#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣7️⃣4️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
एकोननवतितमोऽध्यायः
ययाति और अष्टक का संवाद...(दिन 274)
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ययातिरुवाच
अहं ययातिर्नहुषस्य पुत्रः पूरोः पिता सर्वभूतावमानात् । प्रभ्रंशितः सुरसिद्धर्षिलोकात् परिच्युतः प्रपताम्यल्पपुण्यः ।। १ ।।
ययातिने कहा- महात्मन् ! मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता ययाति हूँ। समस्त प्राणियोंका अपमान करनेसे मेरा पुण्य क्षीण हो जानेके कारण मैं देवताओं, सिद्धों तथा महर्षियोंके लोकसे च्युत होकर नीचे गिर रहा हूँ।। १ ।।
अहं हि पूर्वो वयसा भवद्भ्य-स्तेनाभिवादं भवतां न प्रयुञ्ज । यो विद्यया तपसा जन्मना वा वृद्धः स पूज्यो भवति द्विजानाम् ।। २ ।।
मैं आपलोगोंसे अवस्थामें बड़ा हूँ, अतः आपलोगोंको प्रणाम नहीं कर रहा हूँ। द्विजातियोंमें जो विद्या, तप और अवस्थामें बड़ा होता है, वह पूजनीय माना जाता है ।। २ ।।
अष्टक उवाच
अवादीस्त्वं वयसा यः प्रवृद्धः स वै राजन् नाभ्यधिकः कथ्यते च । यो विद्यया तपसा सम्प्रवृद्धः स एव पूज्यो भवति द्विजानाम् ।। ३ ।।
अष्टक बोले-राजन् ! आपने कहा है कि जो अवस्थामें बड़ा हो, वही अधिक सम्माननीय कहा जाता है। परंतु द्विजोंमें तो जो विद्या और तपस्यामें बढ़ा-चढ़ा हो, वही पूज्य होता है ।। ३ ।।
ययातिरुवाच
प्रतिकूलं कर्मणां पापमाहु-स्तद् वर्ततेऽप्रवणे पापलोक्यम् । सन्तोऽसतां नानुवर्तन्ति चैतद् यथा चैषामनुकूलास्तथाऽऽसन् ।। ४ ।।
ययातिने कहा-पापको पुण्यकर्मोंका नाशक बताया जाता है, वह नरककी प्राप्ति करानेवाला है और वह उद्दण्ड पुरुषोंमें ही देखा जाता है। दुराचारी पुरुषोंके दुराचारका श्रेष्ठ पुरुष अनुसरण नहीं करते हैं। पहलेके साधु पुरुष भी उन श्रेष्ठ पुरुषोंके ही अनुकूल आचरण करते थे ।। ४ ।।
अभूद् धनं मे विपुलं गतं तद् विचेष्टमानो नाधिगन्ता तदस्मि । एवं प्रधार्यात्महिते निविष्टो यो वर्तते स विजानाति धीरः ।। ५ ।।
मेरे पास पुण्यरूपी बहुत धन था; किंतु दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण वह सब नष्ट हो गया। अब मैं चेष्टा करके भी उसे नहीं पा सकता। मेरी इस दुरवस्थाको समझ-बूझकर जो आत्मकल्याणमें संलग्न रहता है, वही ज्ञानी और वही धीर है ।। ५ ।।
महाधनो यो यजते सुयज्ञे-र्यः सर्वविद्यासु विनीतबुद्धिः । वेदानधीत्य तपसाऽऽयोज्य देहं दिवं समायात् पुरुषो वीतमोहः ।। ६ ।।
जो मनुष्य बहुत धनी होकर उत्तम यज्ञोंद्वारा भगवान्की आराधना करता है, सम्पूर्ण विद्याओंको पाकर जिसकी बुद्धि विनययुक्त है तथा जो वेदोंको पढ़कर अपने शरीरको तपस्यामें लगा देता है, वह पुरुष मोहरहित होकर स्वर्गमें जाता है ।। ६ ।।
न जातु हृष्येन्महता धनेन वेदानधीयीतानहंकृतः स्यात् । नानाभावा बहवो जीवलोके दैवाधीना नष्टचेष्टाधिकाराः । तत् तत् प्राप्य न विहन्येत धीरो
दिष्टं बलीय इति मत्वाऽऽत्मबुद्ध्या ।। ७ ।।
महान् धन पाकर कभी हर्षसे उल्लसित न हो, वेदोंका अध्ययन करे, किंतु अहंकारी न बने। इस जीव-जगत्में भिन्न-भिन्न स्वभाववाले बहुत-से प्राणी हैं, वे सभी प्रारब्धके अधीन हैं, अतः उनके धनादि पदार्थोंके लिये किये हुए उद्योग और अधिकार सभी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये धीर पुरुषको चाहिये कि वह अपनी बुद्धिसे 'प्रारब्धथ ही बलवान् है' यह जानकर दुःख या सुख जो भी मिले, उसमें विकारको प्राप्त न हो ।। ७ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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