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#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१५४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकाण्ड तिहत्तरवाँ सर्ग भरतका कैकेयीको धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना पिताके परलोकवास और दोनों भाइयोंके वनवासका समाचार सुनकर भरत दुःखसे संतप्त हो उठे और इस प्रकार बोले—॥१॥ 'हाय! तूने मुझे मार डाला। मैं पितासे सदाके लिये बिछुड़ गया और पितृतुल्य बड़े भाईसे भी बिलग हो गया। अब तो मैं शोकमें डूब रहा हूँ, मुझे यहाँ राज्य लेकर क्या करना है?॥२॥ 'तूने राजाको परलोकवासी तथा श्रीरामको तपस्वी बनाकर मुझे दुःख-पर-दुःख दिया है, घावपर नमक-सा छिड़क दिया है॥३॥ 'तू इस कुलका विनाश करनेके लिये कालरात्रि बनकर आयी थी। मेरे पिताने तुझे अपनी पत्नी क्या बनाया, दहकते हुए अङ्गारको हृदयसे लगा लिया था; किंतु उस समय यह बात उनकी समझमें नहीं आयी थी॥४॥ 'पापपर ही दृष्टि रखनेवाली! कुलकलङ्किनी! तूने मेरे महाराजको कालके गालमें डाल दिया और मोहवश इस कुलका सुख सदाके लिये छीन लिया॥५॥ 'तुझे पाकर मेरे सत्यप्रतिज्ञ महायशस्वी पिता महाराज दशरथ इन दिनों दुःसह दुःखसे संतप्त होकर प्राण त्यागनेको विवश हुए हैं॥६॥ 'बता, तूने मेरे धर्मवत्सल पिता महाराज दशरथका विनाश क्यों किया? मेरे बड़े भाई श्रीरामको क्यों घरसे निकाला और वे भी क्यों (तेरे ही कहनेसे) वनको चले गये?॥७॥ 'कौसल्या और सुमित्रा भी मेरी माता कहलानेवाली तुझ कैकेयीको पाकर पुत्रशोकसे पीड़ित हो गयीं। अब उनका जीवित रहना अत्यन्त कठिन है॥८॥ 'बड़े भैया श्रीराम धर्मात्मा हैं; गुरुजनोंके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये—इसे वे अच्छी तरह जानते हैं, इसलिये उनका अपनी माताके प्रति जैसा बर्ताव था, वैसा ही उत्तम व्यवहार वे तेरे साथ भी करते थे॥९॥ 'मेरी बड़ी माता कौसल्या भी बड़ी दूरदर्शिनी हैं। वे धर्मका ही आश्रय लेकर तेरे साथ बहिनका-सा बर्ताव करती हैं॥१०॥ 'पापिनि! उनके महात्मा पुत्रको चीर और वल्कल पहनाकर तूने वनमें रहनेके लिये भेज दिया। फिर भी तुझे शोक क्यों नहीं हो रहा है॥११॥ 'श्रीराम किसीकी बुराई नहीं देखते। वे शूरवीर, पवित्रात्मा और यशस्वी हैं। उन्हें चीर पहनाकर वनवास दे देनेमें तू कौन-सा लाभ देख रही है?॥१२॥ 'तू लोभिन है। मैं समझता हूँ, इसीलिये तुझे यह पता नहीं है कि मेरा श्रीरामचन्द्रजीके प्रति कैसा भाव है, तभी तूने राज्यके लिये यह महान् अनर्थ कर डाला है॥१३॥ 'मैं पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणको न देखकर किस शक्तिके प्रभावसे इस राज्यकी रक्षा कर सकता हूँ? (मेरे बल तो मेरे भाई ही हैं)॥१४॥ 'मेरे धर्मात्मा पिता महाराज दशरथ भी सदा उन महातेजस्वी बलवान् श्रीरामका ही आश्रय लेते थे (उन्हींसे अपने लोक-परलोककी सिद्धिकी आशा रखते थे), ठीक उसी तरह जैसे मेरुपर्वत अपनी रक्षाके लिये अपने ऊपर उत्पन्न हुए गहन वनका ही आश्रय लेता है (यदि वह दुर्गम वनसे घिरा हुआ न हो तो दूसरे लोग निश्चय ही उसपर आक्रमण कर सकते हैं)॥१५॥ 'यह राज्यका भार, जिसे किसी महाधुरंधरने धारण किया था, मैं कैसे, किस बलसे धारण कर सकता हूँ? जैसे कोई छोटा-सा बछड़ा बड़े-बड़े बैलोंद्वारा ढोये जानेयोग्य महान् भारको नहीं खींच सकता, उसी प्रकार यह राज्यका महान् भार मेरे लिये असह्य है॥१६॥ 'अथवा नाना प्रकारके उपायों तथा बुद्धिबलसे मुझमें राज्यके भरण-पोषणकी शक्ति हो तो भी केवल अपने बेटेके लिये राज्य चाहनेवाली तुझ कैकेयीकी मनःकामना पूरी नहीं होने दूँगा॥१७॥ 'यदि श्रीराम तुझे सदा अपनी माताके समान नहीं देखते होते तो तेरी-जैसी पापपूर्ण विचारचाली माताका त्याग करनेमें मुझे तनिक भी हिचक नहीं होती॥१८॥ 'उत्तम चरित्रसे गिरी हुई पापिनि! मेरे पूर्वजोंने जिसकी सदा निन्दा की है, वह पापपर ही दृष्टि रखनेवाली बुद्धि तुझमें कैसे उत्पन्न हो गयी?॥१९॥ 'इस कुलमें जो सबसे बड़ा होता है, उसीका राज्याभिषेक होता है; दूसरे भाई सावधानीके साथ बड़ेकी आज्ञाके अधीन रहकर कार्य करते हैं॥२०॥ 'क्रूर स्वभाववाली कैकेयि! मेरी समझमें तू राजधर्मपर दृष्टि नहीं रखती है अथवा उसे बिलकुल नहीं जानती। राजाओंके बर्तावका जो सनातन स्वरूप है, उसका भी तुझे ज्ञान नहीं है॥२१॥ 'राजकुमारोंमें जो ज्येष्ठ होता है, सदा उसीका राजाके पदपर अभिषेक किया जाता है। सभी राजाओंके यहाँ समान रूपसे इस नियमका पालन होता है। इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंके कुलमें इसका विशेष आदर है॥२२॥ 'जिनकी एकमात्र धर्मसे ही रक्षा होती आयी है तथा जो कुलोचित सदाचारके पालनसे ही सुशोभित हुए हैं, उनका यह चरित्रविषयक अभियान आज तुझे पाकर—तेरे सम्बन्धके कारण दूर हो गया॥२३॥ 'महाभागे! तेरा जन्म भी तो महाराज केकयके कुलमें हुआ है, फिर तेरे हृदयमें यह निन्दित बुद्धिमोह कैसे उत्पन्न हो गया?॥२४॥ 'अरी! तेरा विचार बड़ा ही पापपूर्ण है। मैं तेरी इच्छा कदापि नहीं पूर्ण करूँगा। तूने मेरे लिये उस विपत्तिकी नींव डाल दी है, जो मेरे प्राणतक ले सकती है॥२५॥ 'यह ले, मैं अभी तेरा अप्रिय करनेके लिये तुल गया हूँ। मैं वनसे निष्पाप भ्राता श्रीरामको, जो स्वजनोंके प्रिय हैं, लौटा लाऊँगा॥२६॥ श्रीरामको लौटा लाकर उद्दीप्त तेजवाले उन्हीं महापुरुषका दास बनकर स्वस्थचित्तसे जीवन व्यतीत करूँगा'॥२७॥ ऐसा कहकर महात्मा भरत शोकसे पीड़ित हो पुनः जली-कटी बातोंसे कैकेयीको व्यथित करते हुए उसे जोर-जोरसे फटकारने लगे, मानो मन्दराचलकी गुहामें बैठा हुआ सिंह गरज रहा हो॥२८॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७३॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
##श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५ - "दोहावली 64" श्रीरघुबीर तजि करै भरोसो और নুলমী सुख संपत्ति की का चली नरकहुँ नाहीं ठौर |l punitbapuofficial org] W जो मनुष्य श्रीरघुनाथजी को छोड़कर दूसरा कोई उसे सुख-्सम्पति कीतो बात ही भरोसा करता हैः  नरकमें भी जगह नहीं मिलेगी | & "दोहावली 64" श्रीरघुबीर तजि करै भरोसो और নুলমী सुख संपत्ति की का चली नरकहुँ नाहीं ठौर |l punitbapuofficial org] W जो मनुष्य श्रीरघुनाथजी को छोड़कर दूसरा कोई उसे सुख-्सम्पति कीतो बात ही भरोसा करता हैः  नरकमें भी जगह नहीं मिलेगी | & - ShareChat