Jagdish Sharma
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Jagdish Sharma
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यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।। ॐ ।। पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥ अर्जुन! मैं ही सम्पूर्ण जगत् का 'धाता' अर्थात् धारण करनेवाला, 'पिता' अर्थात् पालन करनेवाला, 'माता' अर्थात् उत्पन्न करनेवाला, 'पितामहः' अर्थात् मूल उद्गम हूँ, जिसमें सभी प्रवेश पाते हैं और जानने योग्य पवित्र ओंकार अर्थात् 'अहं आकार इति ओंकार:' - वह परमात्मा मेरे स्वरूप में है। 'सोऽहं, तत्त्वमसि' इत्यादि एक दूसरे के पर्याय हैं, ऐसा जानने योग्य स्वरूप मैं ही हूँ। 'ऋक्' अर्थात् सम्पूर्ण प्रार्थना, 'साम' अर्थात् समत्व दिलानेवाली प्रक्रिया, 'यजुः' अर्थात् यजन की विधि-विशेष भी मैं ही हूँ। योग-अनुष्ठान के उक्त तीनों आवश्यक अंग मुझसे होते हैं। #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता #🙏गुरु महिमा😇
🙏गीता ज्ञान🛕 - I39 || पिताहमस्य जगनो माता घाना पितामहः वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।।  अर्जुन! मैं ही सम्पूर्ण जगत् का ' धाता' अर्थान् धारण * কনেনালা; 'দিনা সমনিপালন করূনেনালা; पाता अर्थात् उत्पन्न करनेवाला ' पितामहः अर्थात्मूल उद्गम हूॅ जिसमें सभी प्रवेश पाते है और जानने योग्य पवित्र ओंकार अर्थात् अह आाकार इति সান্ধায:' वह परमात्मा मेरे स्वरूप में है। सोड्ह तत्त्वमासि इत्यादि एक पर्याय हैं ऐसा दूसरेके जानने योग्य स्वरूप मे ही हू। ऋक्' अर्थात् सम्पूर्ण  সাথনা; 'মাস' সথান মসন রিলাননালী সক্রিতা अर्थात् यजन की विधि॰विशेष भी मै ही हूॅ। 'ಶಸ: अनुष्ठान के उक्त तीनों आवश्यक अंग मुझसे  योग  होने है। I39 || पिताहमस्य जगनो माता घाना पितामहः वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।।  अर्जुन! मैं ही सम्पूर्ण जगत् का ' धाता' अर्थान् धारण * কনেনালা; 'দিনা সমনিপালন করূনেনালা; पाता अर्थात् उत्पन्न करनेवाला ' पितामहः अर्थात्मूल उद्गम हूॅ जिसमें सभी प्रवेश पाते है और जानने योग्य पवित्र ओंकार अर्थात् अह आाकार इति সান্ধায:' वह परमात्मा मेरे स्वरूप में है। सोड्ह तत्त्वमासि इत्यादि एक पर्याय हैं ऐसा दूसरेके जानने योग्य स्वरूप मे ही हू। ऋक्' अर्थात् सम्पूर्ण  সাথনা; 'মাস' সথান মসন রিলাননালী সক্রিতা अर्थात् यजन की विधि॰विशेष भी मै ही हूॅ। 'ಶಸ: अनुष्ठान के उक्त तीनों आवश्यक अंग मुझसे  योग  होने है। - ShareChat
।।ॐ।। अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहममौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥ कर्त्ता मैं हूँ। वस्तुतः कर्त्ता के पीछे प्रेरक के रूप में सदैव संचालित करनेवाला इष्ट ही है। कर्त्ता द्वारा जो पार लगता है, मेरी देन है। यज्ञ मैं हूँ। यज्ञ आराधना की विधि-विशेष है। पूर्तिकाल में यज्ञ जिसका सृजन करता है, उस अमृत को पान करनेवाला पुरुष सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है। स्वधा मैं हूँ अर्थात् अतीत के अनन्त संस्कारों को विलय करना, उन्हें तृप्त कर देना मेरी देन है। भवरोग को मिटानेवाली औषधि मैं हूँ। मुझे पाकर लोग इस रोग से निवृत्त हो जाते हैं। मन्त्र मैं हूँ। मन को श्वास के अन्तराल में निरोध करना मेरी देन है। इस निरोध-क्रिया में तीव्रता लानेवाली वस्तु 'आज्य' (हवि) भी मैं हूँ। मेरे ही प्रकाश में मन की सभी प्रवृत्तियाँ विलीन होती हैं। हवन अर्थात् समर्पण भी मैं ही हूँ। यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण बार-बार 'मैं हूँ' कह रहे हैं। इसका आशय मात्र इतना ही है कि मैं ही प्रेरक के रूप में आत्मा से अभिन्न होकर खड़ा हो जाता हूँ तथा निरन्तर निर्णय देते हुए योगक्रिया को पूर्ण कराता हूँ। इसी का नाम विज्ञान है। 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - ~ =0" 77410F কনামনাববদ্াএদাা কমোওমযেক চমদমমে  =11771=17=1717  7=T7  +74=#/ப7+#ப117547571414-[404#1 -7-'=71=751 Bar ಊಣ~Hiಳarr urin' -=+7 লধাসাত4li ননমনদনকার ক্ানিবয বননা বননদ এ্ভনা সযতন [1 সনবয ক্রী  Tu r iaruಝil- ' HiTr೯a TTrಣ Tnಹiar hl#T111371 514 47 3  ar1 ` =ப==711*=7=1=741-7## FTನ4 [ ITru (M#) '14[1#ಗ : FI1 1 2 ، ٠ ٥ ٣٧»٥  ٥٠  ٥  ٠٢ ٧٢١   411 ರ ~ =0" 77410F কনামনাববদ্াএদাা কমোওমযেক চমদমমে  =11771=17=1717  7=T7  +74=#/ப7+#ப117547571414-[404#1 -7-'=71=751 Bar ಊಣ~Hiಳarr urin' -=+7 লধাসাত4li ননমনদনকার ক্ানিবয বননা বননদ এ্ভনা সযতন [1 সনবয ক্রী  Tu r iaruಝil- ' HiTr೯a TTrಣ Tnಹiar hl#T111371 514 47 3  ar1 ` =ப==711*=7=1=741-7## FTನ4 [ ITru (M#) '14[1#ಗ : FI1 1 2 ، ٠ ٥ ٣٧»٥  ٥٠  ٥  ٠٢ ٧٢١   411 ರ - ShareChat
#🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता ॐ ।। ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥ उनमें से कोई तो मुझ सर्वव्याप्त विराट् परमात्मा को ज्ञानयज्ञ द्वारा यजन करते हैं अर्थात् अपनी हानि, लाभ और शक्ति को समझकर इसी नियत कर्म यज्ञ में प्रवृत्त होते हैं, कुछ एकत्व भाव से मेरी उपासना करते हैं कि मुझे इसी में एक होना है और दूसरे सब कुछ मुझे अलग रखकर, मुझे समर्पण करके निष्काम सेवा-भाव से मुझे उपासते हैं तथा बहुत प्रकार से उपासते हैं; क्योंकि एक ही यज्ञ के ये सभी ऊँचे-नीचे स्तर हैं। यज्ञ का आरम्भ सेवा से ही होता है; किन्तु उसका अनुष्ठान होता कैसे है? योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- यज्ञ मैं करता हूँ। यदि महापुरुष रथी न हो तो यज्ञ पार नहीं लगेगा। उन्हीं के निर्देशन में साधक समझ पाता है कि अब वह किस स्तर पर है, कहाँ तक पहुँच सका है। वस्तुतः यज्ञकर्त्ता कौन है?- इस पर योगेश्वर कहते हैं-"यथार्थ गीता "
🧘सदगुरु जी🙏 - a ५२००  ।श्रीमढ्पगवढ्गीता।।  ५२०० y২০০  गीता।। ।।यथार्थ ५२०० ५२०० ப13 11 8 ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।१  [নিবয उनमें से कोई तो मुझ सर्वव्याप्त  परमात्मा को ज्ञानयज्ञ द्वारा यजन करते हैं अर्थात् अपनी हानि , लाभ और शक्ति को समझकर इसी नियत कर्म यज्ञ में प्रवृत्त होते मै एकहोकह्व शरदूसेसेसीब कुासनाकअलेहें किखमककोे मुक्ने স ৎক্র? समर्पण करके निष्काम सेवा- भाव से मुझे उपासते हैं तथा बहुत प्रकार से उपासते हैं; क्योंकि एक ही यज्ञ के ये सभी ऊँचे नीचे स्तर हैं। यज्ञ का आरम्भ सेवा से ही होता है; उसका अनुष्ठान होता कैसे है? योगेश्वर श्रीकृष्ण " किन्तु  हैं- यज्ञ मैं करता हूँ। यदि महापुरुष रथी न हो तो यज्ञ कहते पार नहीं लगेगा | उन्हीं के निर्देशन में साधक समझ पाता है ५२०० कि अब वह किस स्तर पर है, कहाँ तक पहुँच सका है। वस्तुतः यज्ञकर्त्ता कौन है?- इस पर योगेश्वर कहते हैं-" यथार्थ गीता वर्षों के लम्बे अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवढ्गीता की शाश्वत व्याख्या Nextef-ia .507 धर्मशास्त्र ೯ a ५२००  ।श्रीमढ्पगवढ्गीता।।  ५२०० y২০০  गीता।। ।।यथार्थ ५२०० ५२०० ப13 11 8 ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।१  [নিবয उनमें से कोई तो मुझ सर्वव्याप्त  परमात्मा को ज्ञानयज्ञ द्वारा यजन करते हैं अर्थात् अपनी हानि , लाभ और शक्ति को समझकर इसी नियत कर्म यज्ञ में प्रवृत्त होते मै एकहोकह्व शरदूसेसेसीब कुासनाकअलेहें किखमककोे मुक्ने স ৎক্র? समर्पण करके निष्काम सेवा- भाव से मुझे उपासते हैं तथा बहुत प्रकार से उपासते हैं; क्योंकि एक ही यज्ञ के ये सभी ऊँचे नीचे स्तर हैं। यज्ञ का आरम्भ सेवा से ही होता है; उसका अनुष्ठान होता कैसे है? योगेश्वर श्रीकृष्ण " किन्तु  हैं- यज्ञ मैं करता हूँ। यदि महापुरुष रथी न हो तो यज्ञ कहते पार नहीं लगेगा | उन्हीं के निर्देशन में साधक समझ पाता है ५२०० कि अब वह किस स्तर पर है, कहाँ तक पहुँच सका है। वस्तुतः यज्ञकर्त्ता कौन है?- इस पर योगेश्वर कहते हैं-" यथार्थ गीता वर्षों के लम्बे अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवढ्गीता की शाश्वत व्याख्या Nextef-ia .507 धर्मशास्त्र ೯ - ShareChat
।।ॐ।। सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥ वे निरन्तर चिन्तन के व्रत में अचल रहते हुए मेरे नाम और गुणों का चिन्तन करते हैं, प्राप्ति के यत्न करते हैं और मुझे बारम्बार नमस्कार करते हुए सदैव मुझसे संयुक्त होकर अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हैं। अविरल लगे रहते हैं। कौन-सी उपासना करते हैं? कैसा है यह कीर्तिगान? कोई दूसरी उपासना नहीं वरन् वही 'यज्ञ', जिसे विस्तार से बता आये हैं। उसी आराधना को यहाँ संक्षेप में योगेश्वर श्रीकृष्ण दुहरा रहे हैं-"यथार्थ गीता " #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता
🧘सदगुरु जी🙏 - 3் IlIl सतत कीर्तयन्नो मा यतन्तश्च दृठवताः| नित्ययुक्ता उपासते।l  नमस्यन्तश्च मा भवत्या  रहते हुए 7 चे निसन्तर चिन्तन के व्रत में अचत मेरे नाम ओर गुर्णो का चिन्तन करते ्हे॰ प्राप्ति के यत्न करते ह 7#47` ओर मुदो वारम्बार नमस्कार करते मुझसे संयुक्त होकर अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हे। अविरल लगे रहते ्ह। कोन-सी उपासना करते हें? केसा हे यह कीर्तिगान? कोई दूसरी उपासना नर्ही वरन् बही '्यज्ञः जिसे चिस्तार से बता आये हें। उसी  आराधना को यहॉं संक्षेप में योगेश्वर = श्रीकृष्ण " दुहरा रहे ೯-"4uಖಚ TfinT' 3் IlIl सतत कीर्तयन्नो मा यतन्तश्च दृठवताः| नित्ययुक्ता उपासते।l  नमस्यन्तश्च मा भवत्या  रहते हुए 7 चे निसन्तर चिन्तन के व्रत में अचत मेरे नाम ओर गुर्णो का चिन्तन करते ्हे॰ प्राप्ति के यत्न करते ह 7#47` ओर मुदो वारम्बार नमस्कार करते मुझसे संयुक्त होकर अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हे। अविरल लगे रहते ्ह। कोन-सी उपासना करते हें? केसा हे यह कीर्तिगान? कोई दूसरी उपासना नर्ही वरन् बही '्यज्ञः जिसे चिस्तार से बता आये हें। उसी  आराधना को यहॉं संक्षेप में योगेश्वर = श्रीकृष्ण " दुहरा रहे ೯-"4uಖಚ TfinT' - ShareChat
।। ॐ ।। महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥ परन्तु हे पार्थ! दैवी प्रकृति अर्थात् दैवी सम्पद् के आश्रित हुए महात्माजन मुझे सब भूतों का आदिकारण, अव्यक्त और अक्षर जानकर अनन्य मन से अर्थात् मन के अन्तराल में किसी अन्य को स्थान न देकर केवल मुझमें श्रद्धा रखकर निरन्तर मुझे भजते हैं। किस प्रकार भजते हैं? इस पर कहते हैं- #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
❤️जीवन की सीख - Il 3 Il महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः]  भजन्त्यनन्यमनसो भूतादिमव्ययम्।।  ज्ञात्वा परन्तु हे पार्थ! दैवी प्रकृति अर्थात् दैवी सम्पद् के आश्रित हुए महात्माजन मुझे सब भूतों का आदिकारण, अव्यक्त और अक्षर जानकर 34~4#4734f4 मन के अन्तराल में किसी अन्य को स्थान न देकर केवल  श्रद्धा रखकर मुझमें निरन्तर मुझे भजते हैं। किस प्रकार भजते हैं? इस पर कहते हैं- "यथार्थ गीता" Il 3 Il महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः]  भजन्त्यनन्यमनसो भूतादिमव्ययम्।।  ज्ञात्वा परन्तु हे पार्थ! दैवी प्रकृति अर्थात् दैवी सम्पद् के आश्रित हुए महात्माजन मुझे सब भूतों का आदिकारण, अव्यक्त और अक्षर जानकर 34~4#4734f4 मन के अन्तराल में किसी अन्य को स्थान न देकर केवल  श्रद्धा रखकर मुझमें निरन्तर मुझे भजते हैं। किस प्रकार भजते हैं? इस पर कहते हैं- "यथार्थ गीता" - ShareChat
।। ॐ।। मोघाशामोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥ वे वृथा आशा (जो कभी पूर्ण न हो ऐसी आशा), वृथा कर्म (बन्धनकारी कर्म), वृथा ज्ञान (जो वस्तुतः अज्ञान है), 'विचेतसः'- विशेष रूप से अचेत हुए, राक्षसों और असुरों के-से मोहित होनेवाले स्वभाव को धारण किये होते हैं अर्थात् आसुरी स्वभाववाले होते हैं इसलिये मनुष्य समझते हैं। असुर और राक्षस मन का एक स्वभाव है, न कि कोई जाति या योनि। आसुरी स्वभाववाले मुझे नहीं जान पाते; किन्तु महात्माजन मुझे जानते और भजते हैं- #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता
🧘सदगुरु जी🙏 - असुर और राक्षस मन का एक  स्वभाव है॰ न कि कोई जाति या ٩١٨١ स्वभाववाले मुझे সামুহী: I 39 | | f नहीं जान पाते; मोघाशामोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः| महात्माजन राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं সুহী আানন farl:Il और भजते हैं- 4447 (जो कभी पूर्ण न हो ऐसी आशा वृथा कर्म (बन्धनकारी कर्म) , T?TT), (जो वस्तुतः अज्ञान है), वृथा ज्ञान विचेतसः - विशेष रूप से अचेत हुए, राक्षसों और असुरों केनसे मोहित होनेवाले स्वभावको धारण किये होते हैं अर्थात् आसुरी स्वभाववाले होते हैं इसलिये मनुष्य समझते हैं। असुर और राक्षस मन का एक  स्वभाव है॰ न कि कोई जाति या ٩١٨١ स्वभाववाले मुझे সামুহী: I 39 | | f नहीं जान पाते; मोघाशामोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः| महात्माजन राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं সুহী আানন farl:Il और भजते हैं- 4447 (जो कभी पूर्ण न हो ऐसी आशा वृथा कर्म (बन्धनकारी कर्म) , T?TT), (जो वस्तुतः अज्ञान है), वृथा ज्ञान विचेतसः - विशेष रूप से अचेत हुए, राक्षसों और असुरों केनसे मोहित होनेवाले स्वभावको धारण किये होते हैं अर्थात् आसुरी स्वभाववाले होते हैं इसलिये मनुष्य समझते हैं। - ShareChat
।। ॐ ।। अवजानन्ति मां मूढा मांनुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥ सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वररूप मेरे परमभाव को न जाननेवाले मूढ़लोग मुझे मनुष्य-शरीर के आधारवाला और तुच्छ समझते हैं। सम्पूर्ण प्राणियों के ईश्वरों का भी जो महान् ईश्वर है, उस परमभाव में मैं स्थित हूँ; किन्तु हूँ मनुष्य-शरीरधारी, मूढ़लोग इसे नहीं जानते। वे मुझे मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं। उनका दोष भी क्या है? जब वे दृष्टिपात करते हैं तो महापुरुष का शरीर ही तो दिखायी पड़ता है। कैसे वे समझें कि आप महान् ईश्वरभाव में स्थित हैं? वे क्यों नहीं देख पाते? इस पर कहते हैं-"यथार्थ गीता" #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
❤️जीवन की सीख - स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  ।। ऊँ अवजानन्ति मां मूढा मांनुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।  सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वररूप मेरे परमभाव को मूढ़लोग मुझे मनुष्य शरीर के न जाननेवाले और तुच्छ समझते हैं। सम्पूर्ण आधारवाला प्राणियों के ईश्वरों का भी जो महान् ईश्वर है, उस परमभाव में मैं स्थित हूँ; किन्तु हूँ मनुष्य शरीरधारी, मूढ़लोग इसे नहीं जानते। वे मुझे मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं। उनका दोष भी क्या है? जब वे दृष्टिपात करते हैं तो महापुरुष का शरीर ही तो दिखायी पडता है। कैसे वे समझें कि आप महान् ईश्वरभाव में स्थित हैं? वे क्यों नहीं देख पाते? इस पर कहते हैं-"यथार्थ गीता" स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  ।। ऊँ अवजानन्ति मां मूढा मांनुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।  सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वररूप मेरे परमभाव को मूढ़लोग मुझे मनुष्य शरीर के न जाननेवाले और तुच्छ समझते हैं। सम्पूर्ण आधारवाला प्राणियों के ईश्वरों का भी जो महान् ईश्वर है, उस परमभाव में मैं स्थित हूँ; किन्तु हूँ मनुष्य शरीरधारी, मूढ़लोग इसे नहीं जानते। वे मुझे मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं। उनका दोष भी क्या है? जब वे दृष्टिपात करते हैं तो महापुरुष का शरीर ही तो दिखायी पडता है। कैसे वे समझें कि आप महान् ईश्वरभाव में स्थित हैं? वे क्यों नहीं देख पाते? इस पर कहते हैं-"यथार्थ गीता" - ShareChat
।। ॐ ।। मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ अर्जुन! मेरी अध्यक्षता में अर्थात् मेरी उपस्थिति में सर्वत्र व्याप्त मेरे अध्यास से यह माया (त्रिगुणमयी प्रकृति, अष्टधा मूल प्रकृति और चेतन दोनों) चराचर सहित जगत् को रचती है, जो क्षुद्र कल्प है और इसी कारण से यह संसार आवागमन के चक्र में घूमता रहता है। प्रकृति का यह क्षुद्र कल्प जिसमें काल का परिवर्तन है, मेरे अध्यास से प्रकृति ही करती है, मैं नहीं करता; किन्तु सातवें श्लोक में निर्दिष्ट कल्प आराधना का संचार एवं पूर्तिपर्यन्त मार्गदर्शनवाला कल्प महापुरुष स्वयं करते हैं। एक स्थान पर वे स्वयं कर्त्ता हैं, जहाँ वे विशेष रूप से सृजन करते हैं। यहाँ कर्त्ता प्रकृति है, जो केवल मेरे अध्यास से यह क्षणिक परिवर्तन करती है; जिसमें शरीरों का परिवर्तन, काल-परिवर्तन, युग-परिवर्तन इत्यादि आते हैं। ऐसा व्याप्त प्रभाव होने पर भी मूढ़लोग मुझे नहीं जानते। तथा- #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता
🧘सदगुरु जी🙏 - Il 36 Il मयाध्यक्षेण प्रकृतिः 79 I हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते Il अर्जुन! मेरी अध्यक्षता में अर्थात् मेरी उपस्थिति में सर्वत्र व्याप्त मेरे अध्यास से यह माया अष्टथा मूल प्रकृति (त्रिगुणमयी 1 प्रकृति, और चेतन दोनों ) चराचर सहित जगत् को रचती हैे, जो क्षुद्र कल्प है और इसी कारण से यह संसार के चक्र र्में घूमता रहता है। आवागमन प्रकृति का यह क्षुद्र कल्प जिसर्में काल का परिवर्तन है॰ मेरे अध्यास से प्रकृति ही करती है স নর্নী ক্রনো; किन्तु सातवें श्लोक में निर्दिष्ट कल्प आराथना का संचार एवं पूर्तिपर्यन्त मार्गदर्शनवाला कल्प महापुरुष स्वयं करते हे। एक स्थान परवे स्वयं कर्त्ता रहे जहाँ वे विशेष रूप से सृजन करते हे। यहॉ कर्त्ता प्रकृति है जो केवल मेरे अथ्यास से यह क्षणिक परिवर्तन करती हैः जिसर्मे शरीर्रों का परिवर्तन , काल परिवर्तन , युग परिवर्तन इत्यादि आते हैं। ऐसा व्याप्त प्रभाव होने परभी मूढ़लोग मुझे नहीं जानते। तथा- Il 36 Il मयाध्यक्षेण प्रकृतिः 79 I हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते Il अर्जुन! मेरी अध्यक्षता में अर्थात् मेरी उपस्थिति में सर्वत्र व्याप्त मेरे अध्यास से यह माया अष्टथा मूल प्रकृति (त्रिगुणमयी 1 प्रकृति, और चेतन दोनों ) चराचर सहित जगत् को रचती हैे, जो क्षुद्र कल्प है और इसी कारण से यह संसार के चक्र र्में घूमता रहता है। आवागमन प्रकृति का यह क्षुद्र कल्प जिसर्में काल का परिवर्तन है॰ मेरे अध्यास से प्रकृति ही करती है স নর্নী ক্রনো; किन्तु सातवें श्लोक में निर्दिष्ट कल्प आराथना का संचार एवं पूर्तिपर्यन्त मार्गदर्शनवाला कल्प महापुरुष स्वयं करते हे। एक स्थान परवे स्वयं कर्त्ता रहे जहाँ वे विशेष रूप से सृजन करते हे। यहॉ कर्त्ता प्रकृति है जो केवल मेरे अथ्यास से यह क्षणिक परिवर्तन करती हैः जिसर्मे शरीर्रों का परिवर्तन , काल परिवर्तन , युग परिवर्तन इत्यादि आते हैं। ऐसा व्याप्त प्रभाव होने परभी मूढ़लोग मुझे नहीं जानते। तथा- - ShareChat
।। ॐ ।। न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ अध्याय ४/९ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि महापुरुष की कार्य- प्रणाली अलौकिक है। अध्याय ९/४ में बताया- मैं अव्यक्त रूप से करता हूँ। यहाँ भी वही कहते हैं- धनंजय ! जिन कर्मों को मैं अदृश्य रूप से करता हूँ, उनमें मेरी आसक्ति नहीं है। उदासीन के सदृश स्थित रहनेवाले मुझ परमात्मस्वरूप को वे कर्म नहीं बाँधते; क्योंकि कर्म के परिणाम में जो लक्ष्य मिलता है उसमें मैं स्थित हूँ, इसलिये उन्हें करने के लिये मैं विवश नहीं हूँ। यह तो स्वभाव के साथ जुड़ी प्रकृति के कार्यों का प्रश्न था, महापुरुष की रहनी थी, उनकी रचना थी। अब मेरे अध्यास से जो माया रचती है, वह क्या है? वह भी एक कल्प है- #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
❤️जीवन की सीख - II32 Il नच मां तानि कर्माणि निवध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु Il में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि अध्याय ४/९ महापुरुष की कार्य- प्रणाली अलौकिक है। अध्याय ९/४ में बताया- मैं अव्यक्त रूप से करता हूँ। यहाँ भी वही कहते हें- धनंजय ! जिन कर्मो को में अदृश्य रूप से करता हू॰ उनमें मेरी आसक्ति नहीं है। उदासीन के सदृश स्थित रहनेवाले मुझ परमात्मस्वरूप कोवे कर्म नहीं बाँधते; क्योंकि कर्म के परिणाम में जो लक्ष्य मिलता है उसमें मैं स्थित हूँ॰ इसलिये उन्हें करने के लिये मैं विवश नहीं हूँ। यह तो स्वभाव के साथ जुड़ी प्रकृति के कार्यो का प्रश्न था, महापुरुष की रहनी थी उनकी रचना थी। अब मेरे अध्यास सेजो माया रचती हे, वह क्या हे? वहःभी एक कल्प हे॰ II32 Il नच मां तानि कर्माणि निवध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु Il में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि अध्याय ४/९ महापुरुष की कार्य- प्रणाली अलौकिक है। अध्याय ९/४ में बताया- मैं अव्यक्त रूप से करता हूँ। यहाँ भी वही कहते हें- धनंजय ! जिन कर्मो को में अदृश्य रूप से करता हू॰ उनमें मेरी आसक्ति नहीं है। उदासीन के सदृश स्थित रहनेवाले मुझ परमात्मस्वरूप कोवे कर्म नहीं बाँधते; क्योंकि कर्म के परिणाम में जो लक्ष्य मिलता है उसमें मैं स्थित हूँ॰ इसलिये उन्हें करने के लिये मैं विवश नहीं हूँ। यह तो स्वभाव के साथ जुड़ी प्रकृति के कार्यो का प्रश्न था, महापुरुष की रहनी थी उनकी रचना थी। अब मेरे अध्यास सेजो माया रचती हे, वह क्या हे? वहःभी एक कल्प हे॰ - ShareChat
।। ॐ ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।। 'विजितात्मा' - विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, 'जितेन्द्रियः' जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और 'विशुद्धात्मा'- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' - सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता? - #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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