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अनेकों शोध से पता चलता है की वनस्पति विज्ञान का पितामह होने का श्रेय किसी को दिया जाना चाहिए तो वह ''ऋषि पराशर'' हैं। इस एक ग्रंथ में ही किसी बीच के पौधे बनने से लेकर पेड़ बनने तक संपूर्णता के साथ वैज्ञानिक विवेचन दिया गया है, वह विस्मयकारी है। इस ''वृक्ष आयुर्वेद'' पुस्तक के छह भाग हैं अद्भुत ग्रंथ-पाराशर वृक्ष आयुर्वेद :: इस पुस्तक के 6 भाग हैं- (1). बीजोत्पत्ति काण्ड, (2). वानस्पत्य काण्ड, (3). गुल्म काण्ड, (4).वनस्पति काण्ड, (5). विरुध वल्ली काण्ड एवं (6) चिकित्सा काण्ड। इस ग्रंथ के प्रथम भाग बीजोत्पत्ति काण्ड में आठ अध्याय हैं, जिनमें बीज के वृक्ष बनने तक का विवरण है। इसका, इसमें महर्षि पाराशर कहते हैं- आपोहि कललं भुत्वा यत्‌ पिण्डस्थानुकं भवेत्‌। तदेवं व्यूहमानत्वात्‌ बीजत्वमघि गच्छति॥ (1). बीजोत्पत्ति सूत्राध्याय :: पहले पानी जैली जैसे पदार्थ को ग्रहण कर न्यूक्लियस बनता है और फिर वह धीरे-धीरे पृथ्वी से ऊर्जा और पोषक तत्व ग्रहण करता है। फिर उसका आदि बीज के रूप में विकास होता है और आगे चलकर कठोर बनकर वृक्ष का रूप धारण करता है। आदि बीज यानी प्रोटोप्लाज्म के बनने की प्रक्रिया है जिसकी अभिव्यक्ति बीजत्व अधिकरण में की गई है। (2). भूमि वर्गाध्याय :: इसमें मिट्टी के प्रकार, गुण आदि का विस्तृत वर्णन है। (3). वन वर्गाध्याय :: इसमें 14 प्रकार के वनों का उल्लेख है। (4). वृक्षांग सूत्राध्याय :: इसमें प्रकाश संश्लेषण यानी फोटो सिंथेसिस की क्रिया के लिए कहा है :- पत्राणि तु वातातपरञ्जकानि अभिगृहन्ति। यह स्पष्ट है कि वात कार्बन डाय आक्साइड, सूर्य प्रकाश और क्लोरोफिल से अपना भोजन वृक्ष बनाते हैं। (5). पुष्पांग सूत्राध्याय :: इसमें कितने प्रकार के फूल होते हैं, उनके कितने भाग होते हैं, उनका उस आधार पर वर्गीकरण किया गया है। उनमें पराग कहाँ होता है, पुष्पों के हिस्से क्या हैं आदि का उल्लेख है। (6). फलांग सूत्राध्याय :: इसमें फलों के प्रकार, फलों के गुण और रोग का वर्गीकरण किया गया है। (7). वृक्षांग सूत्राध्याय :: इसमें वृक्ष के अंगों का वर्णन करते हुए पाराशर कहते है- पत्रं (पत्ते) पुष्प (फूल) मूलं (जड़) त्वक्‌ (शिराओं सहित त्वचा) काण्डम्‌ (स्टिम्‌) सारं (कठोर तना) सारसं र्नियासा बीजं (बीज) प्ररोहम्‌-इन सभी अंगों का परस्पर सम्बन्ध होता है। (8). बीज से पेड़ का विकास :: पाराशर कहते हैं- बीज मातृका तु बीजस्यम्‌ बीज पत्रन्तुबीजमातृकायामध्यस्थमादि। पत्रञ्च मातृकाछदस्तु तनुपत्रकवत्‌ मातृकाछादनञ्च कञ्चुकमित्याचक्षते॥ बीजन्तु प्रकृत्या द्विविधं भवति एकमातृकं द्विमातृकञ्च। तत्रैकपत्रप्ररोहानां वृक्षाणां बीजमेकमातृकं भवति। द्वि पत्र प्ररोहानान्तु द्विमातृकञ्च। मोनोकॉटिलिडेन और डायकॉटिलिडेन। यानी एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री बीजों का वर्णन है। किस प्रकार बीज धीरे-धीरे रस ग्रहण करके बढ़ते हैं और वृक्ष का रूपधारण करते हैं। कौन सा बीज कैसे उगता है, इसका वर्गीकरण के साथ स्पष्ट वर्णन है। बीज के विभिन्न अंगों के कार्य अंकुरण (जर्मिनेशन) के समय कैसे होते हैं। [वृक्ष आयुर्वेद-द्विगणीयाध्याय] अंकुरनिर्विते बीजमात्रकाया रस: संप्लवते प्ररोहांगेषु। यदा प्ररोह: स्वातन्त्रेन भूम्या: पार्थिवरसं गृहणाति तदा बीज मातृका प्रशोषमा पद्यमे॥ वृक्ष रस ग्रहण करता है, बढ़ता है। जड़ बन जाने के बाद बीज मात्रिका यानी बीज पत्रों की आवश्यकता नहीं रहती, वह समाप्त हो जाती है। फिर पत्तों और फलों की संरचना के बारे में कहा है कि वृक्ष का भोजन पत्तों से बनता है। पार्थिव रस जड़ में से स्यंदिनी नामक वाहिकाओं के द्वारा ऊपर आता है। यह रस पत्तों में पहुंच जाता है। जहां पतली-पतली शिराएं जाल की तरह फैली रहती हैं। ये शिरायें दो प्रकार की हैं- “उपसर्प” और “अपसर्प”। वे रस प्रवाह को ऊपर भी ले जाती हैं और नीचे भी ले जाती हैं। दोनों रास्ते अलग-अलग हैं। “रंजकेन पश्च्यमानात” किसी रंग देने वाली प्रक्रिया से यह पचता है-यानी फोटो सिंथेसिस। यह बड़ा महत्वपूर्ण है। “उत्पादं-विसर्जयन्ति” पत्तियां फोटो सिंथेसिस से दिन में आक्सीजन निकालती हैं और रात में कार्बन डाय अक्साइड। दिन में कार्बन डाय आक्साइड लेकर भोजन बनाती हैं। अतिरिक्त वाष्प का विसर्जन करती हैं, जिसे ट्रांसपिरेशन कहते हैं। जब उसमें से वाष्प का विसर्जन होता है तब उसमें ऊर्जा उत्पन्न होती है, यानी श्वसन की क्रिया का वर्णन है। यह वर्णन बताता है कि किस प्रकार रस का ऊपर चढ़ना, पंक्तियों में जाना, भोजन बनाना, फिर श्वसन द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करना होता है। इस सारी क्रमिक क्रिया से पेड़ बनता है। इसके अतिरिक्त आज भी कोई दूसरी प्रक्रिया वृक्षों के बढ़ने की ज्ञात नहीं है। अंग्रेजो ने इसलिए ही संस्कृत भाषा और हमारे प्रामाणिक ग्रंथ हटाकर यह भ्रम पैदा किया की ये तो धार्मिक ग्रंथ है लोगो को विज्ञान पढ़ना चाहिए क्या ये ग्रंथ विज्ञान के नही थे.....सोचिए हमने क्या खोया और क्या पाया...?? . #जय श्री राम 🙏 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
जय श्री राम 🙏 - क्या आपको पता है..?१ 7904 SYuned Pasi 31 lulsu वर्ष १८४३ ई. में जन्मे एक वनस्पतिशास्त्री रॉबर्ट कोच ने अपने माइक्रोस्कोप की मदद से दुनिया को पादप कोशिका Glant cell) और उसकी संरचना के बारे में समझाया। उस तिथि से एक हजार छह सौ साल पहले , ऋषि पराशर ने प्रथम शताब्दी ईस्वी में संस्कृत ग्रंथ "वृक्ष आयुर्वेद" में पादप कोशिका की संरचना को स्पष्ट रूप से समझाया था। क्या आपको पता है..?१ 7904 SYuned Pasi 31 lulsu वर्ष १८४३ ई. में जन्मे एक वनस्पतिशास्त्री रॉबर्ट कोच ने अपने माइक्रोस्कोप की मदद से दुनिया को पादप कोशिका Glant cell) और उसकी संरचना के बारे में समझाया। उस तिथि से एक हजार छह सौ साल पहले , ऋषि पराशर ने प्रथम शताब्दी ईस्वी में संस्कृत ग्रंथ "वृक्ष आयुर्वेद" में पादप कोशिका की संरचना को स्पष्ट रूप से समझाया था। - ShareChat