Jagdish Sharma
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Jagdish Sharma
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यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।। ॐ ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।। 'विजितात्मा' - विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, 'जितेन्द्रियः' जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और 'विशुद्धात्मा'- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' - सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता? - #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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।। ॐ ।। ये चैव सात्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ और भी जो सत्त्वगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, जो रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, उन सबको तू मुझसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं, ऐसा जान। परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मेरे में नहीं हैं। क्योंकि न मैं उनमें खोया हुआ हूँ और न वे ही मुझमें प्रवेश कर पाते हैं; क्योंकि मुझे कर्म से स्पृहा नहीं है। मैं निर्लेप हूँ, मुझे इनमें कुछ पाना नहीं है। इसलिये मुझमें प्रवेश नहीं कर पाते। ऐसा होने पर भी- जिस प्रकार आत्मा की उपस्थिति से ही शरीर को भूख-प्यास लगती है, आत्मा को अन्न अथवा जल से कोई प्रयोजन नहीं है, उसी प्रकार प्रकृति परमात्मा की उपस्थिति में ही अपना कार्य कर पाती है। परमात्मा उसके गुण और कार्यों से निर्लेप रहता है। #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - जिस प्रकार आत्मा की उपस्थिति ।।ऊँ ।। से ही शरीर को भूखनप्यास लगती ये चैव सात्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। है, आत्मा को अन्न अथवा जल से एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि Il मत्त कोई प्रयोजन नहीं है॰ उसी प्रकार परमात्मा की उपस्थिति में प्रकृति और भी जो सत्त्वगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, जो ही अपना कार्य कर पाती है। रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, उन परमात्मा उसके गुण और कार्यों से निर्लेप रहता है। तू मुझसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं, ऐसा जान। Hdo परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मेरे में नहीं हैं। क्योंकि न मैं उनमें खोया हुआ हूँ और न वे ही प्रवेश कर मुझमें पाते हैं; क्योंकि मुझे कर्म से स्पृहा नहीं है। मैं निर्लेप हूँ, मुझे इनमें कुछ पाना नहीं है। इसलिये प्रवेश मुझमें : नहीं कर पाते। ऐसा होने पर भी- {59495ು4ಚ025 "অাথ১৯) जिस प्रकार आत्मा की उपस्थिति ।।ऊँ ।। से ही शरीर को भूखनप्यास लगती ये चैव सात्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। है, आत्मा को अन्न अथवा जल से एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि Il मत्त कोई प्रयोजन नहीं है॰ उसी प्रकार परमात्मा की उपस्थिति में प्रकृति और भी जो सत्त्वगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, जो ही अपना कार्य कर पाती है। रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, उन परमात्मा उसके गुण और कार्यों से निर्लेप रहता है। तू मुझसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं, ऐसा जान। Hdo परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मेरे में नहीं हैं। क्योंकि न मैं उनमें खोया हुआ हूँ और न वे ही प्रवेश कर मुझमें पाते हैं; क्योंकि मुझे कर्म से स्पृहा नहीं है। मैं निर्लेप हूँ, मुझे इनमें कुछ पाना नहीं है। इसलिये प्रवेश मुझमें : नहीं कर पाते। ऐसा होने पर भी- {59495ು4ಚ025 "অাথ১৯) - ShareChat
।। ॐ ।। बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कमोऽस्मि भरतर्षभ॥ हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! मैं बलवानों की कामना और आसक्तिरहित बल हूँ। संसार में सब बलवान् ही तो बनते हैं। कोई दण्ड-बैठक लगाता है, तो कोई परमाणु इकट्ठा करता है; किन्तु नहीं, श्रीकृष्ण कहते हैं- काम और राग से परे जो बल है वह मैं हूँ। वही वास्तविक बल है। सब भूतों में धर्म के अनुकूल कामना मैं हूँ। परब्रह्म परमात्मा ही एकमात्र धर्म है, जो सबको धारण किये हुए है। जो शाश्वत आत्मा है वही धर्म है। जो उससे अविरोध रखनेवाली कामना है, मैं हूँ। आगे भी श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन ! मेरी प्राप्ति के लिये इच्छा कर। सब कामनाएँ तो वर्जित हैं; किन्तु उस परमात्मा को पाने की कामना आवश्यक है अन्यथा आप साधन कर्म में प्रवृत्त नहीं होंगे। ऐसी कामना भी मेरी ही देन है। #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
❤️जीवन की सीख - स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  Il35 Il बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कमोडस्मि भरतर्षभ।।  अर्जुन ! मैं बलवानों की कामना और हे भरतश्रेष्ठ মমাং ম মন নলনান কী নী ননন ;1 आसक्तिरहित बल हूँ कोई दण्ड-बैठक लगाता है, तो कोई परमाणु इकट्ठा करता हैः किन्तु नहीं , श्रीकृष्ण कहते हैं- काम और राग से परे जो बल है वह मैं हूँ। वही वास्तविक बल है। सब भूतों में धर्म के अनुकूल कामना मैं हूँ। परब्रह्म परमात्मा ही एकमात्र धर्म है जो सबको धारण किये हुए है।जो शाश्वत आत्मा है वही धर्म है।जो उससे अविरोध रखनेवाली कामना है, मैं हूँ । आगे भी அிதன ने कहा- अर्जुन ! मेरी प्राप्ति के लिये इच्छा कर। सब ( कामनाएँतो वर्जित हैं उस परमात्मा को पाने की कामना आवश्यक हे अन्यथा आप साधन कर्म में प्रवृत्त नहीं होंगे। ऐसी कामना भी मेरी ही देन है।  स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  Il35 Il बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कमोडस्मि भरतर्षभ।।  अर्जुन ! मैं बलवानों की कामना और हे भरतश्रेष्ठ মমাং ম মন নলনান কী নী ননন ;1 आसक्तिरहित बल हूँ कोई दण्ड-बैठक लगाता है, तो कोई परमाणु इकट्ठा करता हैः किन्तु नहीं , श्रीकृष्ण कहते हैं- काम और राग से परे जो बल है वह मैं हूँ। वही वास्तविक बल है। सब भूतों में धर्म के अनुकूल कामना मैं हूँ। परब्रह्म परमात्मा ही एकमात्र धर्म है जो सबको धारण किये हुए है।जो शाश्वत आत्मा है वही धर्म है।जो उससे अविरोध रखनेवाली कामना है, मैं हूँ । आगे भी அிதன ने कहा- अर्जुन ! मेरी प्राप्ति के लिये इच्छा कर। सब ( कामनाएँतो वर्जित हैं उस परमात्मा को पाने की कामना आवश्यक हे अन्यथा आप साधन कर्म में प्रवृत्त नहीं होंगे। ऐसी कामना भी मेरी ही देन है। - ShareChat
।। ॐ ।। बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥ पार्थ! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन कारण अर्थात् बीज मुझे ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ। इसी क्रम में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-"यथार्थ गीता" #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
❤️जीवन की सीख - || 3 | | बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ HAIAAHI बुद्धि्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।। पार्थ! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन कारण अर्थात् बीज मुझे ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का श्रीकृष्ण  तेज हूँ । इसी क्रम में योगेश्वर  कहते हैं-" यथार्थ गीता"' शरीसदगुरु 8 || 3 | | बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ HAIAAHI बुद्धि्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।। पार्थ! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन कारण अर्थात् बीज मुझे ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का श्रीकृष्ण  तेज हूँ । इसी क्रम में योगेश्वर  कहते हैं-" यथार्थ गीता"' शरीसदगुरु 8 - ShareChat
।। ॐ ।। पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥ पृथ्वी में पवित्र गन्ध और अग्नि में तेज हूँ। सम्पूर्ण जीवों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में उनका तप हूँ। #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - 1/ 35 11 पृथिव्यां च तेजश्चास्मि गन्धः पुण्यो विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।। में पवित्र गन्ध और अग्नि में पृथ्वी तेज हूँ। सम्पूर्ण जीवों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में उनका নপ চুঁl हरि थँ 1/ 35 11 पृथिव्यां च तेजश्चास्मि गन्धः पुण्यो विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।। में पवित्र गन्ध और अग्नि में पृथ्वी तेज हूँ। सम्पूर्ण जीवों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में उनका নপ চুঁl हरि थँ - ShareChat
।। ॐ ।। मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।। धनंजय! मेरे सिवाय किंचिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मेरे में गुँथा हुआ है। है तो; परन्तु जानेंगे कब? जब (इसी अध्याय के प्रथम श्लोक के अनुसार) अनन्य आसक्ति (भक्ति) से मेरे परायण होकर योग में उसी रूप से लग जायें। इसके बिना नहीं। योग में लगना आवश्यक है। #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - Ishreemadohaaundoea OalhanthOelall W Il 3 |l मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।। धनंजय ! मेरे सिवाय किंचिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मेरे में गुँथा हुआ है। है तो; परन्तु जानेंगे कब? जब (इसी अध्याय के प्रथम श्लोक के अनुसार ) अनन्य आसक्ति (भक्ति) से मेरे परायण होकर योग में उसी रूप से लग जायें । इसके बिना नहीं | योग में लगना आवश्यक है। Ishreemadohaaundoea OalhanthOelall W Il 3 |l मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।। धनंजय ! मेरे सिवाय किंचिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मेरे में गुँथा हुआ है। है तो; परन्तु जानेंगे कब? जब (इसी अध्याय के प्रथम श्लोक के अनुसार ) अनन्य आसक्ति (भक्ति) से मेरे परायण होकर योग में उसी रूप से लग जायें । इसके बिना नहीं | योग में लगना आवश्यक है। - ShareChat
।। ॐ ।। एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥ अर्जुन ! ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत 'एतद्योनीनि' -इन महाप्रकृतियों से, परा और अपरा प्रकृतियों से ही उत्पन्न होनेवाले हैं। यही दोनों एकमात्र योनि हैं। मैं सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति तथा प्रलय रूप हूँ अर्थात् मूल कारण हूँ। जगत् की उत्पत्ति मुझसे है और (प्रलय) विलय भी मुझमें है। जब तक प्रकृति विद्यमान है, तब तक मैं ही उसकी उत्पत्ति हूँ और जब कोई महापुरुष प्रकृति का पार पा लेता है, तब मैं ही महाप्रलय भी हूँ, जो अनुभव में आता है। #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - 3 भगवान और सदूगुरू || 3 | | सर्वाणीत्युपधारय।  एतद्योनीनि  মুনানি योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।। अर्जुन ! ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत ' एतद्योनीनि' -इन महाप्रकृतियों से, परा और अपरा प्रकृतियों से ही होनेवाले हैं। यही दोनों एकमात्र योनि हैं। मैं उत्पन्न जगत् की उत्पत्ति तथा प्रलय रूप हूँ अर्थात् सम्पूर्ण  है और मूल कारण हूँ ।जगत् की उत्पत्ति मुझसे (प्रलय ) विलय भी मुझमें है। जब तक प्रकृति विद्यमान है, तब तक मैं ही उसकी उत्पत्ति हूँ और जब कोई महापुरुष प्रकृति का पार पा लेता है, तब मैं ही भी हूँ, जो अनुभव में आता है। महाप्रलय पूज्य स्वामी  श्री परमानन्द जी महाराज जी ) ( परमहंस ९ यथार्थ गीता " के प्रणेता स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज 3 भगवान और सदूगुरू || 3 | | सर्वाणीत्युपधारय।  एतद्योनीनि  মুনানি योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।। अर्जुन ! ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत ' एतद्योनीनि' -इन महाप्रकृतियों से, परा और अपरा प्रकृतियों से ही होनेवाले हैं। यही दोनों एकमात्र योनि हैं। मैं उत्पन्न जगत् की उत्पत्ति तथा प्रलय रूप हूँ अर्थात् सम्पूर्ण  है और मूल कारण हूँ ।जगत् की उत्पत्ति मुझसे (प्रलय ) विलय भी मुझमें है। जब तक प्रकृति विद्यमान है, तब तक मैं ही उसकी उत्पत्ति हूँ और जब कोई महापुरुष प्रकृति का पार पा लेता है, तब मैं ही भी हूँ, जो अनुभव में आता है। महाप्रलय पूज्य स्वामी  श्री परमानन्द जी महाराज जी ) ( परमहंस ९ यथार्थ गीता " के प्रणेता स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज - ShareChat
।। ॐ ।। अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥ 'इयम्' अर्थात् यह आठ प्रकारोंवाली तो मेरी अपरा प्रकृति है अर्थात् जड़ प्रकृति है। महाबाहु अर्जुन ! इससे दूसरी को जीवरूप 'परा' अर्थात् चेतन प्रकृति जान, जिसने सम्पूर्ण जगत् धारण किया हुआ है। वह है जीवात्मा। जीवात्मा भी प्रकृति के सम्बन्ध में रहने के कारण प्रकृति ही है #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - 13 | रनितरचन्या प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।  মুনা সননানী এমব থামন অনূIl ^37सतयह आढ प्रकारोंवाली तो मेरी नपराप्रकति हि अर्थात जड़ प्रकृति है। মচানাভ সতূুম ! ভ্রসস को जीवरूप दूसरी रा अर्थात चतनप्रकतिजान जिसने जगत धारण किया हुआ है। वह n  जीवात्मा भी प्रकृतिके सम्बन्ध केकारण प्रकृति हीह 13 | रनितरचन्या प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।  মুনা সননানী এমব থামন অনূIl ^37सतयह आढ प्रकारोंवाली तो मेरी नपराप्रकति हि अर्थात जड़ प्रकृति है। মচানাভ সতূুম ! ভ্রসস को जीवरूप दूसरी रा अर्थात चतनप्रकतिजान जिसने जगत धारण किया हुआ है। वह n  जीवात्मा भी प्रकृतिके सम्बन्ध केकारण प्रकृति हीह - ShareChat
।। ॐ ।। भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ अर्जुन! भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार- ऐसे यह आठ प्रकार के भेदोंवाली मेरी प्रकृति है। यह अष्टधा मूल प्रकृति है। #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख
🙏गीता ज्ञान🛕 - Il 3 Il भूमिरापोडनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।  अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना সক্ৃনিহেখা Il अर्जुन! भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार- ऐसे यह आठ प्रकार के भेदोंवाली मेरी प्रकृति है। यह अष्टधा मूल प्रकृति है। Cso Il 3 Il भूमिरापोडनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।  अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना সক্ৃনিহেখা Il अर्जुन! भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार- ऐसे यह आठ प्रकार के भेदोंवाली मेरी प्रकृति है। यह अष्टधा मूल प्रकृति है। Cso - ShareChat
।। ॐ ।। मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥ हजारों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य मेरी प्राप्ति के लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले योगियों में भी कोई विरला ही पुरुष मुझे तत्त्व (साक्षात्कार) के साथ जानता है। अब समग्र तत्त्व है कहाँ? एक स्थान पर पिण्डरूप में है अथवा सर्वत्र व्याप्त है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-"यथार्थ गीता" #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख
🙏गीता ज्ञान🛕 - II32 I ( मनुप्याणा सहस्त्रेपु कश्चिद्यनति मिद्धये। पननामपि सिद्धाना कश्चिन्गा तेनिनत्वत हजारों मनुप्पोगे कोई ही गनुप्य गेरीप्राप्ति ক নিব সল কনো = সাবনপল करनेवले पोगिपों ्गेभी कोई चिरला हीपुरुप  সুমন নল্র (মামাক্কাৎ) ক্র নাথ তাননা ;1 अब समग्र नत्त्व हे कहा२ एक स्थान पर पिणडरूप गेह अथवा सर्वत्र व्याप्त हे२ इसपर योगेश्वर श्रीकप्ण ক্রচন চ: সথাথমানা  II32 I ( मनुप्याणा सहस्त्रेपु कश्चिद्यनति मिद्धये। पननामपि सिद्धाना कश्चिन्गा तेनिनत्वत हजारों मनुप्पोगे कोई ही गनुप्य गेरीप्राप्ति ক নিব সল কনো = সাবনপল करनेवले पोगिपों ्गेभी कोई चिरला हीपुरुप  সুমন নল্র (মামাক্কাৎ) ক্র নাথ তাননা ;1 अब समग्र नत्त्व हे कहा२ एक स्थान पर पिणडरूप गेह अथवा सर्वत्र व्याप्त हे२ इसपर योगेश्वर श्रीकप्ण ক্রচন চ: সথাথমানা - ShareChat