एक बार देवर्षि नारद ने पृथ्वीलोक का भ्रमण करने के बाद भगवान विष्णु से शिकायत की कि संसार में न्याय नहीं हो रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि पापियों को सुख मिल रहा है और धर्म की राह पर चलने वाले कष्ट भोग रहे हैं।
नारद जी ने अपनी बात सिद्ध करने के लिए एक घटना बताई—
पापी चोर: एक चोर ने दलदल में फंसी गाय पर पैर रखकर उसे और कष्ट दिया, लेकिन आगे जाने पर उसे सोने की मोहरों से भरी थैली मिली।
धर्मात्मा साधु: उसी गाय को बचाने के लिए एक साधु ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन गाय को मुक्त कराने के बाद वह आगे जाकर गड्ढे में गिर गया।
भगवान विष्णु का समाधान:
प्रभु ने नारद को समझाया कि यह अन्याय नहीं, बल्कि कर्मों का परिमार्जन है।
चोर का भाग्य: चोर के भाग्य में पूर्व कर्मों के कारण वास्तव में एक बड़ा खजाना लिखा था, लेकिन गाय को कष्ट देने के पाप के कारण उसका भाग्य सिमट गया और उसे केवल कुछ मोहरें ही मिलीं।
साधु का भाग्य: साधु के भाग्य में उस समय मृत्यु लिखी थी, लेकिन गाय की रक्षा करने के पुण्य के कारण उसकी अकाल मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई।
निष्कर्ष:
यह कथा सिखाती है कि ईश्वर का न्याय मनुष्य की सीमित बुद्धि से परे है। हमारे पुण्य बड़े संकटों को छोटा कर देते हैं और हमारे पाप हमारे बड़े सुखों को कम कर देते हैं। अंततः, नियति और कर्म का संतुलन कभी नहीं बिगड़ता।
राधे राधे
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