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#बलिदान दिवस #शहीद दिवस #🇮🇳 देशभक्ति #🙏🏻माँ तुझे सलाम #आज जिनकी पुण्यतिथि है
बलिदान दिवस - कःस्भाव पूरे संसार को दारुल इस्लाम बनाने का देखन कट्टरपंथी प्रायः अन्य धर्मावलंबियों भावनाओं वाल संकीर्णता का परिचय देते रहते का अनादर कर अपनी हैं। १९२० में लाहौर में कुछ मुसलमानों ने दो पुस्तकें कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी' में সব্মাহিন কী  श्रीकृष्ण  चरित्रहीन बताते हुए उन पर भद्दी टिप्पणियां की गयीं थीं। इसी प्रकार बीसवीं सदी का महर्षिः में आर्य समाज के संस्थापक ऋषि दयानंद पर तीखे कटाक्ष किये गये थे। आर्य विद्वान पंडित चमूपति जी को लगा कि यदि इनका उत्तर नहीं दिया, जहां एक ओर कठमुल्लाओं का  ओर हिन्दुओं का मनोबल भी साहस बढ़ेगा, वहीं  दूसरी  गिरेगा| उन्होंने भी रंगीला रसूल नामक एक पुस्तक लिखी, जिसमें इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद के १२ निकाहो का सप्रमाण वर्णन था। इस पुस्तक को प्रकाशित करना आसान नहीं था; पर आर्य पुस्तकालय के महाशय राजपाल ने लेखक के बिना उसे प्रकाशित कर दिया। उन्होंने लेखक को नाम यह आश्वासन भो दिया था कि चाहे कितना भी संकट नहीं करेंगे। आयेः परवे उनका नाम प्रकट पुस्तक के प्रकाशित होते ही मुसलमानों में हलचल मच गयी। उन्होंने लेखक प्रकाशक को धमकियां देनी दीं। उर्दृ समाचार पत्रों में ऐसे धमकी भरे प्रारम्भ कर लेख छपने लगेः पर महाशय जी ने सारी जिम्मेदारी स्वयं लेते हुए लेखक का नाम प्रकट नहीं किया। एक दिन महाशय जी अपने प्रकाशन में बैठे थे कि खुदाबख्श नामक पठान वहां आया। उसने महाशय जी छुरे से प्रहार शुरू कर दिये। अचानक स्वामी पर आ पहुंचे। उन्होंने खुदाबख्श को स्वतंत्रानंद जी वहा हवाले कर दिया। महाशय जी को दबाच कर पुलिस जहां से ठीक होकर वे फिर अस्पताल पहुचाया गया लग गये। खुदाबख्श को सात साल की अपन काम हुई। ٦ दिन बाद एक अन्य उन्मादी मुसलमान ने प्रकाशन ತತಕಕ स्वामी सत्यानंद जी को महाशय जी समझ कर उनकी हत्या का प्रयास कियाः उसे भी लोगों ने पकड़कर पुलिस को सौंप दिया। लाहौर के मुसलमान किसी भी तरह महाशय राजपाल जी को मारना चाहत थ। उन पर इस पुस्तक के लिए लाहौर उच्च न्यायालय मुकदमा भी चलाया गयाः पर पुस्तक पूरी तरह मुस्लिम इतिहास ग्रंथों पर ही आधारित थी। अतः न्यायालय ने महाशय जी बाद पुनः उनकी हत्या का को बरी कर दिया। इसक जाने षड्यन्त्र बुना लगा। को महाशय जी अपने प्रकाशन में बैठे সসল; 1929 थे कि इलमदीन नामक एक उन्मादी हमला कच जी की हत्या कर डाली  भागते हुए हत्यारे को महाशय विद्यारत्न नामक युवक ने पीछा कर पकड़ लिया और जी की हत्या का को सौंप दिया पुलिस  महाशय  शवयात्रा में समाचार आग को तरह फैल गया। उनको हजारों हिन्दू शामिल हुए। उनके बच्चे बहुत छोटे थे। अतः डी॰ए॰वी॰ संस्थाओं के मुखाग्नि दी। स्वामी संचालक महात्मा हंसराज जी ने स्वतंत्रानंद जी ने अंतिम प्रार्थना कराई| महाशय जी की धर्मपत्नी सरस्वती जी ने कहा कि अपने पति के मारे जाने का मुझे बहुत दुख हैः पर यह गर्व भी है कि उन्होंने धर्म और सत्य के लिए बलिदान दिया।  विभाजन के बाद महाशय जी के परिजन दिल्ली आकर प्रकाशन के काम में ही लग गये। जून १९९८ में दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में गृहमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने पहले  फ्रीडम टु पब्लिश' पुरस्कार से स्वर्गीय राजपाल जी को सम्मानित किया। पुरस्कार उनके पुत्र विश्वनाथ जी ने ग्रहण किया।   कःस्भाव पूरे संसार को दारुल इस्लाम बनाने का देखन कट्टरपंथी प्रायः अन्य धर्मावलंबियों भावनाओं वाल संकीर्णता का परिचय देते रहते का अनादर कर अपनी हैं। १९२० में लाहौर में कुछ मुसलमानों ने दो पुस्तकें कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी' में সব্মাহিন কী  श्रीकृष्ण  चरित्रहीन बताते हुए उन पर भद्दी टिप्पणियां की गयीं थीं। इसी प्रकार बीसवीं सदी का महर्षिः में आर्य समाज के संस्थापक ऋषि दयानंद पर तीखे कटाक्ष किये गये थे। आर्य विद्वान पंडित चमूपति जी को लगा कि यदि इनका उत्तर नहीं दिया, जहां एक ओर कठमुल्लाओं का  ओर हिन्दुओं का मनोबल भी साहस बढ़ेगा, वहीं  दूसरी  गिरेगा| उन्होंने भी रंगीला रसूल नामक एक पुस्तक लिखी, जिसमें इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद के १२ निकाहो का सप्रमाण वर्णन था। इस पुस्तक को प्रकाशित करना आसान नहीं था; पर आर्य पुस्तकालय के महाशय राजपाल ने लेखक के बिना उसे प्रकाशित कर दिया। उन्होंने लेखक को नाम यह आश्वासन भो दिया था कि चाहे कितना भी संकट नहीं करेंगे। आयेः परवे उनका नाम प्रकट पुस्तक के प्रकाशित होते ही मुसलमानों में हलचल मच गयी। उन्होंने लेखक प्रकाशक को धमकियां देनी दीं। उर्दृ समाचार पत्रों में ऐसे धमकी भरे प्रारम्भ कर लेख छपने लगेः पर महाशय जी ने सारी जिम्मेदारी स्वयं लेते हुए लेखक का नाम प्रकट नहीं किया। एक दिन महाशय जी अपने प्रकाशन में बैठे थे कि खुदाबख्श नामक पठान वहां आया। उसने महाशय जी छुरे से प्रहार शुरू कर दिये। अचानक स्वामी पर आ पहुंचे। उन्होंने खुदाबख्श को स्वतंत्रानंद जी वहा हवाले कर दिया। महाशय जी को दबाच कर पुलिस जहां से ठीक होकर वे फिर अस्पताल पहुचाया गया लग गये। खुदाबख्श को सात साल की अपन काम हुई। ٦ दिन बाद एक अन्य उन्मादी मुसलमान ने प्रकाशन ತತಕಕ स्वामी सत्यानंद जी को महाशय जी समझ कर उनकी हत्या का प्रयास कियाः उसे भी लोगों ने पकड़कर पुलिस को सौंप दिया। लाहौर के मुसलमान किसी भी तरह महाशय राजपाल जी को मारना चाहत थ। उन पर इस पुस्तक के लिए लाहौर उच्च न्यायालय मुकदमा भी चलाया गयाः पर पुस्तक पूरी तरह मुस्लिम इतिहास ग्रंथों पर ही आधारित थी। अतः न्यायालय ने महाशय जी बाद पुनः उनकी हत्या का को बरी कर दिया। इसक जाने षड्यन्त्र बुना लगा। को महाशय जी अपने प्रकाशन में बैठे সসল; 1929 थे कि इलमदीन नामक एक उन्मादी हमला कच जी की हत्या कर डाली  भागते हुए हत्यारे को महाशय विद्यारत्न नामक युवक ने पीछा कर पकड़ लिया और जी की हत्या का को सौंप दिया पुलिस  महाशय  शवयात्रा में समाचार आग को तरह फैल गया। उनको हजारों हिन्दू शामिल हुए। उनके बच्चे बहुत छोटे थे। अतः डी॰ए॰वी॰ संस्थाओं के मुखाग्नि दी। स्वामी संचालक महात्मा हंसराज जी ने स्वतंत्रानंद जी ने अंतिम प्रार्थना कराई| महाशय जी की धर्मपत्नी सरस्वती जी ने कहा कि अपने पति के मारे जाने का मुझे बहुत दुख हैः पर यह गर्व भी है कि उन्होंने धर्म और सत्य के लिए बलिदान दिया।  विभाजन के बाद महाशय जी के परिजन दिल्ली आकर प्रकाशन के काम में ही लग गये। जून १९९८ में दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में गृहमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने पहले  फ्रीडम टु पब्लिश' पुरस्कार से स्वर्गीय राजपाल जी को सम्मानित किया। पुरस्कार उनके पुत्र विश्वनाथ जी ने ग्रहण किया। - ShareChat