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#ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमो भगवते वासुदेवाय,जय श्री हरि विष्णु,जय श्री राम!अपने इष्ट का स्मरण और नाम जप करे!आखरी समय में यही साथ चलने वाला है। "हे नाथ मैं आपको भूलूं नहीं!हे नाथ मैं आपका हूं आप हमारे है।"श्रीमन नारायण नारायण हरि हरि"!"हे नाथ नारायण वासुदेवा,श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी! समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥ नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥ भावार्थ:- नाम और नामी समझने में दोनों एक जैसे हैं लेकिन दोनों की प्रीति स्वामी और सेवक के समान अनुगमन करने वाली है, प्रभु श्रीराम जी भी अपने "राम" नाम का ही अनुगमन करते हैं यानि नाम लेते ही वहाँ प्रकट हो जाते हैं। नाम और रूप दोनों ही भगवान की उपाधि हैं, इन दोनों उपाधियों का वर्णन नहीं किया जा सकता है, इनका कोई आरम्भ नहीं है, केवल नाम रूप से साधना करने से ही इनका दिव्य अविनाशी स्वरूप जानने में आ सकता है।
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