Jagdish Sharma
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Jagdish Sharma
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यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।। ॐ ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।। 'विजितात्मा' - विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, 'जितेन्द्रियः' जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और 'विशुद्धात्मा'- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' - सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता? - #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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।। ॐ ।। श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ पार्थ! तू मुझमें आसक्त हुए मनवाला, बाहरी नहीं अपितु 'मदाश्रयः'- मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ (छोड़कर नहीं) मुझको जिस प्रकार संशयरहित जानेगा, उसको सुन। जिसे जानने के पश्चात् लेशमात्र भी संशय न रह जाय, विभूतियों की उस समग्र जानकारी पर पुनः बल देते हैं- "यथार्थ गीता" #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - 39 130 | श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः | असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ।। तू मुझमें आसक्त हुए मनवाला , बाहरी पार्थ! अपितु मेरे परायण होकर नहीं मदाश्रयः योग में लगा हुआ ( छोड़कर नहीं ) मुझको जिस प्रकार संशयरहित जानेगा, उसको सुन। जिसे जानने के पश्चात लेशमात्र भी संशय न रह जाय विभूतियों की उस समग्र जानकारी पर बल देते हें॰ ^ यथार्थ गीता " 39 130 | श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः | असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ।। तू मुझमें आसक्त हुए मनवाला , बाहरी पार्थ! अपितु मेरे परायण होकर नहीं मदाश्रयः योग में लगा हुआ ( छोड़कर नहीं ) मुझको जिस प्रकार संशयरहित जानेगा, उसको सुन। जिसे जानने के पश्चात लेशमात्र भी संशय न रह जाय विभूतियों की उस समग्र जानकारी पर बल देते हें॰ ^ यथार्थ गीता " - ShareChat
।। ॐ ।। योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः।। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 सम्पूर्ण निष्काम कर्मयोगियों में भी जो श्रद्धाविभोर होकर अन्तरात्मा से, अन्तर्चिन्तन से मुझे निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परमश्रेष्ठ मान्य है। भजन दिखावे या प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। इससे समाज भले ही अनुकूल हो किन्तु प्रभु प्रतिकूल हो जाते हैं। भजन अत्यन्त गोपनीय है और वह अन्तःकरण से होता है। उसका उतार-चढ़ाव अन्तःकरण के ऊपर है।
यथार्थ गीता - भजन दिखावे या प्रदर्शन की Il 3 Il योगिनामपि सर्वेषां मद्नगतेनान्तरात्मना। वस्तु नहीं है। इससे समाज भले श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो ही अनुकूल हो किन्तु प्रभु मतः।| সনিক্রুল ক্ী আান ট1 পতন निष्काम कर्मयोगियों में भी जो সম্পুণ [ अत्यन्त गोपनीय है और वह श्रद्धाविभोर होकर अन्तरात्मा से, अन्तर्चिन्तन से मुझे निरन्तर भजता है, वह अन्तःकरण से होता है। योगी मुझे परमश्रेष्ठ मान्य है। भजन दिखावे या प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। इससे समाज भले ही अनुकूल हो किन्तु प्रभु प्रतिकूल हो जाते हैं। भजन अत्यन्त गोपनीय है और वह अन्तःकरण से होता है। उसका उतार-चढ़ाव अन्तःकरण के 381 भजन दिखावे या प्रदर्शन की Il 3 Il योगिनामपि सर्वेषां मद्नगतेनान्तरात्मना। वस्तु नहीं है। इससे समाज भले श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो ही अनुकूल हो किन्तु प्रभु मतः।| সনিক্রুল ক্ী আান ট1 পতন निष्काम कर्मयोगियों में भी जो সম্পুণ [ अत्यन्त गोपनीय है और वह श्रद्धाविभोर होकर अन्तरात्मा से, अन्तर्चिन्तन से मुझे निरन्तर भजता है, वह अन्तःकरण से होता है। योगी मुझे परमश्रेष्ठ मान्य है। भजन दिखावे या प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। इससे समाज भले ही अनुकूल हो किन्तु प्रभु प्रतिकूल हो जाते हैं। भजन अत्यन्त गोपनीय है और वह अन्तःकरण से होता है। उसका उतार-चढ़ाव अन्तःकरण के 381 - ShareChat
।। ॐ ।। तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 तपस्वियों से योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है, कर्मियों से भी योगी श्रेष्ठ है; इसलिये अर्जुन ! तू योगी बन।
यथार्थ गीता - 3 1]  तपस्विभ्योडधिकी  योगी ज्ञानिभ्योडपि मतडधिकः कर्मिभ्यश्चाधिको यौती तस्मारगी भवार्जु तपस्वियों सयगी श्रेष्ठ  ज्ञानियों सेशी ~ष्ठ م া  कर्मियों सेरथ॰योगी है 6, इसलिये   अर्जन तूयो ು  / 3 1]  तपस्विभ्योडधिकी  योगी ज्ञानिभ्योडपि मतडधिकः कर्मिभ्यश्चाधिको यौती तस्मारगी भवार्जु तपस्वियों सयगी श्रेष्ठ  ज्ञानियों सेशी ~ष्ठ م া  कर्मियों सेरथ॰योगी है 6, इसलिये   अर्जन तूयो ು  / - ShareChat
।। ॐ ।। प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ।। अनेक जन्मों से प्रयत्न करनेवाला योगी परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी सभी पापों से अच्छी प्रकार शुद्ध होकर परमगति को प्राप्त हो जाता है। प्राप्ति का यही क्रम है। पहले शिथिल प्रयत्न से वह योग आरम्भ करता है, मन चलायमान होने पर जन्म लेता है, सद्गुरु के कुल में प्रवेश पाता है और प्रत्येक जन्म में अभ्यास करते हुए वहीं पहुँच जाता है, जिसका नाम परमगति परमधाम है। श्रीकृष्ण ने कहा कि 'स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य' (२/४०) इस धर्म का स्वल्प अभ्यास भी महान जन्म-मृत्यु के भय से उद्धार करनेवाला होता है। धर्म बदलता नहीं है। इस योग में बीज का नाश नहीं होता। आप दो कदम चल भर दें, उस साधन का कभी नाश नहीं होता। हर परिस्थिति में रहते हुए पुरुष ऐसा कर सकता है। कारण कि थोड़ा साधन तो परिस्थितियों से घिरनेवाला व्यक्ति ही कर पाता है; क्योंकि उसके पास समय नहीं है। आप काले हों, गोरे हों अथवा कहीं के हों, गीता सबके लिये है। आपके लिये भी है, बशर्ते आप मनुष्य हों। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - श्रकृष्णने कहाकि स्वल्पमायस्य थमक्य झस थन ar3aHM ನr जन्म मृत्यु केभयसी उब्धार  करलेवाला होता है। धर्न बनलता नहीं है। इस योग्सें बीजाक Viar-ನನn ~  ~  க1 ப U٧U UUI B  பாகாI #பu ` ஈாராரசn சப்ப்சa1 ஈஈ-ப711a ப1 /7/{6]47957ா I T` 077Iப - মাদদমানবানাযমম় হাঁব মাপবী বমেন H7 ர8P71 पचमठतिपेगा  iulaa T மh Iau a THaIHTHI~I7 r71 ச7 TIAIசIப !பu  Trlo =ரII =7 1 Dப nuauaumras ஈm ஈn ஈரர farI ப  ரசபfmIam Lamaln ದ 1 श्रकृष्णने कहाकि स्वल्पमायस्य थमक्य झस थन ar3aHM ನr जन्म मृत्यु केभयसी उब्धार  करलेवाला होता है। धर्न बनलता नहीं है। इस योग्सें बीजाक Viar-ನನn ~  ~  க1 ப U٧U UUI B  பாகாI #பu ` ஈாராரசn சப்ப்சa1 ஈஈ-ப711a ப1 /7/{6]47957ா I T` 077Iப - মাদদমানবানাযমম় হাঁব মাপবী বমেন H7 ர8P71 पचमठतिपेगा  iulaa T மh Iau a THaIHTHI~I7 r71 ச7 TIAIசIப !பu  Trlo =ரII =7 1 Dப nuauaumras ஈm ஈn ஈரர farI ப  ரசபfmIam Lamaln ದ 1 - ShareChat
।। ॐ ।। पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते।। श्रीमानों के घर विषयों के वश में रहने पर भी वह पूर्वजन्म के अभ्यास से भगवत्पथ की ओर आकर्षित हो जाता है और योग में शिथिल प्रयत्नवाला वह जिज्ञासु भी वाणी के विषय को पार करके निर्वाण पद को पा जाता है। उसकी प्राप्ति का यही तरीका है। कोई एक जन्म में पाता भी नहीं। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - 1| 3 | | पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोङपि सः।  जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते। । श्रीमानों के घर विषयों के वश में रहने पर भी पूर्वजन्म के अभ्यास से भगवत्पथ की वह ओर आकर्षित हो जाता है और योग में जिज्ञासु  शिथिल प्रयत्नवाला वह भी वाणी के विषय को पार करके निर्वाण पद को पा जाता है। उसकी प्राप्ति का यही तरीका है। कोई में पाता भी नहीं। Tch GFT 1| 3 | | पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोङपि सः।  जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते। । श्रीमानों के घर विषयों के वश में रहने पर भी पूर्वजन्म के अभ्यास से भगवत्पथ की वह ओर आकर्षित हो जाता है और योग में जिज्ञासु  शिथिल प्रयत्नवाला वह भी वाणी के विषय को पार करके निर्वाण पद को पा जाता है। उसकी प्राप्ति का यही तरीका है। कोई में पाता भी नहीं। Tch GFT - ShareChat
।। ॐ ।। तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्। यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।। वहाँ वह पूर्वशरीर में साधन किये हुए बुद्धि के संयोग को अर्थात् पूर्वजन्म के साधन-संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन ! उसके प्रभाव से वह फिर 'संसिद्धौ' -भगवत्प्राप्तिरूपी परमसिद्धि के निमित्त प्रयत्न करने लगता है। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - 13ು | बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।  तत्रत भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।।  यतते च ননা पूर्वशरीर में साधन किये हुए बुद्धि के = নচাঁ নচ संयोग को अर्थात् पूर्वजन्म के साधन संस्कारों  को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे फिर उसके प्रभाव से वह कुरुनन्दन 'संसिद्धौ - भगवत्प्राप्तिरूपी परमसिद्धि के निमित्त प्रयत्न करने लगता है। 13ು | बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।  तत्रत भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।।  यतते च ননা पूर्वशरीर में साधन किये हुए बुद्धि के = নচাঁ নচ संयोग को अर्थात् पूर्वजन्म के साधन संस्कारों  को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे फिर उसके प्रभाव से वह कुरुनन्दन 'संसिद्धौ - भगवत्प्राप्तिरूपी परमसिद्धि के निमित्त प्रयत्न करने लगता है। - ShareChat
।। ॐ ।। अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्। एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्।। अथवा वहाँ जन्म न मिलने पर भी स्थिरबुद्धि योगियों के कुल में वह प्रवेश पा जाता है। श्रीमानों के घर में पवित्र संस्कार बचपन से ही मिलने लगते हैं; किन्तु वहाँ जन्म न हो पाने पर वह योगियों के कुल में (घर में नहीं) शिष्य-परम्परा में प्रवेश पा जाता है। कबीर, तुलसी, रैदास, बाल्मीकि इत्यादि को शुद्ध आचरण और श्रीमानों का घर नहीं, योगियों के कुल में प्रवेश मिला। सद्गुरु के कुल में संस्कारों का परिवर्तन भी एक जन्म है और ऐसा जन्म संसार में निःसन्देह अतिदुर्लभ है। योगियों के यहाँ जन्म का अर्थ उनके शरीर से पुत्ररूप में उत्पन्न होना नहीं है। गृहत्याग से पूर्व पैदा होनेवाले लड़के मोहवश महापुरुष को भी भले ही पिता मानते रहे; किन्तु महापुरुष के लिये घरवालों के नाम पर कोई नहीं होता। जो शिष्य उनकी मर्यादाओं का अनुष्ठान करते हैं, उनका महत्त्व लड़कों से कई गुना अधिक मानते हैं। वही उनके सच्चे पुत्र हैं। जो योग के संस्कारों से युक्त नहीं हैं, उन्हें महापुरुष नहीं अपनाते। 'पूज्य महाराज जी' यदि साधु बनाते तो हजारों विरक्त उनके शिष्य होते। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - Il 3 Il अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्। एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्।।  अथवा वहाँ जन्म न मिलने पर भी स्थिरबुद्धि योगियों के कुल में वह प्रवेश पा जाता है। श्रीमानों के घर में पवित्र संस्कार बचपन से ही मिलने लगते हैं; किन्तु वहाँ जन्म न हो पाने के कुल में (घर में नहीं) पर वह योगियों शिष्य परम्परा में प्रवेश पा जाता है। Il 3 Il अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्। एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्।।  अथवा वहाँ जन्म न मिलने पर भी स्थिरबुद्धि योगियों के कुल में वह प्रवेश पा जाता है। श्रीमानों के घर में पवित्र संस्कार बचपन से ही मिलने लगते हैं; किन्तु वहाँ जन्म न हो पाने के कुल में (घर में नहीं) पर वह योगियों शिष्य परम्परा में प्रवेश पा जाता है। - ShareChat
।। ॐ ।। प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः। शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।। मन चलायमान होने से योगभ्रष्ट हुआ वह पुरुष पुण्यवानों के लोकों में वासनाओं को भोगकर (जिन वासनाओं को लेकर वह योगभ्रष्ट हुआ था, भगवान उसे थोड़े में सब दिखा-सुना देते हैं, उन्हें भोगकर) वह 'शुचीनां श्रीमताम्'- शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - जो शुद्ध आचरणवाले हैं, वही श्रीमान् हैं। स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  Il 3 Il पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः प्राप्य समाः | शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोडभिजायते।। से योगभ्रष्ट हुआ वह मन चलायमान होने के लोकों में वासनाओं पुण्यवानों  9q को भोगकर (जिन वासनाओं को लेकर वह योगभ्रष्ट हुआ था, भगवान उसे थोड़े में सब दिखा सुना देते हैं, उन्हें भोगकर) श्रीमताम् - शुद्ध शुचीनां वह आचरणवाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है। जो शुद्ध आचरणवाले हैं, वही श्रीमान् हैं। स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  Il 3 Il पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः प्राप्य समाः | शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोडभिजायते।। से योगभ्रष्ट हुआ वह मन चलायमान होने के लोकों में वासनाओं पुण्यवानों  9q को भोगकर (जिन वासनाओं को लेकर वह योगभ्रष्ट हुआ था, भगवान उसे थोड़े में सब दिखा सुना देते हैं, उन्हें भोगकर) श्रीमताम् - शुद्ध शुचीनां वह आचरणवाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है। - ShareChat
।।ॐ।। श्रीभगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति।। पार्थिव शरीर को ही रथ बनाकर लक्ष्य की ओर अग्रसर अर्जुन ! उस पुरुष का न तो इस लोक में और न परलोक में ही नाश होता है; क्योंकि हे तात! उस परमकल्याणकारी नियत कर्म को करनेवाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। उसका होता क्या है? देखें-"यथार्थ गीता" #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - 11311 श्रीभगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। कल्याणकृत्कश्चिद्र्गतिं " ೯೯ নান गच्छति। । पार्थिव शरीर को ही रथ बनाकर लक्ष्य की ओर अग्रसर अर्जुन ! उस पुरुष का न तो लोक में और न परलोक में ही नाश  इस होता हैः क्योंकि हे तात! उस परमकल्याणकारी नियत कर्म को करनेवाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। उसका होता क्या है? देखें "यथार्थ गीता" 11311 श्रीभगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। कल्याणकृत्कश्चिद्र्गतिं " ೯೯ নান गच्छति। । पार्थिव शरीर को ही रथ बनाकर लक्ष्य की ओर अग्रसर अर्जुन ! उस पुरुष का न तो लोक में और न परलोक में ही नाश  इस होता हैः क्योंकि हे तात! उस परमकल्याणकारी नियत कर्म को करनेवाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। उसका होता क्या है? देखें "यथार्थ गीता" - ShareChat