Jagdish Sharma
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Jagdish Sharma
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यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।। ॐ ।। वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः। मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥ वृष्णिवंश में मैं वासुदेव अर्थात् सर्वत्र वास करनेवाला देव हूँ। पाण्डवों में मैं धनंजय हूँ। पुण्य ही पाण्डु है और आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। पुण्य से प्रेरित होकर आत्मिक सम्पत्ति को अर्जित करनेवाला धनंजय मैं हूँ। मुनियों में मैं व्यास हूँ। परमतत्त्व को व्यक्त करने की जिसमें क्षमता है, वह मुनि मैं हूँ। कवियों में उशना अर्थात् उसमें प्रवेश दिलानेवाला काव्यकार मैं हूँ। #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
❤️जीवन की सीख - 3 Il I वृष्णीनां वासुदेवोडस्मि पाण्डवानां धनजयः | मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः II में मैं वासुदेव अर्थात् वृष्णीवंश सर्वत्र वास करनेवाला देव हूँ। পাঞ্ভনী ম স এনতয ৪ুঁ पुण्य ही पाण्डु है और आत्मिक संम्पत्ति ही स्थिर संम्पत्ति है। पुण्य से प्रेरित होकर आत्मिक संम्पत्ति को अर्जित करनेवाला धनंजय मैं हूँ। में मैं व्यास हूँ मुनियों परमतव को व्यक्त करने की जिसमें क्षमता है, वह मुनि मैं हूँ । कवियों में उशना अर्थात् उसमें प्रवेश दिलानेवाला काव्यकार मैं 8/ मैं ही वह हूँ जो सर्वत्र है, जो धर्म में , ज्ञान में और काव्य में सत्य को प्रकट करता है। ज्ञान, धर्म और काव्य तीनों में मैं ही प्राण हूँ। 3 Il I वृष्णीनां वासुदेवोडस्मि पाण्डवानां धनजयः | मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः II में मैं वासुदेव अर्थात् वृष्णीवंश सर्वत्र वास करनेवाला देव हूँ। পাঞ্ভনী ম স এনতয ৪ুঁ पुण्य ही पाण्डु है और आत्मिक संम्पत्ति ही स्थिर संम्पत्ति है। पुण्य से प्रेरित होकर आत्मिक संम्पत्ति को अर्जित करनेवाला धनंजय मैं हूँ। में मैं व्यास हूँ मुनियों परमतव को व्यक्त करने की जिसमें क्षमता है, वह मुनि मैं हूँ । कवियों में उशना अर्थात् उसमें प्रवेश दिलानेवाला काव्यकार मैं 8/ मैं ही वह हूँ जो सर्वत्र है, जो धर्म में , ज्ञान में और काव्य में सत्य को प्रकट करता है। ज्ञान, धर्म और काव्य तीनों में मैं ही प्राण हूँ। - ShareChat
।। ॐ ।। द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्। जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥ तेजस्वी पुरुषों का तेज मैं हूँ। जुए में छल करनेवालों का छल मैं हूँ। तब तो अच्छा है कि जुआ खेलें, उसमें कलबल-छल करें, वहीं भगवान हैं। नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। यह प्रकृति ही एक जुआ है। यही ठगिनी है। इस प्रकृति के द्वन्द्व से निकलने के लिये दिखावा छोड़कर छिपाव के साथ गुप्त रूप से भजन करना ही छल है। छल है तो नहीं, किन्तु बचाव के लिये आवश्यक है। जड़भरत की तरह उन्मत्त, अन्धे-बहरे और गूंगे की तरह हृदय से जानकार होते हुए भी बाहर से ऐसे रहें कि अनजान हों, सुनते हुए भी न सुनें, देखते हुए भी न देखें। छिपकर ही भजन का विधान है, तभी साधक प्रकृति-पुरुष के जुए में पार पाता है। जीतनेवालों की विजय मैं हूँ और व्यवसायियों का निश्चय (जिसे अध्याय दो, श्लोक इकतालीस में कह आये हैं- इस योग में निश्चयात्मक क्रिया एक है, बुद्धि एक ही है, दिशा एक ही है ऐसी), क्रियात्मिका बुद्धि मैं हूँ। सात्त्विक पुरुषों का तेज और ओज मैं हूँ। #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🙏गुरु महिमा😇 - || 30 || तेजस्तेजस्विनामहम् | छलयतामस्मि বুয়ুন जयोडस्मि घ्यवबायोडस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् Il जुए में छल तेजस्वियों का तेज प्रकृति का जुआ ही ठगिनी है तेज , ओज और इससे पार पाने का उपाय है प्रकाश का ख्रोत छल (छिपाव के साथ भजन) विजय व्यवसाय (निथय) सत्व ক্রুম্ৌ কা जीतने वालों की निरचित बुद्धि, एक दिशा, सात्विक विजय मैं हूँ तेज और ओज मैं हूँ वही मैं हूँ एकलक्ष्य जड़भरत की तरह उन्मत्त , अंधे-बहरे और गुंगे की बाहर से अनजान बनो, 6 भीतर ही भीतर भगवान का भजन करो यही संसार सागर से पार होने का गुप्त मार्ग है। || 30 || तेजस्तेजस्विनामहम् | छलयतामस्मि বুয়ুন जयोडस्मि घ्यवबायोडस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् Il जुए में छल तेजस्वियों का तेज प्रकृति का जुआ ही ठगिनी है तेज , ओज और इससे पार पाने का उपाय है प्रकाश का ख्रोत छल (छिपाव के साथ भजन) विजय व्यवसाय (निथय) सत्व ক্রুম্ৌ কা जीतने वालों की निरचित बुद्धि, एक दिशा, सात्विक विजय मैं हूँ तेज और ओज मैं हूँ वही मैं हूँ एकलक्ष्य जड़भरत की तरह उन्मत्त , अंधे-बहरे और गुंगे की बाहर से अनजान बनो, 6 भीतर ही भीतर भगवान का भजन करो यही संसार सागर से पार होने का गुप्त मार्ग है। - ShareChat
।। ॐ ।। बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥ #🙏गुरु महिमा😇 #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम अर्थात् बृहत् से संयुक्त समत्व दिलानेवाला गायन हूँ अर्थात् ऐसी जागृति मैं हूँ। छन्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ। गायत्री कोई ऐसा मन्त्र नहीं है जिसे पढ़ने से मुक्ति मिलती हो वरन् एक समर्पणात्मक छन्द है। तीन बार विचलित होने के पश्चात् ऋषि विश्वामित्र ने अपने को इष्ट के प्रति समर्पित करते हुए कहा- 'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।' अर्थात् भूः, भुवः और स्वः तीनों लोकों में तत्त्वरूप से व्याप्त देव! आप ही वरेण्य हैं। हमें ऐसी बुद्धि दें, ऐसी प्रेरणा करें कि हम लक्ष्य को प्राप्त कर लें। यह मात्र एक प्रार्थना है। साधक अपनी बुद्धि से यथार्थ निर्णय नहीं ले पाता कि वह कब सही है और कब गलत ? उसकी यह समर्पित प्रार्थना मैं हूँ, जिससे निश्चित कल्याण है; क्योंकि वह मेरे आश्रित हुआ है। मासों में शीर्षस्थ मार्ग मैं हूँ और जिसमें सदैव बहार हो ऐसी ऋतु, हृदय की ऐसी अवस्था भी मैं ही हूँ।
🙏गुरु महिमा😇 - Il 3 Il बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। मार्गशीर्षोड्हमृतूनां  मासानां gUTTo: Il गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम अर्थात् बृहत् से संयुक्त समत्व दिलानेवाला गायन हूँ अर्थात् ऐसी जागृति मैं हूँ। छन्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ | गायत्री कोई ऐसा मन्त्र नहीं है जिसे पढ़ने से मुक्ति मिलती हो वरन् एक समर्पणात्मक छन्द है। गायत्री समर्पण का छन्द है भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि 3ೂ fqatu T: qalడuTగ I' भुवः और स्वः तीनों लोकों में तत्वरूप से व्याप्त देव ! अर्थात् भूः आप ही वरेण्य हैं। हमें ऐसी बुद्धि दें, ऐसी प्रेरणा करें कि हम लक्ष्य को प्राप्त कर लें। డ్ साधक अपनी बुद्धि से यथार्थ निर्णा नहीं ले पाता कि चह कब सही है और कब गलत ? उसकी यह समर्पित प्रार्थना मैं हू , जिससे निश्चित कल्याण हैः क्योंकि वह मेरे आश्रित हुआ है। मासों में शीर्षस्थ मार्ग मैं हूँ और जिसमें सदैव बहार हो ऐसी ऋतु, भी मैं ही हूँ । हदय की ऐसी अवस्था यथार्थ ரிள || Il 3 Il बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। मार्गशीर्षोड्हमृतूनां  मासानां gUTTo: Il गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम अर्थात् बृहत् से संयुक्त समत्व दिलानेवाला गायन हूँ अर्थात् ऐसी जागृति मैं हूँ। छन्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ | गायत्री कोई ऐसा मन्त्र नहीं है जिसे पढ़ने से मुक्ति मिलती हो वरन् एक समर्पणात्मक छन्द है। गायत्री समर्पण का छन्द है भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि 3ೂ fqatu T: qalడuTగ I' भुवः और स्वः तीनों लोकों में तत्वरूप से व्याप्त देव ! अर्थात् भूः आप ही वरेण्य हैं। हमें ऐसी बुद्धि दें, ऐसी प्रेरणा करें कि हम लक्ष्य को प्राप्त कर लें। డ్ साधक अपनी बुद्धि से यथार्थ निर्णा नहीं ले पाता कि चह कब सही है और कब गलत ? उसकी यह समर्पित प्रार्थना मैं हू , जिससे निश्चित कल्याण हैः क्योंकि वह मेरे आश्रित हुआ है। मासों में शीर्षस्थ मार्ग मैं हूँ और जिसमें सदैव बहार हो ऐसी ऋतु, भी मैं ही हूँ । हदय की ऐसी अवस्था यथार्थ ரிள || - ShareChat
।। ॐ ।। मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्। कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता मैं सबका नाश करनेवाला मृत्यु और आगे होनेवालों की उत्पत्ति का कारण हूँ। स्त्रियों में मैं यश, शक्ति, वाक्पटुता, स्मृति, मेधा अर्थात् बुद्धि, धैर्य और क्षमा हूँ। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, 'द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।' (अध्याय १५/१६) - पुरुष दो ही प्रकार के होते हैं, क्षर और अक्षर। सम्पूर्ण भूतादिकों की उत्पत्ति और विनाशवाले ये शरीर क्षर पुरुष हैं। ये नर, मादा, पुरुष अथवा स्त्री कुछ भी कहलाएँ, श्रीकृष्ण के शब्दों में पुरुष ही हैं। दूसरा है अक्षर पुरुष, जो कूटस्थ चित्त के स्थिर काल में देखने में आता है। यही कारण है कि इस योगपथ में स्त्री-पुरुष सभी समान स्थिति के महापुरुष होते आये हैं। किन्तु यहाँ स्मृति, शक्ति, बुद्धि इत्यादि स्त्रियों के ही गुण बताये गये। क्या इन सद्गुणों की आवश्यकता पुरुषों के लिये नहीं है? कौन ऐसा पुरुष है जो श्रीमान्, कीर्तिमान्, वक्ता, स्मरणशक्तिसम्पन्न, मेधावी, धैर्यवान् और क्षमावान् नहीं बनना चाहता? बौद्धिक स्तर पर कमजोर लड़कों में इन्हीं गुणों का विकास करने के लिये मात
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - Il3 Il मृत्युः सर्वहरश्वाहमुद्रभवश्व भविष्यपात्।  स्मृतिर्मेधा " कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां  धृतिः क्षमा।। मैं सबका नाश करनेवाला मृत्यु और आगे होनेवाले की उत्पत्ति का कारण हूँ। स्त्रियों में मैं अर्थात् यश, शक्ि, वाक्पट्रता , स्मृति, मेधा  बुद्धि, धैर्य और क्षमा हूँ। ।यथाथ शीm  स्त्री - पुरूष सभी समान स्थिति के महापुरूष मानव की चित्तवृत्ति ही 'नारी' है। शरीर तो वस्त्र मात्र है। स्त्री, पुरूष, नपुंसक इत्यादि शरीर की आकृतियाँ हैं, स्वरूप की नहीं| शरीर के अन्तराल में चित्तवृत्ति की ओर प्रकृति स्वयमेव प्रवाहमान है। ये सदगुण केवल स्त्रियों के नहीं, पुरूषों के लिए भी आवश्यक हैं। जो इन गुणों को धारण करता है वही वास्तव में महापुरूष है। कीर्ति मेधा g स्मा क्षमा वाक सर्वस्य मत्तः चाहं हदि सन्निविष्टो स्मृतिज्ञांनमपोहनं च। मैं सबके हृदय में समाविष्ट होकर सदा निवास करता हूँ । बुद्धि, स्मृति, ज्ञान (वास्तविक जानकारी) क्षमतां मेरी देन है। और विकारों से अलग रहने श्रीकृष्ण " हैं, धनुर्धर पार्थ है वहीं श्रीः है, विजय है, जहाँ योगेश्वर विभूति और अचल नीति है ऐसा मेरा मत है। ~ೆ  गुणों को धारण करना स्त्रीलिंग- पुलिंग सबके लिये उपयोगी है। जो मुझसे होते हैं। इन Il3 Il मृत्युः सर्वहरश्वाहमुद्रभवश्व भविष्यपात्।  स्मृतिर्मेधा " कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां  धृतिः क्षमा।। मैं सबका नाश करनेवाला मृत्यु और आगे होनेवाले की उत्पत्ति का कारण हूँ। स्त्रियों में मैं अर्थात् यश, शक्ि, वाक्पट्रता , स्मृति, मेधा  बुद्धि, धैर्य और क्षमा हूँ। ।यथाथ शीm  स्त्री - पुरूष सभी समान स्थिति के महापुरूष मानव की चित्तवृत्ति ही 'नारी' है। शरीर तो वस्त्र मात्र है। स्त्री, पुरूष, नपुंसक इत्यादि शरीर की आकृतियाँ हैं, स्वरूप की नहीं| शरीर के अन्तराल में चित्तवृत्ति की ओर प्रकृति स्वयमेव प्रवाहमान है। ये सदगुण केवल स्त्रियों के नहीं, पुरूषों के लिए भी आवश्यक हैं। जो इन गुणों को धारण करता है वही वास्तव में महापुरूष है। कीर्ति मेधा g स्मा क्षमा वाक सर्वस्य मत्तः चाहं हदि सन्निविष्टो स्मृतिज्ञांनमपोहनं च। मैं सबके हृदय में समाविष्ट होकर सदा निवास करता हूँ । बुद्धि, स्मृति, ज्ञान (वास्तविक जानकारी) क्षमतां मेरी देन है। और विकारों से अलग रहने श्रीकृष्ण " हैं, धनुर्धर पार्थ है वहीं श्रीः है, विजय है, जहाँ योगेश्वर विभूति और अचल नीति है ऐसा मेरा मत है। ~ೆ  गुणों को धारण करना स्त्रीलिंग- पुलिंग सबके लिये उपयोगी है। जो मुझसे होते हैं। इन - ShareChat
।। ॐ ।। अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥ मैं अक्षरों में अकार-ओंकार तथा समासों में द्वन्द्व नामक समास हूँ। (साधना की उन्नत अवस्था में मन सिमटते-सिमटते केवल साधक और इष्ट आमने-सामने रह जाते हैं, शेष कोई संकल्प नहीं रह जाता, स्वामी सेवक में संघर्ष है; किन्तु द्वन्द्व की यह अवस्था भगवान की देन है।) अक्षयकाल मैं हूँ। काल सदैव परिवर्तनशील है; किन्तु वह समय जो अक्षय, अजर, अमर परमात्मा में प्रवेश दिलाता है, वह अवस्था मैं हूँ। विराट् स्वरूप अर्थात् सर्वत्र व्याप्त, सबको धारण-पोषण करनेवाला भी मैं ही हूँ। #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏
यथार्थ गीता - 3 Il || अक्षराणामकारोSस्मि द्वन्द्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः।। मैं अक्षरों में अकार-ओंकार तथा समासों में द्वन्द्व नामक समास हूँ। ( साधना की उन्नत अवस्था में मन सिमटते - सिमटते केवल साधक और इष्ट आमने-सामने रह जाते हैं, शेष कोई संकल्प नहीं रह जाता, स्वामी सेवक में संघर्ष है; द्वन्द्व की यह अवस्था भगवान की देन है।) किन्तु अक्षयकाल मैं हूँ। কিন্ু  काल सदैव परिवर्तनशील है; वह समय जो अक्षय, अजर , अमर परमात्मा में प्रवेश दिलाता है, वह अवस्था मैं हूँ। fr स्वरूप अर्थात् सर्वत्र व्याप्त, सबको धारण - पोषण करनेवाला भी मैं ही हूँ । 3 Il || अक्षराणामकारोSस्मि द्वन्द्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः।। मैं अक्षरों में अकार-ओंकार तथा समासों में द्वन्द्व नामक समास हूँ। ( साधना की उन्नत अवस्था में मन सिमटते - सिमटते केवल साधक और इष्ट आमने-सामने रह जाते हैं, शेष कोई संकल्प नहीं रह जाता, स्वामी सेवक में संघर्ष है; द्वन्द्व की यह अवस्था भगवान की देन है।) किन्तु अक्षयकाल मैं हूँ। কিন্ু  काल सदैव परिवर्तनशील है; वह समय जो अक्षय, अजर , अमर परमात्मा में प्रवेश दिलाता है, वह अवस्था मैं हूँ। fr स्वरूप अर्थात् सर्वत्र व्याप्त, सबको धारण - पोषण करनेवाला भी मैं ही हूँ । - ShareChat
।। ॐ ।। सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन। अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥ हे अर्जुन ! सृष्टियों का आदि, अन्त और मध्य मैं ही हूँ। विद्याओं में अध्यात्मविद्या मैं हूँ। जो आत्मा का आधिपत्य दिला दे, वह विद्या मैं हूँ। संसार में अधिकांश प्राणी माया के आधिपत्य में हैं। राग, द्वेष, काल, कर्म, स्वभाव और गुणों से प्रेरित हैं। इनके आधिपत्य से निकालकर आत्मा के आधिपत्य में ले जानेवाली विद्या मैं हूँ, जिसे अध्यात्मविद्या कहते हैं। परस्पर होनेवाले विवादों में, ब्रह्मचर्चा में जो निर्णायक है, ऐसी वार्त्ता मैं हूँ। शेष निर्णय तो अनिर्णीत होते हैं। #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🧘सदगुरु जी🙏 - सर्गाणामादिरन्तश्व चैवाहमर्जुन मध्यं अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहन्म् I। हे अर्जुन ! मैं ही हूँ। सूष्टियों का आदि, अन्त और मध्य विद्याओं में अध्यात्मविद्या मैं हूँ। जो आत्मा का आधिपत्य दिला दे, वह विद्या मैं हूँ । संसार में अधिकांश प्राणी माया के आधिपत्य में हैं। द्रेष , काल, कर्म, स्वभाव और गुणों से प्रेरित हैं। राग इनके आधिपत्य से निकालकर आत्मा के आधिपत्य में ले जानेबाली বিম্া ম চুঁ, जिसे अध्यात्मविद्या कहते हैं। होनेवाले विवादों में, परस्पर ब्रह्मचर्चा में जो निर्णायक है, ऐसी बार्ता मैं हूँ । शेष निर्णय तो अनिणीत होते हैं । " सर्गाणामादिरन्तश्व चैवाहमर्जुन मध्यं अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहन्म् I। हे अर्जुन ! मैं ही हूँ। सूष्टियों का आदि, अन्त और मध्य विद्याओं में अध्यात्मविद्या मैं हूँ। जो आत्मा का आधिपत्य दिला दे, वह विद्या मैं हूँ । संसार में अधिकांश प्राणी माया के आधिपत्य में हैं। द्रेष , काल, कर्म, स्वभाव और गुणों से प्रेरित हैं। राग इनके आधिपत्य से निकालकर आत्मा के आधिपत्य में ले जानेबाली বিম্া ম চুঁ, जिसे अध्यात्मविद्या कहते हैं। होनेवाले विवादों में, परस्पर ब्रह्मचर्चा में जो निर्णायक है, ऐसी बार्ता मैं हूँ । शेष निर्णय तो अनिणीत होते हैं । " - ShareChat
।। ॐ ।। पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्। झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥ पवित्र करनेवालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम हूँ। 'रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।' योगी किसमें रमण करते हैं? अनुभव में। ईश्वर इष्टरूप में जो निर्देशन देता है, योगी उसमें रमण करते हैं। उस जागृति का नाम राम है और वह जागृति मैं हूँ। मछलियों में मगर तथा नदियों में गंगा मैं हूँ। #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता #🙏गुरु महिमा😇
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - 39 पवतामसि पवनः रामः शस्त्रभृतामहम्। झषाणां मकरश्वास्मि स्रोतसामस्मि जाहवी।। पवित्र करनेवालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम हूँ। 'মমল যীমিন: যম্সিনূ ম যাম: |' योगी किसमें रमण करते हैं? अनुभव में। ईश्वर इष्टरूप में जो निर्देशव देता है, योगी उसमें रमण करते हैं ক্া নাম যাম ই जागृति उस और वह #ಣ್ಣೆ| আামূনি मैं हूँ। मछलियों में मगर तथा नदियों में गंगा श्री राम ।श्री परमारहृंस स्वामी अड़गड़ानन्द जी सहराज |] 39 पवतामसि पवनः रामः शस्त्रभृतामहम्। झषाणां मकरश्वास्मि स्रोतसामस्मि जाहवी।। पवित्र करनेवालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम हूँ। 'মমল যীমিন: যম্সিনূ ম যাম: |' योगी किसमें रमण करते हैं? अनुभव में। ईश्वर इष्टरूप में जो निर्देशव देता है, योगी उसमें रमण करते हैं ক্া নাম যাম ই जागृति उस और वह #ಣ್ಣೆ| আামূনি मैं हूँ। मछलियों में मगर तथा नदियों में गंगा श्री राम ।श्री परमारहृंस स्वामी अड़गड़ानन्द जी सहराज |] - ShareChat
।। ॐ ।। प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥ मैं दैत्यों में प्रह्लाद हूँ। (पर + आह्लाद-पर के लिये आह्लाद) प्रेम ही प्रह्लाद है। आसुरी सम्पद् में रहते हुए ईश्वर के लिए आकर्षण-विकलता आरम्भ होती है, जिससे परमप्रभु का दिग्दर्शन होता है, ऐसा प्रेमोल्लास मैं हूँ। गिनती करनेवालों में मैं समय हूँ। एक, दो, तीन, चार ऐसी गिनती या क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास इत्यादि नहीं, बल्कि ईश्वर के चिन्तन में लगा हुआ समय मैं हूँ। यहाँ तक कि 'जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।' अनवरत चिन्तन में समय मैं हूँ। पशुओं में मृगराज (योगी भी मृ (जंगल) + ग (गमन करना) अर्थात् योगरूपी जंगल में गमन करनेवाला है) तथा पक्षियों में गरुड़ मैं हूँ। ज्ञान ही गरुड़ है। जब ईश्वरीय अनुभूति आने लगती है, तब यही मन अपने आराध्य की सवारी बन जाता है और जब यही मन संशय से युक्त है तब सर्प होता है, डसता रहता है, योनियों में फेंकता है। गरुड़ विष्णु की सवारी है। जो सत्ता विश्व में अणुरूप से संचारित है, ज्ञानसंयुक्त मन उसे अपने में धारण करता है, उसका वाहक बनता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, इष्ट को धारण करनेवाला मन मैं हूँ। #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
🙏गुरु महिमा😇 - I 3ೌ I प्रह्मातूश्वास्मि दैंत्यानां कालः कलयतामहम्। मृगेन्द्रोड़हं वैनतेयश्व पक्षिणाम्।। d मृगाणां ' मैं दैत्यों में प्रहाद हूँ। (पर + आह्वादनपर के लिये आह्ाद) प्रेम ही प्रहाद है। आसुरी संम्पद्न में रहते हुए ईश्वर के लिए आकर्पण विकलता आरंम्भ होती है, जिससे परमप्रभु का दिम्नदर्शन होता है, ऐसा प्रेमोल्लास मैं हूँ। गिनती करनेव यलों में मैं समय हूँ। एक॰ दो, तीन, चार ऐसी गिनती या क्षण, घड़ी , दिन, पक्ष इत्यादि नहीं , बल्कि ईश्वर के चिन्तन में लगा हुआ ٦٢ समय मैं हूँ। यहाँ तक कि ॰ में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय। ' जाणत अनवरत चिन्तन में समय मैं हूँ। पशुओं में मृगराज तथा गरुड़ मैं हूँ । पक्षियों में योगी भी मृ (जंगल) + ग (गमन करना) अर्थात् योगरुपी जंगल में गमन करनेवाला है। ज्ञान ही गरुड़ है। जब ईश्वरीय आने लगती है अनुभूति तब यही मन अपने आराध्य की सवारी बन जाता है से युच्त ' और जब यही मन संशय हैतब सर्प होता है डसता रहता है॰ योनियों में फेंँकता है। विष्णु ' विश्व ' की सवारी है। जो सत्ता में अणुरुप से 55 संचारित है, ज्ञानयुक्त मन उसे अपने में धारण करता है, उसका वाहक बनता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, इष्ट को धारण करनेवाला मन मैं हूँ । I 3ೌ I प्रह्मातूश्वास्मि दैंत्यानां कालः कलयतामहम्। मृगेन्द्रोड़हं वैनतेयश्व पक्षिणाम्।। d मृगाणां ' मैं दैत्यों में प्रहाद हूँ। (पर + आह्वादनपर के लिये आह्ाद) प्रेम ही प्रहाद है। आसुरी संम्पद्न में रहते हुए ईश्वर के लिए आकर्पण विकलता आरंम्भ होती है, जिससे परमप्रभु का दिम्नदर्शन होता है, ऐसा प्रेमोल्लास मैं हूँ। गिनती करनेव यलों में मैं समय हूँ। एक॰ दो, तीन, चार ऐसी गिनती या क्षण, घड़ी , दिन, पक्ष इत्यादि नहीं , बल्कि ईश्वर के चिन्तन में लगा हुआ ٦٢ समय मैं हूँ। यहाँ तक कि ॰ में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय। ' जाणत अनवरत चिन्तन में समय मैं हूँ। पशुओं में मृगराज तथा गरुड़ मैं हूँ । पक्षियों में योगी भी मृ (जंगल) + ग (गमन करना) अर्थात् योगरुपी जंगल में गमन करनेवाला है। ज्ञान ही गरुड़ है। जब ईश्वरीय आने लगती है अनुभूति तब यही मन अपने आराध्य की सवारी बन जाता है से युच्त ' और जब यही मन संशय हैतब सर्प होता है डसता रहता है॰ योनियों में फेंँकता है। विष्णु ' विश्व ' की सवारी है। जो सत्ता में अणुरुप से 55 संचारित है, ज्ञानयुक्त मन उसे अपने में धारण करता है, उसका वाहक बनता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, इष्ट को धारण करनेवाला मन मैं हूँ । - ShareChat
।। ॐ ।। अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥ #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 नागों में मैं अनन्त अर्थात् शेषनाग हूँ। वैसे यह कोई सर्प नहीं है। गीता की समकालीन पुस्तक श्रीमद्भागवत में इसके रूप की चर्चा है कि इस पृथ्वी से तीस हजार योजन की दूरी पर परमात्मा की वैष्णवी शक्ति है, जिसके सिर पर यह पृथ्वी सरसों के दाने की तरह भाररहित टिकी है। उस युग में योजन का पैमाना चाहे जो रहा हो, फिर भी यह पर्याप्त दूर है। वस्तुतः यह आकर्षण शक्ति का चित्रण है। वैज्ञानिकों ने जिसे ईथर माना है। ग्रह-उपग्रह सभी उसी शक्ति के आधार पर टिके हैं। उस शून्य में ग्रहों का कोई भार भी नहीं है। वह शक्ति सर्प की कुण्डली की तरह सभी ग्रहों को लपेटे है। यही है वह अनन्त, जिससे पृथ्वी धारण की जाती है। श्रीकृष्ण कहते हैं-ऐसी ईश्वरीय शक्ति मैं हूँ। जलचरों में उनका अधिपति 'वरुण' हूँ तथा पितरों में 'अर्यमा' हूँ। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पाँच यम हैं। इनके पालन में आनेवाले विकारों को काटना 'अर:' है। विकारों के शमन से पितृ अर्थात् भूत-संस्कार तृप्त होते हैं, निवृत्ति प्रदान कर देते हैं। शासन करनेवालों में मैं यमराज हूँ।
यथार्थ गीता - I 3 Il अनन्तश्वास्मि नागानां वरूणो यादसामहम्। पितृणामर्थ्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्।। नागों में मैं अनन्त अर्थात् शेषनाग हूँ वैसे यह कोई सर्प नहीं है। गीता की वस्तुतः यह आकर्षण समकालीन पुस्तक श्रीमद्रभागवत में शक्ति का चित्रण है। इसके रुप की चर्चा है कि इस पृथ्वी वैज्ञानिकों जिसे ईथर से तीस हजार योजन की दूरी पर माना है। ग्रह उपग्रह सभी परमात्मा की वैष्णवी शक्ति है॰ उसी शक्ति के आधार सरसों जिसके सिर पर यह पृथ्वी के दाने की तरह भाररहित टिकी है। पर टिके हैं। उस शून्य में ग्रहों का कोई भार भी नहीं है। वह शक्ति सर्प की की तरह सभी Ssளி ग्रहों को लपेटे है। यही है वह अनन्त, जिससे जलचरों में उनका धारण की जाती है। पृथ्वी अधिपति वरुण ह श्रीकृष्ण ` ಹ೯ಗ मैं हूँ। ऐसी ईश्वरीय शक्ति अहिंसा, सत्य, अस्तेय, पितरों में अर्ख़्यमा' हूँ और अपरिग्रह पाँच यम हैं। इनके पालन পমমর্য में आनेवाले विकारों को काटना  अरः हैं। विकारों के शमन से पितृ अर्थात् भूत- संस्कार तृप्त होते हैं निवृत्ति प्रदान कर देते हैं। शासन करने वालों में मैं यमराज हूँ अर्थात् उपर्युक्त पाँच यम यमों का नियामक हूँ। अपरिग्रह সমবর্য अहिंसा 3{4 सत्य श्रीकृष्ण कहते हैं  मैं ही हूँ, इन दिव्य शक्तियों का आधार जो समस्त जगत को धारण और संचालन करता है। I I 3 Il अनन्तश्वास्मि नागानां वरूणो यादसामहम्। पितृणामर्थ्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्।। नागों में मैं अनन्त अर्थात् शेषनाग हूँ वैसे यह कोई सर्प नहीं है। गीता की वस्तुतः यह आकर्षण समकालीन पुस्तक श्रीमद्रभागवत में शक्ति का चित्रण है। इसके रुप की चर्चा है कि इस पृथ्वी वैज्ञानिकों जिसे ईथर से तीस हजार योजन की दूरी पर माना है। ग्रह उपग्रह सभी परमात्मा की वैष्णवी शक्ति है॰ उसी शक्ति के आधार सरसों जिसके सिर पर यह पृथ्वी के दाने की तरह भाररहित टिकी है। पर टिके हैं। उस शून्य में ग्रहों का कोई भार भी नहीं है। वह शक्ति सर्प की की तरह सभी Ssளி ग्रहों को लपेटे है। यही है वह अनन्त, जिससे जलचरों में उनका धारण की जाती है। पृथ्वी अधिपति वरुण ह श्रीकृष्ण ` ಹ೯ಗ मैं हूँ। ऐसी ईश्वरीय शक्ति अहिंसा, सत्य, अस्तेय, पितरों में अर्ख़्यमा' हूँ और अपरिग्रह पाँच यम हैं। इनके पालन পমমর্য में आनेवाले विकारों को काटना  अरः हैं। विकारों के शमन से पितृ अर्थात् भूत- संस्कार तृप्त होते हैं निवृत्ति प्रदान कर देते हैं। शासन करने वालों में मैं यमराज हूँ अर्थात् उपर्युक्त पाँच यम यमों का नियामक हूँ। अपरिग्रह সমবর্য अहिंसा 3{4 सत्य श्रीकृष्ण कहते हैं  मैं ही हूँ, इन दिव्य शक्तियों का आधार जो समस्त जगत को धारण और संचालन करता है। I - ShareChat
।। ॐ ।। आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्। प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥ शस्त्रों में मैं वज्र हूँ। गायों में कामधेनु हूँ। कामधेनु कोई ऐसी गाय नहीं है, जो दूध के स्थान पर मनचाहा व्यंजन परसती हो। ऋषियों में वशिष्ठ के पास कामधेनु थी। वस्तुतः 'गो' इन्द्रियों को कहते हैं। इन्द्रियों का संयत होना इष्ट को वश में रखनेवाले में पाया जाता है। जिसकी इन्द्रियाँ ईश्वर के अनुरूप स्थिर हो जाती हैं, उसके लिये उसी की इन्द्रियाँ 'कामधेनु' बन जाती हैं। फिर तो 'जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।।' (रामचरितमानस, ७/११३/४) उसके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। प्रजनन करनेवालों में नवीन स्थितियों को प्रकट करनेवाला मैं हूँ। 'प्रजनन'- एक तो लड़का बाहर पैदा किया जाता है, चराचर में रात-दिन पैदा ही होते हैं, चूहे-चींटी रात-दिन करते हैं- ऐसा नहीं, बल्कि एक स्थिति से दूसरी स्थिति, इस प्रकार वृत्तियों का परिवर्तन होता है। वह परिवर्तित स्वरूप मैं हूँ। सर्पों में मैं वासुकि हूँ। #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता #🙏गुरु महिमा😇
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