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#सामान्य ज्ञान
सामान्य ज्ञान - पार्ट 2 इड ( मूल प्रवृत्ति ) यह मन का वह भाग है जिसमें मूल प्रवृत्ति की इच्छाएं ( जैसे कि उत्तरजीवित यौनता  भोजन आदि संबंधी इच्छाएं रहतीं हैँ) जो आक्रमकता जल्दी ही संतुष्टी चाहती है गम के सिद्धान्त तथा खुशी [ होती 8, چ इच्छाएं आधारित तार्किकता या पर आतार्किक तथा अमौखिक होती है और चेतना में प्रवेश नहीं करतीं | ईगो   (अहम्) भाग   है॰ সী মুল का  सचेतन 46 4< प्रवृत्ति की इच्छाएं को वास्तविकता के अनुसार नियंत्रण करता है। इस पर सुपर ईँगो ( परम अहम् या विवेक ) भाग सचेतन तथा प्रभाव पडता है। इसका 38া কা अचेतन रहता है॰ इसका प्रमुख कार्य मनुष्य को तनाव फ्रायड की मनोवैज्ञानिक पुत्री या चिंता से बचाना है। एना फ्रायड के अनुसार यह भाग डेढ़ वर्ष की आयु में उत्पन्न हा जाता है। जिसका प्रमाण यह है कि इस आयू के बाद बच्चा अपने अंगों को पहचानने लगता है। तथा अपने अहम् भाव स्वार्थीपन उत्पन्न हा जाता है। सामाजिक नैतिक सुपर   ईगो ( विवेक परम अहम् ) जरुरतों के अनुसार उत्पन्न होता है। तथा अनुभव का எஎ 8 इसके   अचेतन हिस्सा ఖగా  ఇగాౌ अहम् बन आदर्श (ईगो आइडियल तथा सचेतन भाग को विवेक कहते हैं। यह मनोवैज्ञानिक तत्व है लेकिन हर इंसान को दिमाग कर्मों के आधार पर ही मिलता है। पार्ट 2 इड ( मूल प्रवृत्ति ) यह मन का वह भाग है जिसमें मूल प्रवृत्ति की इच्छाएं ( जैसे कि उत्तरजीवित यौनता  भोजन आदि संबंधी इच्छाएं रहतीं हैँ) जो आक्रमकता जल्दी ही संतुष्टी चाहती है गम के सिद्धान्त तथा खुशी [ होती 8, چ इच्छाएं आधारित तार्किकता या पर आतार्किक तथा अमौखिक होती है और चेतना में प्रवेश नहीं करतीं | ईगो   (अहम्) भाग   है॰ সী মুল का  सचेतन 46 4< प्रवृत्ति की इच्छाएं को वास्तविकता के अनुसार नियंत्रण करता है। इस पर सुपर ईँगो ( परम अहम् या विवेक ) भाग सचेतन तथा प्रभाव पडता है। इसका 38া কা अचेतन रहता है॰ इसका प्रमुख कार्य मनुष्य को तनाव फ्रायड की मनोवैज्ञानिक पुत्री या चिंता से बचाना है। एना फ्रायड के अनुसार यह भाग डेढ़ वर्ष की आयु में उत्पन्न हा जाता है। जिसका प्रमाण यह है कि इस आयू के बाद बच्चा अपने अंगों को पहचानने लगता है। तथा अपने अहम् भाव स्वार्थीपन उत्पन्न हा जाता है। सामाजिक नैतिक सुपर   ईगो ( विवेक परम अहम् ) जरुरतों के अनुसार उत्पन्न होता है। तथा अनुभव का எஎ 8 इसके   अचेतन हिस्सा ఖగా  ఇగాౌ अहम् बन आदर्श (ईगो आइडियल तथा सचेतन भाग को विवेक कहते हैं। यह मनोवैज्ञानिक तत्व है लेकिन हर इंसान को दिमाग कर्मों के आधार पर ही मिलता है। - ShareChat