।। ॐ।।
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।।
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जिस प्रकार वायुरहित स्थान में रखा गया दीपक चलायमान नहीं होता, लौ सीधे ऊपर जाती है, उसमें कम्पन नहीं होता, यही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की दी गयी है। दीपक तो उदाहरण मात्र है। आजकल दीपक का प्रचलन शिथिल पड़ रहा है। अगरबत्ती ही जलाने पर धुआँ सीधे ऊपर जाता है, यदि वायु में वेग न हो। यह योगी के जीते हुए चित्त का एक उदाहरण मात्र है। अभी चित्त भले ही जीता गया है, निरोध हो गया है; किन्तु अभी चित्त है। जब निरुद्ध चित्त का भी विलय हो जाता है, तब कौन-सी विभूति मिलती है? देखें-"यथार्थगीता"


