#ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹
🌸यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्।।
यौवन, धन संपत्ति, प्रभुता और अविवेक इनमें से एक भी अनर्थ करने वाला है। लेकिन जिसके पास ये चारों हों, उसके विषय में कहना ही क्या !
🌾न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान् नरः।
एतदेवातिपाण्डित्यं यत्स्वल्पाद् भूरिरक्षणम्।।
थोड़े के लिए अधिक का नाश न करे, बुद्धिमत्ता इसी में है। बल्कि थोड़े को छोड़कर अधिक की रक्षा करे।
🍁कवचिद् रुष्टः क्वचित्तुष्टो रुष्टस्तचष्टः क्षणे क्षणे।
अव्यवस्थितचित्तस्य प्रसादो अपि भयंकरः।।
जो कभी नाराज होता है, कभी प्रसन्न होता है। इस प्रकार क्षण क्षण में नाराज और प्रसन्न होता रहता है। उस चंचल चित्त पुरुष की प्रसन्नता भी भयंकर है।
🌱विभवे भोजने दाने तिष्ठन्ति प्रियवादिनः।
विपत्ते चागते अन्यत्र दृश्यन्ते खलु साधवः।।
मनुष्य के सुख- समृद्धि के समय, खान- पान और मान के समय चिकनी चुपड़ी बातें करने वालों की भीड़ लगी रहती है। लेकिन विपत्ति के समय केवल सज्जन पुरुष ही साथ दिखाई पड़ते हैं।
🌴भवन्ति नम्रास्तरवः फलागमै-
र्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः
स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्।
फल लगने पर पेड़ झुक जाते हैं। जल से भरे बादल नीचे आ जाते हैं। सज्जन लोग धन पाकर विनम्र हो जाते हैं। यही परोपकारियों का स्वभाव है।
🌾वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि।
लोकोत्तराणां चेतांसि को नु विज्ञातुमर्हति।।
महापुरुषों के मन की थाह कौन पा सकता है। जो अपने दुखों में वज्र से भी कठोर और दूसरों के दुखों के लिए फूल सभी अधिक कोमल हो जाता है।
🌹उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये।
पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्द्धनम्।।
अर्थ- मूर्खों को दिया गया उपदेश उनके क्रोध को शांत न करके और बढ़ाता ही है। जैसे सर्पों को दूध पिलाने से उनका विष ही बढ़ता है।
🌿दुष्कृतं हि मनुष्याणां अन्नमाश्रित्य तिष्ठति।
अश्नाति यो हि यस्यान्नं स तस्याश्नाति किल्बिषम्।।
मनुष्य के दुष्कृत्य या पाप उसके अन्न में रहते हैं। जो जिसका अन्न खाता है। वह उसके पाप को भी खाता है।
🌵यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यंचों अपि सहायताम्।
अपन्थानं तु गच्छन्तं सोदरोपि विमुञ्चति।।
धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने वाली की संसार के सभी प्राणी सहायता करते हैं। जबकि अन्याय के मार्ग पर चलने वाले को उसका सगा भाई भी छोड़ देता है।
🍃शुभाशुभं कृतं कर्म भुंजते देवता अपि।
सविता हेमहस्तोभूद् भगो अन्धः पूषकोद्विजः।।
मनुष्य ही नहीं, देवताओं को भी अपने किये किये शुभ-अशुभ कर्मों का फल भोगने पड़ता है। सविता देवता का हाथ कट जाने पर उन्हें स्वर्ण का कृत्रिम हाथ लगाने पड़ा था। भगदेवता अपने कर्म से अंधे हुए और पूषा देवता दंतहीन हो गए।
🍂 जय जय राधा रमण हरि बोल जय जय राधा रमण हरि बोल।🍂


