Jagdish Sharma
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यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।। ॐ ।। श्रीभगवानुवाच इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥ योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन ! असूया (डाह, ईर्ष्या) रहित तेरे लिये मैं इस परमगोपनीय ज्ञान को विज्ञानसहित कहूँगा अर्थात् प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष की रहनी के साथ कहूँगा कि कैसे वह महापुरुष सर्वत्र एक साथ कर्म करता है, कैसे वह जागृति प्रदान करता है, रथी बनकर आत्मा के साथ कैसे सदैव रहता है? 'यत् ज्ञात्वा' जिसे साक्षात् जानकर तू दुःखरूपी संसार से मुक्त हो जायेगा। वह ज्ञान कैसा है? इस पर कहते हैं-"यथार्थ गीता" #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - 1 3ು | ( श्रीभगवानुवाच  इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।  ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेडशुभात्।। योगेश्वर  அிதன গতুন ! গমুমা  ने कहा- (डाह ईर्ष्या) रहित तेरे लिये मैं इस परमगोपनीय ज्ञान को विज्ञानसहित कहूँगा अर्थात् प्राप्ति के पश्चात महापुरुष की रहनी के साथ कहूँगा कि कैसे वह  महापुरुष सर्वत्र एक साथ कर्म करता है, कैसे वह जागृति प्रदान करता है, रथी बनकर आत्मा के सन्थ "d कैसे सदैव रहता है? ज्ञात्वा ' जिसे साक्षा र तू दुःखरूपी संसार से मुक्त हो जायेगा।  जानकर ज्ञान कैसा है? इस पर कहते हैं- " यथार्थ गीता " 1 3ು | ( श्रीभगवानुवाच  इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।  ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेडशुभात्।। योगेश्वर  அிதன গতুন ! গমুমা  ने कहा- (डाह ईर्ष्या) रहित तेरे लिये मैं इस परमगोपनीय ज्ञान को विज्ञानसहित कहूँगा अर्थात् प्राप्ति के पश्चात महापुरुष की रहनी के साथ कहूँगा कि कैसे वह  महापुरुष सर्वत्र एक साथ कर्म करता है, कैसे वह जागृति प्रदान करता है, रथी बनकर आत्मा के सन्थ "d कैसे सदैव रहता है? ज्ञात्वा ' जिसे साक्षा र तू दुःखरूपी संसार से मुक्त हो जायेगा।  जानकर ज्ञान कैसा है? इस पर कहते हैं- " यथार्थ गीता " - ShareChat
।। ॐ ।। वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्। अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥ इसको साक्षात्कारसहित जानकर (मानकर नहीं) योगी वेद, यज्ञ, तप और दान के पुण्यफलों का निःसन्देह अतिक्रमण कर जाता है और सनातन परमपद को प्राप्त होता है। अविदित परमात्मा की साक्षात् जानकारी का नाम वेद है। वह अविदित तत्त्व जब विदित हो गया तो अब कौन किसे जाने? अतः विदित होने के पश्चात् वेदों से भी प्रयोजन समाप्त हो जाता है; क्योंकि जाननेवाला भिन्न नहीं है। यज्ञ अर्थात् आराधना की नियत क्रिया आवश्यक थी; किन्तु जब वह तत्त्व विदित हो गया, तो किसके लिये भजन करे? मनसहित इन्द्रियों को लक्ष्य के अनुरूप तपाना तप है। लक्ष्य प्राप्त होने पर किसके लिये तप करे? मन, वचन और कर्म से सर्वतोभावेन समर्पण का नाम दान है। इन सबका पुण्यफल है परमात्मा की प्राप्ति। फल भी अब विलग नहीं है अतः इन सबकी अब आवश्यकता ही न रही। वह योगी यज्ञ, तप, दान इत्यादि के फल को भी पार कर जाता है। वह परमपद को प्राप्त होता है। #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
🧘सदगुरु जी🙏 - योगी यज्ञ, तप, दान इत्यादि के फल  13 वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।  अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यन्।।  को भी पार कर जाता है। इसको साक्षात्कारसहित जानकर (मानकर नहीं ) योगी वेद यज्ञ पुण्यफलों का निःसन्देह अतिक्रमण कर जाता है तप और दान के और सनातन परमपद को प्राप्त होता है। अविदित परमात्मा की विदित  साक्षात् जानकारी का नाम वेद है। वह अविदित तत्त्व जब हो गया तो अब कौन किसे जाने? अतः विदित होने के पश्चात वेदों से भी प्रयोजन समाप्त हो जाता हैः क्योंकि जाननेवाला भिन्न ६यन अथात आसदन 17 ٢٥  कसकालय ٧١ ٥ ٥ ٢٥ (٥ मनसहित इन्द्रियों को लक्ष्य के अनुरूप तपाना तप है। लक्ष्य प्राप्त होने पर किसके लिये तप करे ? मन॰ वचन और कर्म से सर्वतोभावेन समर्पण का नाम दान है। इन सबका पुण्यफल है परमात्मा की प्राप्ति। फल भी अब विलग नहीं है अतः इन सबकी अब आवश्यकता ही न रही। वह योगी यज्ञ, तप. दान इत्यादि फल को भी पार कर जाता हे। बह परमपद को प्राप्त होता हे योगी यज्ञ, तप, दान इत्यादि के फल  13 वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।  अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यन्।।  को भी पार कर जाता है। इसको साक्षात्कारसहित जानकर (मानकर नहीं ) योगी वेद यज्ञ पुण्यफलों का निःसन्देह अतिक्रमण कर जाता है तप और दान के और सनातन परमपद को प्राप्त होता है। अविदित परमात्मा की विदित  साक्षात् जानकारी का नाम वेद है। वह अविदित तत्त्व जब हो गया तो अब कौन किसे जाने? अतः विदित होने के पश्चात वेदों से भी प्रयोजन समाप्त हो जाता हैः क्योंकि जाननेवाला भिन्न ६यन अथात आसदन 17 ٢٥  कसकालय ٧١ ٥ ٥ ٢٥ (٥ मनसहित इन्द्रियों को लक्ष्य के अनुरूप तपाना तप है। लक्ष्य प्राप्त होने पर किसके लिये तप करे ? मन॰ वचन और कर्म से सर्वतोभावेन समर्पण का नाम दान है। इन सबका पुण्यफल है परमात्मा की प्राप्ति। फल भी अब विलग नहीं है अतः इन सबकी अब आवश्यकता ही न रही। वह योगी यज्ञ, तप. दान इत्यादि फल को भी पार कर जाता हे। बह परमपद को प्राप्त होता हे - ShareChat
।। ॐ ।। नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयोक्तो भवार्जुन॥ हे पार्थ! इस प्रकार इन मार्गों को जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता। वह जानता है कि पूर्ण प्रकाश पा लेने पर ब्रह्म को प्राप्त होगा और क्षीण प्रकाश रहने पर भी पुनर्जन्म में साधन का नाश नहीं होता। दोनों गतियाँ शाश्वत हैं। अतः अर्जुन ! तू सब काल में योग से युक्त हो अर्थात् निरन्तर साधन कर। #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - ।। ऊँ ।। नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयोक्तो भवार्जुन।। हे पार्थ! इस प्रकार इन मार्गों को कोई भी योगी मोहित नहीं जानकर होता। वह जानता है कि पूर्ण प्रकाश पा लेने पर ब्रह्म को प्राप्त होगा और क्षीण पुनर्जन्म में साधन प्रकाश रहने पर भी का नाश नहीं होता। दोनों गतियाँ शाश्वत हैं। अतः अर्जुन तू सब काल में योग से युक्त हो अर्थात् निरन्तर साधन कर। ।। ऊँ ।। नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयोक्तो भवार्जुन।। हे पार्थ! इस प्रकार इन मार्गों को कोई भी योगी मोहित नहीं जानकर होता। वह जानता है कि पूर्ण प्रकाश पा लेने पर ब्रह्म को प्राप्त होगा और क्षीण पुनर्जन्म में साधन प्रकाश रहने पर भी का नाश नहीं होता। दोनों गतियाँ शाश्वत हैं। अतः अर्जुन तू सब काल में योग से युक्त हो अर्थात् निरन्तर साधन कर। - ShareChat
।। ॐ ।। शुक्लकृष्णे गती होते जगतः शाश्वते मते। एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः॥ #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख उपर्युक्त शुक्ल और कृष्ण दोनों प्रकार की गतियाँ जगत् में शाश्वत हैं अर्थात् साधन का कभी विनाश नहीं होता। एक (शुक्ल) अवस्था में प्रयाण करनेवाला पीछे न आनेवाली परमगति को प्राप्त होता है और दूसरी अवस्था में, जिसमें क्षीण प्रकाश तथा अभी कालिमा है ऐसी अवस्था को गया हुआ पीछे लौटता है, जन्म लेता है। जब तक पूर्ण प्रकाश नहीं मिलता, तब तक उसे भजन करना है। प्रश्न पूर्ण हुआ। अब इसके लिये साधन पर पुनः बल देते हैं-
🧘सदगुरु जी🙏 - ऊँ ।] II शुक्लकृष्णे गती होते जगतः शाश्वते मते। यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः।l एकया उपर्युक्त शुक्ल और कृष्ण दोनों प्रकार की गतियाँ जगत् में शाश्वत हैं अर्थात् साधन का कभी विनाश नहीं होता। एक ( शुक्ल) अवस्था में प्रयाण करनेवाला पीछे न आनेवाली परमगति को  होता है और  अवस्था में, जिसमें दूसरी সাদ क्षीण प्रकाश तथा अभी कालिमा है ऐसी अवस्था को गया हुआ पीछे लौटता है, जन्म लेता है। जब पूर्ण प्रकाश नहीं मिलता, तब तक उसे भजन तक करना है। प्रश्न पूर्ण हुआ। अब इसके लिये साधन पर पुनः बल देते हैं- प्यथरथजक ऊँ ।] II शुक्लकृष्णे गती होते जगतः शाश्वते मते। यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः।l एकया उपर्युक्त शुक्ल और कृष्ण दोनों प्रकार की गतियाँ जगत् में शाश्वत हैं अर्थात् साधन का कभी विनाश नहीं होता। एक ( शुक्ल) अवस्था में प्रयाण करनेवाला पीछे न आनेवाली परमगति को  होता है और  अवस्था में, जिसमें दूसरी সাদ क्षीण प्रकाश तथा अभी कालिमा है ऐसी अवस्था को गया हुआ पीछे लौटता है, जन्म लेता है। जब पूर्ण प्रकाश नहीं मिलता, तब तक उसे भजन तक करना है। प्रश्न पूर्ण हुआ। अब इसके लिये साधन पर पुनः बल देते हैं- प्यथरथजक - ShareChat
।। ॐ ।। धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासादक्षिणायनम्। तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्यनिवर्तते ॥ #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 जिसके प्रयाणकाल में धुआँ फैल रहा हो, योगाग्नि हो (अग्नि यज्ञ-प्रक्रिया में पायी जानेवाली अग्नि का स्वरूप है।) किन्तु धुएँ से आच्छादित हो, अविद्या की रात्रि हो, अँधेरा हो, कृष्णपक्ष का चन्द्रमा क्षीण हो रहा हो, कालिमा का बाहुल्य हो, ष‌ड्विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर) से युक्त दक्षिणायन अर्थात् बहिर्मुखी हो (जो परमात्मा के प्रवेश से अभी बाहर है।) उस योगी को पुनः जन्म लेना पड़ता है। तो क्या शरीर के साथ उस योगी की साधना नष्ट हो जाती है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-"यथार्थ गीता"
❤️जीवन की सीख - 3 भगवान और सद्गुरु Il3 Il रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासादक्षिणायनम्। धूमो - योगेश्वर तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्यनिवर्तते Il भगवाज श्रीकृष्ण जिसके प्रयाणकाल में धुआँ फैल रहा हो, योगाग्नि हो (अग्नि यज्ञ प्रक्रिया में पायी जानेवाली अग्नि का स्वरूप है। ) किन्तु धुएँ से आच्छादित हो, अविद्या की रात्रि हो, अँधेरा हो, कृष्णपक्ष का चन्द्रमा क्षीण हो रहा हो, कालिमा का बाहुल्य हो षड्विकारों (काम , क्रोध लोभ मोहः मद ओर मत्सर ) से युक्त दक्षिणायन अर्थात् बहिर्मुखी हो (जो परमात्मा के प्रवेश से अभी बाहरहे।) उस योगी को पुनः जन्म लेना पड़ता है। तो क्या शरीर के साथ उस योगी की साधना नष्ट हो जाती है? कहते हैं-"यथार्थ गीता " সীকৃষ্ণা? इस पर योगेश्वर पूज्य स्वामी श्री परमानन्द जी महाराज ( परमहंस जी ) षयथार्थ गीता  कै प्रणैता स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज 3 भगवान और सद्गुरु Il3 Il रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासादक्षिणायनम्। धूमो - योगेश्वर तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्यनिवर्तते Il भगवाज श्रीकृष्ण जिसके प्रयाणकाल में धुआँ फैल रहा हो, योगाग्नि हो (अग्नि यज्ञ प्रक्रिया में पायी जानेवाली अग्नि का स्वरूप है। ) किन्तु धुएँ से आच्छादित हो, अविद्या की रात्रि हो, अँधेरा हो, कृष्णपक्ष का चन्द्रमा क्षीण हो रहा हो, कालिमा का बाहुल्य हो षड्विकारों (काम , क्रोध लोभ मोहः मद ओर मत्सर ) से युक्त दक्षिणायन अर्थात् बहिर्मुखी हो (जो परमात्मा के प्रवेश से अभी बाहरहे।) उस योगी को पुनः जन्म लेना पड़ता है। तो क्या शरीर के साथ उस योगी की साधना नष्ट हो जाती है? कहते हैं-"यथार्थ गीता " সীকৃষ্ণা? इस पर योगेश्वर पूज्य स्वामी श्री परमानन्द जी महाराज ( परमहंस जी ) षयथार्थ गीता  कै प्रणैता स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज - ShareChat
।। ॐ ।। अग्निज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ शरीर-सम्बन्ध का त्याग करते समय जिनके समक्ष ज्योतिर्मय अग्नि जल रही हो, दिन का प्रकाश फैला हो, सूर्य चमक रहा हो, शुक्लपक्ष का चन्द्र बढ़ रहा हो, उत्तरायण का निरभ्र और सुन्दर आकाश हो, उस काल में प्रयाण करनेवाले ब्रह्मवेत्ता योगीजन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। अग्नि ब्रह्मतेज का प्रतीक है। दिन विद्या का प्रकाश है। शुक्लपक्ष निर्मलता का द्योतक है। विवेक, वैराग्य, शम, दम, तेज और प्रज्ञा ये षडैश्वर्य ही षण्मास हैं। ऊध्र्वरता स्थिति ही उत्तरायण है। प्रकृति से सर्वथा परे इस अवस्था में जानेवाले ब्रह्मवेत्ता योगीजन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता; किन्तु अनन्य चित्त से लगे हुए योगीजन यदि इस आलोक को प्राप्त नहीं कर पाये, जिनकी साधना अभी पूर्ण नहीं है, उनका क्या होता है? इस पर कहते हैं-"यथार्थ गीता" #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - 113 I1 अग्निज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। ब्रह्मविदो जनाः तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म शरीर ्सम्बन्ध का त्याग करते समय जिनके समक्ष ज्योतिर्मय अग्नि जल रही हो, दिन का प्रकाश फैला हो, सूर्य चमक रहा हो, शुक्लपक्ष का चन्द्र बढ़ रहा हो,  और सुन्दर आकाश हो, उस काल में उत्तरायण का निरभ्र - ब्रह्मवेत्ता योगीजन ब्रह्म को प्राप्त होते प्रयाण करनेवाले हैं। अग्नि ब्रह्मतेज का प्रतीक है। दिन विद्या का प्रकाश है। शुक्लपक्ष निर्मलता का द्योतक है। विवेक , वैराग्य , शम, दम , तेज और प्रज्ञा ये षडैश्वर्य ही षण्मास हैं। ऊध्र्वरता स्थिति ही उत्तरायण है। प्रकृति से सर्वथा परे इस अवस्था में जानेवाले ब्रह्मवेत्ता योगीजन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, पुनर्जन्म नहीं होताः किन्तु अनन्य चित्त से लगे हुए उनका योगीजन यदि इस आलोक को प्राप्त नहीं कर पाये, जिनकी साधना अभी पूर्ण नहीं है, उनका क्या होता है? इस पर कहते हैं-"यथार्थ गीता" ?^^7)755 பளீச 113 I1 अग्निज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। ब्रह्मविदो जनाः तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म शरीर ्सम्बन्ध का त्याग करते समय जिनके समक्ष ज्योतिर्मय अग्नि जल रही हो, दिन का प्रकाश फैला हो, सूर्य चमक रहा हो, शुक्लपक्ष का चन्द्र बढ़ रहा हो,  और सुन्दर आकाश हो, उस काल में उत्तरायण का निरभ्र - ब्रह्मवेत्ता योगीजन ब्रह्म को प्राप्त होते प्रयाण करनेवाले हैं। अग्नि ब्रह्मतेज का प्रतीक है। दिन विद्या का प्रकाश है। शुक्लपक्ष निर्मलता का द्योतक है। विवेक , वैराग्य , शम, दम , तेज और प्रज्ञा ये षडैश्वर्य ही षण्मास हैं। ऊध्र्वरता स्थिति ही उत्तरायण है। प्रकृति से सर्वथा परे इस अवस्था में जानेवाले ब्रह्मवेत्ता योगीजन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, पुनर्जन्म नहीं होताः किन्तु अनन्य चित्त से लगे हुए उनका योगीजन यदि इस आलोक को प्राप्त नहीं कर पाये, जिनकी साधना अभी पूर्ण नहीं है, उनका क्या होता है? इस पर कहते हैं-"यथार्थ गीता" ?^^7)755 பளீச - ShareChat
।। ॐ ।। यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥ हे अर्जुन ! जिस काल में शरीर त्यागकर गये हुए योगीजन पुनर्जन्म को नहीं पाते और जिस काल में शरीर त्यागने पर पुनर्जन्म पाते हैं, मैं अब उस काल का वर्णन करता हूँ। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - ।। ऊँ ।। यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव ufT:l प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।। जिस काल में शरीर हे अर्जुन त्यागकर गये हुए योगीजन पुनर्जन्म को नहीं पाते और जिस काल में शरीर त्यागने पर पुनर्जन्म पाते हैं, मैं अब उस काल का वर्णन करता हूँ। {495ು43521 அவகிரை ।। ऊँ ।। यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव ufT:l प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।। जिस काल में शरीर हे अर्जुन त्यागकर गये हुए योगीजन पुनर्जन्म को नहीं पाते और जिस काल में शरीर त्यागने पर पुनर्जन्म पाते हैं, मैं अब उस काल का वर्णन करता हूँ। {495ು43521 அவகிரை - ShareChat
।। ॐ ।। पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्या। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥ पार्थ! जिस परमात्मा के अन्तर्गत सम्पूर्ण भूत हैं, जिससे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, सनातन अव्यक्त भाववाला वह परमपुरुष अनन्य भक्ति से प्राप्त होने योग्य है। अनन्य भक्ति का तात्पर्य है कि परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का स्मरण न करते हुए उनसे जुड़ जाय। अनन्य भाव से लगनेवाले पुरुष भी कब तक पुनर्जन्म की सीमा में हैं और कब वे पुनर्जन्म का अतिक्रमण कर जाते हैं? इस पर योगेश्वर कहते हैं- #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - अनन्य भक्ति |/ 35 |/ परमात्मा के सिवाय पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्या। अन्य किसी का येन सर्वमिदं ततम् Il यस्यान्तःस्थानि भूतानि स्मरण न करते हुए पार्थ! जिस परमात्मा के अन्तर्गत सम्पूर्ण भूत हैं, उनसे जुड़ जाय। जिससे जगत् व्याप्त है, सनातन अव्यक्त সম্পুত भाववाला वह परमपुरुष अनन्य भक्ति से प्राप्त होने योग्य है। अनन्य भक्ति का तात्पर्य है कि परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का स्मरण न करते हुए उनसे जुड़ जाय। अनन्य भाव से लगनेवाले पुरुष भी कब तक की सीमा पुनर्जन्म में हैं और कब वे पुनर्जन्म का अतिक्रमण कर जाते हैं? इस पर योगेश्वर कहते हैं- பவளிரை अनन्य भक्ति |/ 35 |/ परमात्मा के सिवाय पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्या। अन्य किसी का येन सर्वमिदं ततम् Il यस्यान्तःस्थानि भूतानि स्मरण न करते हुए पार्थ! जिस परमात्मा के अन्तर्गत सम्पूर्ण भूत हैं, उनसे जुड़ जाय। जिससे जगत् व्याप्त है, सनातन अव्यक्त সম্পুত भाववाला वह परमपुरुष अनन्य भक्ति से प्राप्त होने योग्य है। अनन्य भक्ति का तात्पर्य है कि परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का स्मरण न करते हुए उनसे जुड़ जाय। अनन्य भाव से लगनेवाले पुरुष भी कब तक की सीमा पुनर्जन्म में हैं और कब वे पुनर्जन्म का अतिक्रमण कर जाते हैं? इस पर योगेश्वर कहते हैं- பவளிரை - ShareChat
।। ॐ।। अव्यक्तोक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥ उस सनातन अव्यक्त भाव को अक्षर अर्थात् अविनाशी कहा जाता है। उसी को परमगति कहते हैं। वही मेरा परमधाम है, जिसे प्राप्त होकर मनुष्य पीछे नहीं आते, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इस सनातन अव्यक्त भाव की प्राप्ति का विधान बताते हैं- #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🧘सदगुरु जी🙏 - Il ತ2 | | अव्यक्तोक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम Il उस सनातन अव्यक्त भाव को अक्षर अर्थात् अविनाशी कहा जाता है। उसी को परमगति कहते हैं। वही मेरा परमधाम है, जिसे प्राप्त होकर मनुष्य पीछे नहीं आते , उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इस सनातन अव्यक्त भाव की प्राप्ति का विधान बताते हैं- Il ತ2 | | अव्यक्तोक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम Il उस सनातन अव्यक्त भाव को अक्षर अर्थात् अविनाशी कहा जाता है। उसी को परमगति कहते हैं। वही मेरा परमधाम है, जिसे प्राप्त होकर मनुष्य पीछे नहीं आते , उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इस सनातन अव्यक्त भाव की प्राप्ति का विधान बताते हैं- - ShareChat
।। ॐ ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।। 'विजितात्मा' - विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, 'जितेन्द्रियः' जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और 'विशुद्धात्मा'- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' - सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता? - #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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