#महाभारत
🚩 विजय का विष और एक माँ का रहस्य! 🚩
दृश्य १: शमशान जैसी शांति
कुरुक्षेत्र का अठारह दिवसीय महासमर समाप्त हो चुका था। पांडवों के मस्तक पर विजय का मुकुट तो था, परंतु उनके हृदय शमशान की भाँति वीरान थे। जहाँ तक दृष्टि जाती थी, केवल जलती हुई चिताओं का धुआँ और विधवाओं का करुण क्रंदन ही सुनाई देता था।
हस्तिनापुर का वह राजसिंहासन, जिसे पाने के लिए इतना रक्त बहाया गया था, अब पांडवों का था। लेकिन इसकी कीमत क्या थी? पितामह भीष्म, गुरु द्रोण, भाई-बंधु और अपने ही नन्हे पुत्रों (उपपांडवों) के शवों पर चलकर मिली यह जीत, किसी पराजय से कम नहीं लग रही थी।
दृश्य २: गंगा तट पर तर्पण
विजयी होने के बावजूद, धर्मराज युधिष्ठिर का मन असीम ग्लानि और विषाद से भरा था। वे अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ गंगा के पवित्र तट पर खड़े थे। युद्ध में मारे गए अपने परिजनों को वे अश्रुपूरित नेत्रों से 'जलांजलि' (तर्पण) दे रहे थे।
तभी, वहाँ एक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ जिसने वातावरण को और अधिक भारी कर दिया।
राजमाता कुंती धीरे-धीरे, लड़खड़ाते कदमों से युधिष्ठिर की ओर आ रही थीं। उनका मुख मण्डल आंसुओं से तर था और आँखों में युगों का दर्द छिपा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई भारी पत्थर उनके सीने पर रखा हो जिसे वे अब और नहीं ढो सकतीं।
दृश्य ३: रहस्य का विस्फोट
कुंती ने कांपते स्वर में युधिष्ठिर के कंधे पर हाथ रखा और कहा,
"पुत्र! तुमने अपने पितामह, गुरु और बंधु-बांधवों को जलांजलि दे दी? अब... अब एक अंजलि उस योद्धा के नाम भी दो, जिसे तुम सब जीवन भर 'सूतपुत्र' कहकर अपमानित करते रहे। उस 'राधेय' कर्ण के लिए भी तर्पण करो।"
युधिष्ठिर ठिठक गए। उनके माथे पर लकीरें उभर आईं। उन्होंने आश्चर्य से पूछा,
"माता! आप क्या कह रही हैं? वह तो हमारा परम शत्रु था। वह दुर्योधन का मित्र और अधर्म का साथी था। मैं उस कुटिल सूतपुत्र के लिए तर्पण क्यों करूँ?"
कुंती का धैर्य अब जवाब दे गया। वर्षों से रोका गया आंसुओं का बाँध टूट पड़ा। वे चीत्कार कर उठीं—
"नहीं युधिष्ठिर! वह सूतपुत्र नहीं था। वह सूर्यपुत्र था! वह तुम्हारा शत्रु नहीं, तुम्हारा ज्येष्ठ भ्राता था। वह मेरी कोख से जन्मा मेरा 'प्रथम पुत्र' था, जिसे मैंने लोक-लाज के भय से त्याग दिया था।"
दृश्य ४: सत्य का आघात
कुंती के ये शब्द युधिष्ठिर के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरे। समय जैसे वहीं थम गया। भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव पत्थर की मूर्ति बन गए।
युधिष्ठिर के हाथ से जल का कलश छूटकर गिर पड़ा।
छपाक!
उनके मस्तिष्क में अतीत के चित्र बिजली की तरह कौंधने लगे।
* उन्हें याद आया कि कैसे भरी सभा में उन्होंने कर्ण को 'नीच जाति'
का कहकर दुत्कारा था।
* उन्हें याद आया अर्जुन का वह बाण, जिसने निहत्थे कर्ण का शीश काट दिया था।
* उन्हें याद आया कि कर्ण सब कुछ जानते हुए भी चुप रहा। उसने कभी नहीं कहा कि "मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ।"
युधिष्ठिर का शरीर कांपने लगा। यह केवल एक भाई की मृत्यु का समाचार नहीं था, यह 'धर्मराज' के हाथों अनजाने में हुए 'भ्रातृहत्या' के पाप का बोध था।
वे घुटनों के बल रेत पर गिर पड़े और विलाप करने लगे:
> "हाय! हमने यह क्या अनर्थ कर दिया! हे विधाता, मैंने अपने ही अग्रज (बड़े भाई) का वध करवा दिया? हमारे धर्म में बड़ा भाई पिता तुल्य होता है, और मैंने राज्य के लोभ में अपने पिता समान भाई का रक्त बहा दिया?"
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युधिष्ठिर का विलाप गंगा की लहरों से भी ऊँचा था। वे बोले:
> "माता! यदि मुझे यह सत्य पहले पता होता, तो कुरुक्षेत्र की यह भूमि कभी रक्त से लाल न होती। मैं कर्ण के चरणों में हस्तिनापुर का मुकुट रख देता और स्वयं वन चला जाता। न दुर्योधन मरता, न अभिमन्यु, न मेरे पुत्र... केवल आपके एक 'गोपनीयता' ने मेरे पूरे कुल का नाश कर दिया।"
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दृश्य ५: युगों तक गूंजने वाला श्राप
युधिष्ठिर का शोक अब भीषण क्रोध में बदल चुका था। यह क्रोध अपनी माता पर था, उस निष्ठुर समाज पर था जिसने एक कुंवारी माँ को डरपोक बना दिया, और उस 'रहस्य' पर था जिसने महाभारत रच दिया।
उनकी आँखों में अंगारे धधक रहे थे। वे गंगा के जल में खड़े हुए और अपनी अंजलि में जल लिया।
उन्होंने समस्त दिशाओं और नारी जाति को साक्षी मानकर एक भीषण घोषणा की:
> "जिस प्रकार मेरी माता ने इस सत्य को अपने हृदय में छिपाकर रखा, जिसके कारण आज लाखों निर्दोष मारे गए और भाइयों ने भाइयों का रक्त बहाया... मैं धर्मराज युधिष्ठिर, आज यह श्राप देता हूँ कि आज से सृष्टि की कोई भी स्त्री अपने पेट में कोई 'रहस्य' नहीं छिपा पाएगी। ताकि भविष्य में फिर किसी 'छिपे हुए सत्य' के कारण ऐसा महाविनाश न हो।"
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कथा का मर्म: तीन दृष्टिकोण
युधिष्ठिर का वह श्राप किसी द्वेष से नहीं, बल्कि सत्य के आग्रह और गहरी पीड़ा से निकला था। यह घटना हमें तीन अलग-अलग नजरिये देती है:
* कुंती की विवशता (The Mother's Dilemma):
कुंती एक विवश माँ का प्रतीक थीं। किशोरावस्था की एक भूल और समाज के क्रूर नियमों के डर ने उन्हें अपना बेटा त्यागने पर मजबूर किया। उनका मौन उनकी 'ममता' और 'सामाजिक प्रतिष्ठा' के बीच का खूनी संघर्ष था। वह जीवन भर अपने बेटे को अपनी आंखों के सामने अपमानित होते देखती रहीं, पर कुछ बोल न सकीं।
* युधिष्ठिर का सत्य (The Burden of Truth):
युधिष्ठिर के लिए सत्य ही ईश्वर था। उनके लिए, झूठ या छिपाया गया सत्य सबसे बड़ा अधर्म था। उनका श्राप, उस धोखे के खिलाफ एक विद्रोह था जिसने उन्हें, जो धर्म के प्रतीक थे, अनजाने में सबसे बड़ा पापी बना दिया था।
* कर्ण का महा-त्याग (The Ultimate Sacrifice):
यह प्रसंग कर्ण के चरित्र को हिमालय से भी ऊँचा कर देता है। युद्ध से पहले कुंती और कृष्ण दोनों ने उसे सत्य बता दिया था। कर्ण जानता था कि पांडव उसके छोटे भाई हैं। वह चाहता तो एक क्षण में युद्ध रोक सकता था, राज्य पा सकता था। लेकिन उसने 'मौन' रहना चुना—ताकि युधिष्ठिर का धर्म न डगमगाए और माँ कुंती का सम्मान बना रहे।
आज भी हमारे समाज में जब मुहावरे के तौर पर कहा जाता है कि "औरतों के पेट में बात नहीं पचती", तो यह हँसी का पात्र नहीं, बल्कि उस महान त्रासदी का स्मरण है। यह उस माँ की पीड़ा की याद दिलाता है जिसके चुप रहने की कीमत, उसके बेटों ने एक-दूसरे का खून बहाकर चुकाई थी।


