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#जय माँ गायत्री जय गुरुवर
जय माँ गायत्री जय गुरुवर - अखंड ज्योति मासिक पत्रिका कर्मकांड, मिथ्याचार, जात - पाँत, ऊँच- नीच जैसी वे।स्वयं हिमालय के तोर्थस्थलों से लेकर ने समाज को रि्थति को अत्यंत रूढ़ियों - कुप्रथाओं 1 महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, आंध्रप्रदेश आदि अनेक दयनीय एवं शोचनीय बना दिया था। स्थलों - प्रांतों में भक्ति भाव का संचार करते हुए ऐसे में भक्त हृदय विचलित हुए बिना कैसे पहुँचे और समाज  कल्याण को चरितार्थ करने वाले रह सकता है ? उस काल के सभी संतों - भक्तों के अपने मानवतावादी विचारों को प्रसारित किया। में मुखर हुए जिनमें कबीर का उनकी विचारधारा एवं उपदेशों का स्रोत নং বম নিহা तीखापन और संत रविदास को विनम्रता इन्हें सभी कोई शास्त्र या धर्म - परंपरा आदि नहीं रहे, अपितु से अलग स्थान प्रदान करते हैं। उनको वाणी में स्वयं को भक्ति- साधना और संतों , साधुओं , विद्यमान भक्तिभाव का अमृत और पोडित समाज सान्निध्य और आत्म अनुभूतियाँ रहे सत्पुरुषों का के प्रति करुणा के स्वर उन्हें भारत के अद्वितीय  हैं | गुरु रविदास को रैदास नाम से भी पुकारा संत शिरोमणि की श्रेणी में खडा कर देते हैं। जाता है संत रविदास को वाणी एवं उपदेश मानवता व्यक्तित्व उनके आध्यात्मिक भक्तिभाव और के लिए शाश्वत मंत्र की भाँति हैं। उनको दिव्य मानवोय संवेदना में प्रेम और करुणा की आभा के विचारणा को किसी देश-काल को सीमा में नहीं कारण ही तत्कालोन समाज में उनको प्रतिष्ठा है| जैसे उनके विचार हैं कि॰ उच्चकोटि के संत- महापुरुषों में की गई; जबकि নাঁখা তা सकता प्रत्येक ईश्वरभक्त महान है और प्रत्येक मनुष्य सामाजिक दृष्टि से इतर जाति में उनका जन्म हुआ समान है। इस प्रकार उनके प्रत्येक शब्द में जीवन भेदभाव व छुआछूत जैसी 8 3117 37 समय की अनंत प्रेरणाएँ व प्रकाश मौजूद है। मान्यताएँ सर्वत्र समाज में व्याप्त थीं। अनेक विद्वानों ने उन्हें संत, कवि, भक्त होने काम करने पर भी जूते - चप्पल बनाने का मानवतावादी और समाज उनमें   हीन- भावना का जरा भी अंश नहीं  था। के साथ- साथ सच्चा सुधारक संत भी कहा है, परंतु इनका समाज सुधार प्रत्येक कार्य को अपनी भक्ति- भावना से ईश्वरप्रेम इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं कहा जा सकता में परिवर्तित कर उन्होंने सहज कर्त्तव्य मार्ग पर यह तो सदैव, सर्वदा के लिए प्रतिष्ठित है | समाज चलकर ही अध्यात्म की उच्चस्तरीय सिद्धियाँ प्राप्त की दृष्टि से आज भी और पूर्व कालों में भी कर ली थों। ওথান उनके जीवन चरित्र में ऐसी अनेक चमत्कारी संत रविदास सदैव प्रासंगिक रहे हैं। संत रविदास का जीवन भक्तिकाल को जिस घटनाओं सिद्धियों की पुष्टि होती है। ' मन चंगा तो कठौती में गंगा ' - संत रविदास की प्रसिद्ध काल के 8, संत- परंपरा का नेतृत्व उस करता संतों - भक्तों में से प्रायः सभी ने अपनी एक अलग उक्ति है, जिसका है कि भीतर की शुद्धता, भावार्थ प्रणाली को विकसित किया है। इनकी प्रणालियों पवित्रता है तो मनुष्य को कहीं बाहर भटकने की में हिंदू - मुसलिम की किसी संरचना का सभर्थन या आवश्यकता नहीं है। कहा जाता है कि पंद्रहवीं - सोलहवीं शताब्दी विरोध नहों था, अपितु ये अपनी मौलिकता के में, जब संत रविदास का जन्म हुआ, उस काल में समाज और संस्कृति को मानवता से साथ धर्म, पुष्ट करने वाली हैं। धार्मिक संप्रदायों के बाह्य आडंबरों, अंधविश्वासों , नारी सशक्तीकरण' वर्ष फरवरी, २०२६ अखण्ड ज्योति अखंड ज्योति 17 মাসিন্ধ এসিক্ধা अखंड ज्योति मासिक पत्रिका कर्मकांड, मिथ्याचार, जात - पाँत, ऊँच- नीच जैसी वे।स्वयं हिमालय के तोर्थस्थलों से लेकर ने समाज को रि्थति को अत्यंत रूढ़ियों - कुप्रथाओं 1 महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, आंध्रप्रदेश आदि अनेक दयनीय एवं शोचनीय बना दिया था। स्थलों - प्रांतों में भक्ति भाव का संचार करते हुए ऐसे में भक्त हृदय विचलित हुए बिना कैसे पहुँचे और समाज  कल्याण को चरितार्थ करने वाले रह सकता है ? उस काल के सभी संतों - भक्तों के अपने मानवतावादी विचारों को प्रसारित किया। में मुखर हुए जिनमें कबीर का उनकी विचारधारा एवं उपदेशों का स्रोत নং বম নিহা तीखापन और संत रविदास को विनम्रता इन्हें सभी कोई शास्त्र या धर्म - परंपरा आदि नहीं रहे, अपितु से अलग स्थान प्रदान करते हैं। उनको वाणी में स्वयं को भक्ति- साधना और संतों , साधुओं , विद्यमान भक्तिभाव का अमृत और पोडित समाज सान्निध्य और आत्म अनुभूतियाँ रहे सत्पुरुषों का के प्रति करुणा के स्वर उन्हें भारत के अद्वितीय  हैं | गुरु रविदास को रैदास नाम से भी पुकारा संत शिरोमणि की श्रेणी में खडा कर देते हैं। जाता है संत रविदास को वाणी एवं उपदेश मानवता व्यक्तित्व उनके आध्यात्मिक भक्तिभाव और के लिए शाश्वत मंत्र की भाँति हैं। उनको दिव्य मानवोय संवेदना में प्रेम और करुणा की आभा के विचारणा को किसी देश-काल को सीमा में नहीं कारण ही तत्कालोन समाज में उनको प्रतिष्ठा है| जैसे उनके विचार हैं कि॰ उच्चकोटि के संत- महापुरुषों में की गई; जबकि নাঁখা তা सकता प्रत्येक ईश्वरभक्त महान है और प्रत्येक मनुष्य सामाजिक दृष्टि से इतर जाति में उनका जन्म हुआ समान है। इस प्रकार उनके प्रत्येक शब्द में जीवन भेदभाव व छुआछूत जैसी 8 3117 37 समय की अनंत प्रेरणाएँ व प्रकाश मौजूद है। मान्यताएँ सर्वत्र समाज में व्याप्त थीं। अनेक विद्वानों ने उन्हें संत, कवि, भक्त होने काम करने पर भी जूते - चप्पल बनाने का मानवतावादी और समाज उनमें   हीन- भावना का जरा भी अंश नहीं  था। के साथ- साथ सच्चा सुधारक संत भी कहा है, परंतु इनका समाज सुधार प्रत्येक कार्य को अपनी भक्ति- भावना से ईश्वरप्रेम इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं कहा जा सकता में परिवर्तित कर उन्होंने सहज कर्त्तव्य मार्ग पर यह तो सदैव, सर्वदा के लिए प्रतिष्ठित है | समाज चलकर ही अध्यात्म की उच्चस्तरीय सिद्धियाँ प्राप्त की दृष्टि से आज भी और पूर्व कालों में भी कर ली थों। ওথান उनके जीवन चरित्र में ऐसी अनेक चमत्कारी संत रविदास सदैव प्रासंगिक रहे हैं। संत रविदास का जीवन भक्तिकाल को जिस घटनाओं सिद्धियों की पुष्टि होती है। ' मन चंगा तो कठौती में गंगा ' - संत रविदास की प्रसिद्ध काल के 8, संत- परंपरा का नेतृत्व उस करता संतों - भक्तों में से प्रायः सभी ने अपनी एक अलग उक्ति है, जिसका है कि भीतर की शुद्धता, भावार्थ प्रणाली को विकसित किया है। इनकी प्रणालियों पवित्रता है तो मनुष्य को कहीं बाहर भटकने की में हिंदू - मुसलिम की किसी संरचना का सभर्थन या आवश्यकता नहीं है। कहा जाता है कि पंद्रहवीं - सोलहवीं शताब्दी विरोध नहों था, अपितु ये अपनी मौलिकता के में, जब संत रविदास का जन्म हुआ, उस काल में समाज और संस्कृति को मानवता से साथ धर्म, पुष्ट करने वाली हैं। धार्मिक संप्रदायों के बाह्य आडंबरों, अंधविश्वासों , नारी सशक्तीकरण' वर्ष फरवरी, २०२६ अखण्ड ज्योति अखंड ज्योति 17 মাসিন্ধ এসিক্ধা - ShareChat