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#हरिद्वार_की_खबरें का माया देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक अत्यंत प्राचीन मंदिर है, जो 11वीं शताब्दी (या उससे पूर्व) का माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती की नाभि और हृदय गिरा था। यह हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं और इन्हीं के नाम पर हरिद्वार को 'मायापुरी' कहा जाता है।   AajTak +4 माया देवी मंदिर का इतिहास और मुख्य तथ्य: ऐतिहासिक महत्व: इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी ईस्वी में हुआ था और यह हरिद्वार के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। पौराणिक कथा: कथा के अनुसार, भगवान शिव की पत्नी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर आत्मदाह किया था। शिव जी सती के शरीर को लेकर जा रहे थे, तब विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से शरीर के टुकड़े किए, जिसमें सती की नाभि यहां गिरी थी। मंदिर संरचना: मुख्य गर्भगृह में तीन देवियां विराजमान हैं - मध्य में मां माया देवी (तीन सिर, चार भुजाएं), बाईं ओर मां काली और दाईं ओर मां कामाख्या। स्थापना: मंदिर में आदि काल से माता की पिंडी विराजमान है, लेकिन मुख्य मूर्तियां 18वीं शताब्दी में स्थापित की गई थीं। महत्व (सिद्धपीठ): इसे एक प्रमुख सिद्धपीठ माना जाता है, जहाँ मनसा देवी और चंडी देवी के साथ मिलकर माया देवी का त्रिकोण हरिद्वार की सुरक्षा करता है। स्थान: यह मंदिर हरिद्वार रेलवे स्टेशन से लगभग 2 किलोमीटर दूर हर की पौड़ी के पास स्थित है।