।। ॐ ।।
योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्योतिरेव यः।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥
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जो अन्तरात्मा में ही सुखवाला, 'अन्तरारामः' -अन्तरात्मा में ही आरामवाला तथा जो अन्तरात्मा में ही प्रकाशवाला (साक्षात्कारवाला) है, वही योगी 'ब्रह्मभूतः'- ब्रह्म के साथ एक होकर 'ब्रह्मनिर्वाणम्' - वाणी से परे ब्रह्म, शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त होता है। अर्थात् पहले विकारों (काम-क्रोध) का अन्त, फिर दर्शन, फिर प्रवेश। आगे देखें-"यथार्थगीता"


