Jagdish Sharma
ShareChat
click to see wallet page
@6079857
6079857
Jagdish Sharma
@6079857
यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।। ॐ ।। असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः।। अर्जुन! मन को वश में न करनेवाले पुरुष के लिये योग प्राप्त होना कठिन है; किन्तु स्ववश मनवाले प्रयत्नशील पुरुष के लिये योग सहज है, ऐसा मेरा अपना मत है। जितना कठिन तू मान बैठा है, उतना कठिन नहीं है। अतः इसे कठिन मानकर छोड़ मत दो। प्रयत्नपूर्वक लगकर योग को प्राप्त कर; क्योंकि मन वश में करने पर ही योग सम्भव है। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - I Il असंयतात्मना योगो दुष्पाप इति मे मतिः।  वश्यात्मना तःयतना शक्योउ्वाप्तमुपायतःा | अर्जुन! मन को वश ्मे न करनेवाले पुरुप किन्तु के लिये योग प्राप्त होना कठिन हेः स्ववश मनवाले प्रयत्नशील पुरुप के लिये योग सहज हे॰ ऐसा मेरा अपना मत हे। जितना कठिन तू मान बेठा हे॰ उतना कठिन नर्ही हे। अतः इसे कठिन मानकर प्रयत्नपूर्वक लगकर योग को  छोड मत  दो। क्योकि मन वश र्मे करने परही प्राप्त कर योग सम्भव हे। I Il असंयतात्मना योगो दुष्पाप इति मे मतिः।  वश्यात्मना तःयतना शक्योउ्वाप्तमुपायतःा | अर्जुन! मन को वश ्मे न करनेवाले पुरुप किन्तु के लिये योग प्राप्त होना कठिन हेः स्ववश मनवाले प्रयत्नशील पुरुप के लिये योग सहज हे॰ ऐसा मेरा अपना मत हे। जितना कठिन तू मान बेठा हे॰ उतना कठिन नर्ही हे। अतः इसे कठिन मानकर प्रयत्नपूर्वक लगकर योग को  छोड मत  दो। क्योकि मन वश र्मे करने परही प्राप्त कर योग सम्भव हे। - ShareChat
।। ॐ ।। श्रीभगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।। महान् कार्य करने के लिये प्रयत्नशील अर्थात् महाबाहु अर्जुन! निःसन्देह मन चंचल है, बड़ी कठिनाई से वश में होनेवाला है; परन्तु कौन्तेय! यह अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में होता है। जहाँ चित्त को लगाना है, वहाँ स्थिर करने के लिये बार-बार प्रयत्न का नाम अभ्यास है तथा देखी-सुनी विषय-वस्तुओं में (संसार या स्वर्गादि भोगों में) राग अर्थात् लगाव का त्याग वैराग्य है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन को वश में करना कठिन है, किन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में हो जाता है। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - Il 3 Il श्रीभगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।  महान् कार्य करने के लिये प्रयत्नशील अर्थात् महाबाहु अर्जुन! निःसन्देह मन चंचल है, बड़ी कठिनाई से वश में होनेवाला हैः परन्तु कौन्तेय! वैराग्य के द्वारा वश में होता है। यह अभ्यास और जहाँ चित्त को लगाना है, वहाँ स्थिर करने के लिये बार॰बार प्रयत्न का नाम अभ्यास है तथा देखी सुनी विषय-वस्तुओं में (संसार या स्वर्गादि भोगों में) राग अर्थात् लगाव का त्याग वैराग्य है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन को वश में करना कठिन f4 अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में है, हाे जाता है। ढ्वामी अडगडानंदजी महाराज  3 Il 3 Il श्रीभगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।  महान् कार्य करने के लिये प्रयत्नशील अर्थात् महाबाहु अर्जुन! निःसन्देह मन चंचल है, बड़ी कठिनाई से वश में होनेवाला हैः परन्तु कौन्तेय! वैराग्य के द्वारा वश में होता है। यह अभ्यास और जहाँ चित्त को लगाना है, वहाँ स्थिर करने के लिये बार॰बार प्रयत्न का नाम अभ्यास है तथा देखी सुनी विषय-वस्तुओं में (संसार या स्वर्गादि भोगों में) राग अर्थात् लगाव का त्याग वैराग्य है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन को वश में करना कठिन f4 अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में है, हाे जाता है। ढ्वामी अडगडानंदजी महाराज  3 - ShareChat
।। ॐ ।। चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।। हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल है, प्रमथन स्वभाववाला है (प्रमथन अर्थात् दूसरे को मथ डालनेवाला), हठी तथा बलवान् है, इसलिये इसे वश में करना मैं वायु की भाँति अतिदुष्कर मानता हूँ। तूफानी हवा और इसको रोकना बराबर है। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - 1 35 || चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्। |  हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल है, प्रमथन  स्वभाववाला है (प्रमथन अर्थात् को दूसरे मथ डालनेवाला ), हठी तथा बलवान् है इसलिये इसे वश में करना मैं वायु की भाँति अतिदुष्कर  84 हवा और तूफानी সাননা इसको रोकना बराबर है। 1 35 || चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्। |  हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल है, प्रमथन  स्वभाववाला है (प्रमथन अर्थात् को दूसरे मथ डालनेवाला ), हठी तथा बलवान् है इसलिये इसे वश में करना मैं वायु की भाँति अतिदुष्कर  84 हवा और तूफानी সাননা इसको रोकना बराबर है। - ShareChat
।। ॐ ।। अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्।। हे मधुसूदन! यह योग जो आप पहले बता आये हैं, जिससे समत्व भावदृष्टि मिलती है, मन के चञ्चल होने से बहुत समय तक इसमें ठहरनेवाली स्थिति में मैं अपने को नहीं देखता। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - ।श्रीमढ्भगवढ्गीता। | 200 ।।यथार्थ गीता।। ५२०० ப3 11 ५२०० अर्जुन उवाच ५२०० योड्यं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन 8 मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि हे मघुस्ूवलत्वयहत ययगिं किथिराम पहले आये हैं, जिससे समत्व भावदृष्टि बता ५२००  मिलती है, मन के चञ्चल होने से बहुत समय तक इसमें ठहरनेवाली स्थिति में ५२००  मैं अपने को नहीं देखता। aాశ గౌౌ अन्तराल के बाढ श्रीमद्भगवढ्गीता की शाश्वत व्याख्या ।यथार्थजीता धर्मशास नद ।श्रीमढ्भगवढ्गीता। | 200 ।।यथार्थ गीता।। ५२०० ப3 11 ५२०० अर्जुन उवाच ५२०० योड्यं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन 8 मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि हे मघुस्ूवलत्वयहत ययगिं किथिराम पहले आये हैं, जिससे समत्व भावदृष्टि बता ५२००  मिलती है, मन के चञ्चल होने से बहुत समय तक इसमें ठहरनेवाली स्थिति में ५२००  मैं अपने को नहीं देखता। aాశ గౌౌ अन्तराल के बाढ श्रीमद्भगवढ्गीता की शाश्वत व्याख्या ।यथार्थजीता धर्मशास नद - ShareChat
।। ॐ ।। आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः।। हे अर्जुन! जो योगी अपने ही समान सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है, अपने-जैसा देखता है, सुख और दुःख भी सबमें समान देखता है, वह योगी (जिसका भेदभाव समाप्त हो गया है) परमश्रेष्ठ माना गया है। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - 3ঁ || || आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योडर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः। ।  हे अर्जुन! जो योगी अपने ही समान सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है, अपने ्जैसा देखता  { दुःख भी सबमें समान देखता 8, 3R है, वह योगी ( जिसका भेदभाव समाप्त हो गया है ) परमश्रेष्ठ माना गया है। 3ঁ || || आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योडर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः। ।  हे अर्जुन! जो योगी अपने ही समान सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है, अपने ्जैसा देखता  { दुःख भी सबमें समान देखता 8, 3R है, वह योगी ( जिसका भेदभाव समाप्त हो गया है ) परमश्रेष्ठ माना गया है। - ShareChat
।। ॐ ।। सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।। जो पुरुष अनेकता से परे उपर्युक्त एकत्व भाव से मुझ परमात्मा को भजता है, वह योगी सब प्रकार के कार्यों में बरतता हुआ भी मेरे में ही बरतता है; क्योंकि मुझे छोड़कर उसके लिये कोई बचा भी तो नहीं। उसका तो सब मिट गया, इसलिये वह अब उठता, बैठता जो कुछ भी करता है, मेरे संकल्प से करता है। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - 9 II 3స II सर्वभूनस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः| सर्वथा वर्तमानोडपि स योगी मयि वर्तते।। जो पुरुष अनेकता से परे उपर्युक्त एकत्व भाव से मुझ परमात्मा को भजता हे, वह योगी सब प्रकार के कार्यों में बरतता हुआ भी मेरे में ही बरतता है; क्योंकि मुझे छोड़कर उसके लिये कोई बचा भी तो नहीं। उसका तो सब मिट गया इसलिये वह अब उठता , बैठता जो कुछ भी करता हे॰ मेरे संकल्प से करता हे। 9 II 3స II सर्वभूनस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः| सर्वथा वर्तमानोडपि स योगी मयि वर्तते।। जो पुरुष अनेकता से परे उपर्युक्त एकत्व भाव से मुझ परमात्मा को भजता हे, वह योगी सब प्रकार के कार्यों में बरतता हुआ भी मेरे में ही बरतता है; क्योंकि मुझे छोड़कर उसके लिये कोई बचा भी तो नहीं। उसका तो सब मिट गया इसलिये वह अब उठता , बैठता जो कुछ भी करता हे॰ मेरे संकल्प से करता हे। - ShareChat
।। ॐ ।। यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।। जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में मुझ परमात्मा को देखता है, व्याप्त देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ परमात्मा के ही अन्तर्गत देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। यह प्रेरक का आमने-सामने मिलन है, सख्यभाव है, सामीप्य मुक्ति है। #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
यथार्थ गीता - || 3 | | यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति। | में मुझ परमात्मा को जो पुरुष भूतों সম্পুত  देखता है, व्याप्त देखता है और सम्पूर्ण भूतों परमात्मा के ही अन्तर्गत देखता है, को मुझ  उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। यह प्रेरक का आमने सामने मिलन है, सख्यभाव है सामीप्य मुक्ति है। || 3 | | यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति। | में मुझ परमात्मा को जो पुरुष भूतों সম্পুত  देखता है, व्याप्त देखता है और सम्पूर्ण भूतों परमात्मा के ही अन्तर्गत देखता है, को मुझ  उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। यह प्रेरक का आमने सामने मिलन है, सख्यभाव है सामीप्य मुक्ति है। - ShareChat
।। ॐ ।। सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।। योग के परिणाम से युक्त आत्मावाला, सबमें समभाव से देखनेवाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण प्राणियों में व्याप्त देखता है और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में ही प्रवाहित देखता है। #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
यथार्थ गीता - Il36 Il सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।। योग के परिणाम से युक्त आत्मावाला , सव्में समभाव से देखनेवाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण प्राणियों में व्याप्त देखता ह और भूर्तों को आत्मा में ही सम्पूर्ण  प्रवाहित देखता ह। इस प्रकार देखने से लाभ क्या ह? Il36 Il सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।। योग के परिणाम से युक्त आत्मावाला , सव्में समभाव से देखनेवाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण प्राणियों में व्याप्त देखता ह और भूर्तों को आत्मा में ही सम्पूर्ण  प्रवाहित देखता ह। इस प्रकार देखने से लाभ क्या ह? - ShareChat
।। ॐ ।। युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः। सु #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 खेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।। पापरहित योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर उस परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति के अनन्त आनन्द की अनुभूति करता है। वह 'ब्रह्मसंस्पर्श' अर्थात् ब्रह्म के स्पर्श और प्रवेश के साथ अनन्त आनन्द का अनुभव करता है। अतः भजन अनिवार्य है।
यथार्थ गीता - I3 Il युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः |   ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।  सुखेन  पापरहित योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर उस परमात्मा में लगाता हुआ  परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति सुखपूर्वक " के अनन्त आनन्द की अनुभूति करता है। वह ' ब्रह्मसंस्पर्श अर्थात् ब्रह्म के स्पर्श और प्रवेश के साथ अनन्त आनन्द का अनुभव करता है। अतः भजन अनिवार्य है। I3 Il युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः |   ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।  सुखेन  पापरहित योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर उस परमात्मा में लगाता हुआ  परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति सुखपूर्वक " के अनन्त आनन्द की अनुभूति करता है। वह ' ब्रह्मसंस्पर्श अर्थात् ब्रह्म के स्पर्श और प्रवेश के साथ अनन्त आनन्द का अनुभव करता है। अतः भजन अनिवार्य है। - ShareChat
।। ॐ ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।। 'विजितात्मा' - विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, 'जितेन्द्रियः' जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और 'विशुद्धात्मा'- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' - सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता? - #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
यथार्थ गीता - ShareChat