पार्वती नहीं, बल्कि वह **छोटा तोता** भर रहा था ताकि कथा रुक न जाए।
जब कथा समाप्त हुई, तब महादेव ने देखा कि पार्वती जी तो सो रही हैं। उन्होंने आश्चर्य से पूछा कि "फिर हुंकारी कौन भर रहा था?" तभी उनकी दृष्टि उस छोटे तोते पर पड़ी। महादेव क्रोधित हो गए कि एक पक्षी ने अमर कथा सुन ली है। वे उसे मारने के लिए दौड़े।
वह तोता अपनी जान बचाकर भागा और सीधे महर्षि वेदव्यास जी के आश्रम पहुँचा।
वहां व्यास जी की पत्नी वाटिका जम्हाई ले रही थीं। वह छोटा तोता सूक्ष्म रूप धारण कर उनके मुख के रस्ते उनके गर्भ में प्रविष्ट हो गया।
वह बालक 12 वर्षों तक गर्भ से बाहर नहीं आया क्योंकि उसे डर था कि बाहर आते ही वह माया के जाल में फंस जाएगा।
स्वयं भगवान कृष्ण के आश्वासन के बाद वह बालक बाहर आया, जो आगे चलकर महान ज्ञानी महर्षि शुकदेव कहलाए।
चूंकि शुकदेव जी ने भगवान शिव के मुख से स्वयं अमर कथा सुनी थी, इसलिए वे जन्म से ही आत्मज्ञानी और माया से मुक्त थे। उन्होंने ही बाद में राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा सुनाई थी
हर हर महादेव 🙏
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"सूफियों द्वारा भारत का इस्लामीकरण"
#डॉ_विवेक_आर्य
हिन्दू समाज में भी यही माना जाता है कि हिंदुस्तान में जितने भी मुस्लमान सूफी, फकीर और पीर आदि हुए हैं, वे सभी उदारवादी थे। हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। वे भारतीय दर्शन और ध्यान योग की उपज थे। मगर यह एक भ्रान्ति है। भारत देश पर इस्लामिक आकर्मण दो रूपों में हुआ था। प्रथम इस्लामिक आक्रमणकर्ताओं द्वारा एक हाथ में तलवार और एक में क़ुरान लेकर भारत के शरीर और आत्मा पर जख्म पर जख्म बनाते चले गए। दूसरा सूफियों द्वारा मुख में भजन, कीर्तन, चमत्कार के दावे और बगल में क़ुरान दबाये हुए पीड़ित भारतीयों के जख्मों पर मरहम लगाने के बहाने इस्लाम में दीक्षित करना था। सूफियों को इस्लाम में दीक्षित करने वाली संस्था कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस लेख में हम ऐतिहासिक प्रमाणों के माध्यम से यह जानेंगे की सूफियों द्वारा
भारत का इस्लामीकरण किस प्रकार किया गया।
सूफियों के कारनामें
हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कर उन्हें मुसलमान बनाने के लिए सूफियों ने साम-दाम, दंड-भेद की नीति से लेकर तलवार उठाने तक सभी नैतिक और अनैतिक तरीकों का भरपूर प्रयोग किया।
1. शाहजहाँ की मुल्ला मुहीबीब अली सिन्धी नामक सूफी आलिम से अभिन्नता थी। शाहजहाँ ने इस सूफी संत को हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करने की आज्ञा दी थी[i]।
2. सूफी कादरिया खानकाह के शेख दाऊद और उनके शिष्य शाह अब्दुल माली के विषय में कहा जाता है कि वे 50 से 100 हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करते थे[ii]।
3.सूफी शेख अब्दुल अज़ीज़ द्वारा अनेक हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित किया गया[iii]।
4. सूफी मीरान भीख के जीवन का एक प्रसंग मिलता है। एक हिन्दू जमींदार बीरबर को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। उसने सूफी मीरान भीख से सजा मांफी की गुहार लगाई। सूफी ने इस्लाम कबूल करने की शर्त लगाई। हिन्दू बीरबर मुसलमान बन गया। सूफी ने इस्लाम की सेवा में उसे रख लिया[iv]।
5. दारा शिकोह के अनुसार सूफी शेख अब्दुल क़ादिर द्वारा अनेक हिन्दुओं को मुसलमान बनाया गया[v]।
6. मीर सैय्यद अली हमदानी द्वारा कश्मीर का बड़े पैमाने पर इस्लामीकरण किया गया। श्रीनगर के काली मंदिर को तोड़कर उसने अपनी खानकाह स्थापित करी थी। हिन्दू ब्राह्मणों को छलने के लिए हमदानी के शिष्य नूरुद्दीन ने नुंद ऋषि के नाम से अपने को प्रसिद्द कर लिया। नूरुद्दीन ने श्रीनगर की प्रसिद्द हिन्दू उपासक लाल देह के हिन्दू रंग में अपने को पहले रंग लिया। फिर उसके उपासकों को प्रभावित कर इस्लाम में दीक्षित कर दिया। उसके मुख्य शिष्यों के नाम बामुद्दीन, जैनुद्दीन, लतीफुद्दीन आदि रख दिया।ये सभी जन्म से ब्राह्मण थे[vi]।
सूफियों द्वारा इस्लाम की सेवा करने के लिए मुस्लिम शासकों को हिन्दुओं पर अत्याचार करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। जिससे हिन्दू तंग आकर इस्लाम ग्रहण कर ले।
1. अल्तमश द्वारा नियुक्त सुहरावर्दी ख़लीफ़ा सैय्यद नूरुद्दीन मुबारक ने इस्लाम की सेवा के लिए
- शरिया लागु करना।
-मूर्तिपूजा और बहुदेवतावाद को कुफ्र घोषित करना।
-मूर्तिपूजक हिन्दुओं को प्रताड़ित करना।
-हिन्दुओं विशेष रूप से ब्राह्मणों को दंड देना।
-किसी भी उच्च पद पर किसी भी हिन्दू को न आसीन करना[vii]।
2. बंगाल के सुल्तान गियासुद्दीन आज़म को फिरदवासिया सूफी शेख मुज्जफर ने पत्र लिख कर किसी भी काफिर को किसी भी सरकारी उच्च पद पर रखने से साफ़ मना किया। शेख ने कहा इस्लाम के बन्दों पर कोई काफिर हुकुम जारी न कर सके। ऐसी व्यवस्था करे। इस्लाम, हदीस आदि में ऐसे स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं[viii]।
3. मीर सैय्यद अली हमदानी द्वारा कश्मीर के सुलतान को हिन्दुओं के सम्बन्ध में राजाज्ञा लागु करने का परामर्श दिया गया था। इस परामर्श में हिन्दुओं के साथ कैसा बर्ताव करे। यह बताया गया था।
-हिन्दुओं को नए मंदिर बनाने की कोई इजाजत न हो।
-हिन्दुओं को पुराने मंदिर की मरम्मत की कोई इजाजत न हो।
-मुसलमान यात्रियों को हिन्दू मंदिरों में रुकने की इजाज़त हो।
- मुसलमान यात्रियों को हिन्दू अपने घर में कम से कम तीन दिन रुकवा कर उनकी सेवा करे।
-हिन्दुओं को जासूसी करने और जासूसों को अपने घर में रुकवाने का कोई अधिकार न हो।
-कोई हिन्दू इस्लाम ग्रहण करना चाहे तो उसे कोई रोकटोक न हो।
-हिन्दू मुसलमानों को सम्मान दे एवं अपने विवाह में आने का उन्हें निमंत्रण दे।
-हिन्दुओं को मुसलमानों जैसे वस्त्र पहनने और नाम रखने की इजाजत न हो।
-हिन्दुओं को काठी वाले घोड़े और अस्त्र-शस्त्र रखने की इजाजत न हो।
-हिन्दुओं को रत्न जड़ित अंगूठी पहनने का अधिकार न हो।
-हिन्दुओं को मुस्लिम बस्ती में मकान बनाने की इजाजत न हो।
-हिन्दुओं को मुस्लिम कब्रिस्तान के नजदीक से शव यात्रा लेकर जाने और मुसलमानों के कब्रिस्तान में शव गाड़ने की इजाजत न हो।
-हिन्दुओं को ऊँची आवाज़ में मृत्यु पर विलाप करने की इजाजत न हो।
-हिन्दुओं को मुस्लिम गुलाम खरीदने की इजाजत न हो।
मेरे विचार से इससे आगे कुछ कहने की आवश्यता ही नहीं है[ix]।
4. सूफी शाह वलीउल्लाह द्वारा दिल्ली के सुल्तान अहमद शाह को हिन्दुओं को उनके त्योहार बनाने से मना किया गया। उन्हें होली बनाने और गंगा स्नान करने से रोका जाये। सुन्नी फिरके से सम्बंधित होने के कारण सूफी शाह वलीउल्लाह द्वारा शिया फिरके पर पाबन्दी लगाने की सलाह दी गई। शिया मुसलमानों को ताजिये निकालने और छाती पीटने पर पाबन्दी लगाने की सलाह दी गई[x]।
5. मीर मुहम्मद सूफी और सुहा भट्ट की सलाह पर कश्मीर के सुल्तान सिकंदर ने अनंतनाग,मार्तण्ड, सोपुर और बारामुला के प्राचीन हिन्दुओं के मंदिरों को नष्ट कर दिया। हिन्दुओं पर जज़िया कर लगाया गया। कश्मीरी हिन्दू ब्राह्मणों को सरकारी पदों से हटाकर ईरान से मौलवियों को बुलाकर बैठा दिया गया[xi]।
सूफियों द्वारा हिन्दू मंदिरों का विनाश।
इतिहास में अनेक उदहारण मिलते हैं जब सूफियों ने अनेक हिन्दू मंदिरों का स्वयं विध्वंश किया अथवा मुस्लिम शासकों को ऐसा करने की प्रेरणा दी।
1. सूफी मियां बयान अजमेर में ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के समीप रहता था। गुजरात से बहादुर शाह जब अजमेर आया तो सूफी मियां उससे मिले। उस समय राजगद्दी को लेकर गुजरात में अनेक मतभेद चल रहे थे। मियां ने बहादुर शाह की खूब आवभगत करी और उसे अजमेर को राजपूत काफिरों से मुक्त करने की गुजारिश करी। बाद में शासक बनने पर बहादुर शाह ने अजमेर पर हमला कर दिया। हिन्दू मंदिरों का सहार कर उसने अपने वायदे को निभाया[xii]।
2. लखनौती बंगाल में रहने वाले सुहरावर्दी शेख जलालुद्दीन ने उत्तरी बंगाल के देवताला (देव महल) में जाकर एक विशाल मंदिर का विध्वंश कर उसे पहले खानकाह में तब्दील किया फिर हज़ारों हिन्दू और बुद्धों को इस्लाम में दीक्षित किया[xiii]।
सूफियों द्वारा हिन्दू राज्यों पर इस्लामिक शासकों द्वारा हमला करने के लिए उकसाना
1. चिश्ती शेख नूर क़ुतुब आलम ने बंगाल के दिनाजपुर के राजा गणेश की बढ़ते शासन से क्षुब्ध होकर जौनपर के इस्लामिक शासक सुल्तान इब्राहिम शाह को हमला करने के लिए न्योता दिया। गणेश राजा ने भय से अपने बेटे को इस्लाम काबुल करा अपनी सत्ता बचाई[xiv]।
2. शेख गौस द्वारा ग्वालियर के किले को जितने में बाबर की सहायता करी गई थी[xv]।
3. शेख अहमद शाहिद द्वारा नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में हज़ारों अनुयाइयों को नमाज पढ़ने के बाद सिखों के राज को हटाने के लिए इस्लाम के नाम पर रजामंद किया गया[xvi]।
सूफियों का हिन्दुओं के प्रति सौतेला व्यवहार
हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के नाम से प्रसिद्द सूफियों का हिन्दुओं के प्रति व्यवहार मतान्ध और संकुचित सोच वाला था।
1. सूफी वलीउल्लाह का कहना था की मुसलमानों को हिन्दुओं के घरों से दूर रहना चाहिए जिससे उन्हें उनके घर के चूल्हे न देखने पड़े[xvii]। यही वलीउल्लाह सुल्तान मुहम्मद गजनी को खिलाफत-ए-खास के बाद इस्लाम का सबसे बड़ा शहंशाह मानता था। उसका कहना था की मुहम्मद के इतिहासकारों ने नहीं पहचाना की मुहम्मद गजनी की जन्मपत्री मुहम्मद साहिब से मिलती थी इसीलिए उसे जिहाद में आशातीत सफलता प्राप्त हुई[xviii]। हिन्दुओं पर अथाह अत्याचार करने वाले ग़जनी की प्रसंशा करने वाले को क्या आप हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक मानना चाहेंगे?
2. सूफी सुहरावर्दी शेख जलालुद्दीन द्वारा अल्लाह को हिन्दुओं द्वारा ठाकुर, धनी और करतार जैसे शब्दों का प्रयोग करने से सख्त विरोध था[xix]।
इस लेख के माध्यम से हमने भारत वर्ष के पिछले 1200 वर्षों के इतिहास में से सप्रमाण
कुछ उदहारण दिए है जिनसे यह सिद्ध होता हैं सूफियों का मूल उद्देश्य भारत का इस्लामीकरण करना था। अजमेर के ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया, बहराइच के सालार गाज़ी मियां के विषय में कब्र पूजा: मूर्खता अथवा अन्धविश्वास नामक लेख में विस्तार से प्रकाश डाला जायेगा। आशा है इस लेख को पढ़कर पाठकों की इस भ्रान्ति का निवारण हो जायेगा की सूफी संतों का कार्य शांति और भाईचारे का पैगाम देना था।
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सोमनाथ
जब दक्ष को ये पता चला कि उनके समझाने का चंद्र पर कोई असर नहीं हुआ तो उन्होंने चंद्र को श्राप दिया कि उनका शरीर क्षय हो जाये। इस श्राप के मिलते ही चंद्रदेव को क्षयरोग ने अपने चंगुल में ले लिया और उनकी सारी कांति और सौंदर्य जाता रहा। जब उनकी अन्य पत्नियों ने अपनी पति की ये दशा देखी तो उन्होंने अपने पिता से प्रार्थना की कि वे अपना श्राप वापस ले लें किन्तु दक्ष ने अपना श्राप वापस लेने में अपनी असमर्थता दिखाई।
तब चंद्रदेव परमपिता ब्रह्मा के शरण में पहुँचे और उनसे इस श्राप के निदान का उपाय पूछा। ब्रह्मदेव ने कहा कि केवल महादेव ही इसका निदान कर सकते हैं और उन्होंने चंद्र को प्रभास तीर्थ जाकर महादेव की तपस्या करने को कहा। ब्रह्मदेव की आज्ञा अनुसार चंद्रदेव प्रभास तीर्थ पहुँचे और उन्होंने वहाँ विधिवत एक शिवलिंग की स्थापना की। उसके बाद उन्होंने उसी शिवलिंग के समक्ष भगवान शिव की घोर तपस्या आरम्भ की। उन्होंने छः मास तक अपने एक पैर पर खड़े रहकर महामृत्युञ्जय मन्त्र का दस करोड़ जाप पूरा किया।
उनकी इस घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें आशीर्वाद दिया कि क्षय रोग से उन्हें कोई क्षति नहीं होगी किन्तु उनकी कांति आधे मास तक प्रतिदिन घटेगी और फिर प्रतिदिन बढ़ते हुए वे अपनी पूर्ण कांति को प्राप्त कर लेंगे। इसपर चंद्रदेव ने उन्हें दंडवत प्रणाम किया और उनसे प्रार्थना की कि वे ज्योतिर्लिंग के रूप में वहीँ निवास करें। तब से महादेव देवी पार्वती के साथ वहाँ विद्यमान हो गए। चंद्रदेव का एक नाम सोम भी है इसीलिए उनके द्वारा स्थापित होने के कारण वे सोमेश्वर या सोमनाथ कहलाये। सोमनाथ में पूजा करने से व्यक्ति हर प्रकार के रोग से मुक्त हो जाता है।
राधे राधे
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अर्गला स्तोत्र की अद्भुत महिमा 🌺 जानिए कैसे यह स्तोत्र बनता है साधक का दिव्य कवच
अर्गला स्तोत्र दुर्गा सप्तशती का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। यह केवल स्तुति नहीं, अपितु साधक के लिए एक दिव्य कवच का कार्य करता है। इस स्तोत्र में माँ जगदम्बा से तीनों प्रकार के संतापों—आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक—से रक्षा की प्रार्थना की गई है। आइए इसकी गूढ़ महिमा को विस्तार से समझें।
🌿 अर्गला स्तोत्र का आध्यात्मिक रहस्य
कवच द्वारा रक्षा:
अर्गला स्तोत्र में साधक माँ भगवती से प्रार्थना करता है कि वे उसके वातावरण, दसों दिशाओं और अंग-प्रत्यंग की रक्षा करें। यह केवल शारीरिक रक्षा नहीं है, अपितु सूक्ष्म शरीर की भी सुरक्षा का विधान है।
· वातावरण रक्षा: साधक के आसपास का संपूर्ण वातावरण दिव्य ऊर्जा से आवृत हो जाता है।
· दिशाओं की रक्षा: दसों दिशाओं में माँ की शक्ति स्थापित हो जाती है, जिससे कोई नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर पाती।
· अंग-प्रत्यंग की रक्षा: नेत्र, कर्ण, मुख, हृदय आदि सभी अंगों पर माँ का कवच स्थापित हो जाता है।
· त्रिविध संताप से रक्षा: आधिदैविक (दैवीय प्रकोप), आधिभौतिक (सांसारिक कष्ट) और आध्यात्मिक (मानसिक पीड़ा) तीनों प्रकार के दुःखों से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है।
🌸 अर्गला स्तुति का फल विधान
अर्गला स्तोत्र के पाठ से साधक को जो फल प्राप्त होते हैं, वे अत्यंत दुर्लभ हैं:
· रूप की प्राप्ति: साधक का मुख मंडल तेजस्वी और दिव्य आभा युक्त हो जाता है।
· वर्ण की शुद्धि: वाणी में माधुर्य और प्रभाव की वृद्धि होती है।
· जप सिद्धि: किए गए जप का फल शीघ्र और पूर्ण रूप से प्राप्त होता है।
· यश की वृद्धि: साधक का यश दसों दिशाओं में फैलता है।
🔱 कीलक का गूढ़ रहस्य
कीलक स्तोत्र में एक अत्यंत गोपनीय विधान बताया गया है। यह विधान साधक के लिए सर्वस्व समर्पण का प्रतीक है:
· विशेष तिथियां: दीपावली की चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी) तथा वासंतिक या शारदीय नवरात्रि की अष्टमी तिथि।
· विधान: इन पवित्र तिथियों पर साधक को अपना सर्वस्व—धन, मान, तन, मन—जगदम्बा के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए।
· पुनः ग्रहण: समर्पण के पश्चात माँ की कृपा से ही उसे पुनः ग्रहण करना चाहिए। यह क्रिया अहंकार के विसर्जन और माँ पर पूर्ण निर्भरता का प्रतीक है।
🕉️ अथर्वशीर्ष का दार्शनिक ज्ञान
देवी अथर्वशीर्ष में महामाया के स्वरूप का अत्यंत गूढ़ वर्णन मिलता है:
नवार्ण मंत्र की रचना:
नवार्ण मंत्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) की रचना और उसके प्रत्येक वर्ण का अर्थ अथर्वशीर्ष में समझाया गया है। यह केवल शब्द नहीं, अपितु चैतन्य शक्ति के बीज हैं। इस मंत्र के ज्ञान से साधक गुणातीत अवस्था को प्राप्त करता है।
वाक् की चार अवस्थाएं:
देवी ने ही वाक् (वाणी) की रचना की है, जो चार रूपों में प्रकट होती है:
1. परा वाक्: यह मूलाधार चक्र में स्थित है। यह ध्वनि रहित, नाद रूपिणी है। यही मूलविद्यारूपा है और परब्रह्म के साथ एकाकार है।
2. पश्यन्ती वाक्: परा से उत्पन्न होकर यह मणिपुर चक्र तक पहुंचती है। यहां अर्थ का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। यह योगियों के लिए गम्य है।
3. मध्यमा वाक्: यह विशुद्ध चक्र में स्थित है। यहां ध्वनि का आभास होने लगता है किंतु वह स्पष्ट नहीं होती।
4. वैखरी वाक्: मुख से निकलने वाली स्पष्ट ध्वनि वैखरी कहलाती है। यही सांसारिक वाणी है।
विश्वमोहिनी शक्ति:
यही देवी परमेश्वर की शक्ति स्वरूपा हैं। यही विश्व को मोहित करने वाली हैं और तैंतीस देवताओं—आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य—के रूप में विराजमान हैं।
📿 पंच अंगों की महिमा
दुर्गा सप्तशती के ये पांच अंग एक साथ मिलकर संपूर्ण साधना का निर्माण करते हैं:
1. कवच: रक्षा का विधान
2. अर्गला: स्तुति और फल प्राप्ति का विधान
3. कीलक: समर्पण और गोपनीयता का विधान
4. हृदय: भावना और आंतरिक जागरण का विधान
5. सहस्रनाम: सहस्र नामों द्वारा माँ के अनंत स्वरूपों का स्मरण
गुरु का महत्व:
इन पांचों अंगों का वास्तविक ज्ञान केवल सद्गुरु के माध्यम से ही प्राप्त होता है। बिना गुरु के इनका पाठ तो किया जा सकता है, किंतु इनमें निहित चैतन्य शक्ति का जागरण गुरु कृपा के बिना संभव नहीं है।
संस्कृत श्लोक:
अर्गलां कीलकं चैव रहस्यं हृदयं तथा ।
जप्त्वा पंचांगमेतच्च पठेत् सप्तशतीं सुधीः ॥
भावार्थ: बुद्धिमान साधक को चाहिए कि वह अर्गला, कीलक, रहस्य, हृदय और कवच—इन पांच अंगों का जप करने के पश्चात ही सप्तशती का पाठ करे।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
भावार्थ: जो देवी संपूर्ण भूतों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उनको बारंबार नमस्कार है।
साधक के लिए विशेष निर्देश:
· अर्गला स्तोत्र का पाठ सप्तशती पाठ से पूर्व अवश्य करें।
· नवरात्रि की अष्टमी और दीपावली की चतुर्दशी पर विशेष रूप से इसका पाठ करें।
· पाठ करते समय मन में पूर्ण समर्पण का भाव रखें।
· यदि संभव हो तो गुरु से इन मंत्रों की दीक्षा अवश्य ले
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🚩 परशुराम जन्मोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं 🚩
भगवान परशुराम जी त्याग, तप, साहस और धर्म के प्रतीक हैं। उन्होंने अन्याय, अधर्म और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष कर समाज को सत्य और न्याय का मार्ग दिखाया।
उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि
धर्म की रक्षा के लिए सदैव सजग रहें और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं।
आज के इस पावन अवसर पर आइए हम सभी उनके आदर्शों को अपनाकर समाज में सत्य, न्याय और सेवा की भावना को और मजबूत करें।
धर्म की रक्षा, अधर्म का विनाश — यही है भगवान परशुराम का संदेश।
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