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#✍मेरे पसंदीदा लेखक #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख
✍मेरे पसंदीदा लेखक - अपना सही स्वरूप पहचानें का तकाजा यह है कि हम अपने स्वरूप और दूरदर्शिता प्रयोजन को समझें जीवन शरीर और मनरूपी उपकरणों का उपयोग जानें और उन प्रयोजनों में तत्पर रहें, जिनके {T ரி- सर्वश्रेष्ठ शरीर, मानव जीवन उपलब्ध सुरदुर्लभ जगत्  46 हुआ है आत्मा वस्तुतः परमात्मा का पवित्र अंश है | उसकी मूल प्रवृत्तियाँ वही हैं, जो ईश्वर की परमात्मा परम पवित्र है, श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से परिपूर्ण है उसका समस्त क्रियाकलाप लोक- मंगल के लिए है | वह लेने की आकांक्षा से दूर, देने की, प्रेम की उदात्त भावना से परिपूर्ण है आत्मा को इसी स्तर का होना चाहिए और उसके क्रियाकलापों में उसो प्रकार की गतिविधियों का समावेश होना चाहिए। परमेश्वर ने अपनी सृष्टि को सुंदर, सुसज्जित, सुगंधित और समुन्नत बनाने में सहयोगी की तरह योगदान करने के लिए मानव प्राणी को अपने प्रतिनिधि के रूप उसका चिंतन और कर्त्तव्य इसी दिशा में नियोजित में सृजा है रहना चाहिए। यही है आत्मबोध, यही है आत्मिक जीवनक्रम को अपनाकर हम अपने अवतरण की सार्थकता सिद्ध कर इसा सकते हैं सर्वथा अवांछनीय है कि हम अपने को शरीर एवं मन बैठें और इन्हीं की सुख सुविधा तथा मरजी ক লিব जुटाने में न हिचकें| हमें अपने मूल स्वरूप अनुचित मार्ग तक अपनाने आत्मा को जानना चाहिए। %|*#%%*##:#*%***#***#****%***#***********##***** ೫5353; ೫೦೫t6' 22L2d- e अपना सही स्वरूप पहचानें का तकाजा यह है कि हम अपने स्वरूप और दूरदर्शिता प्रयोजन को समझें जीवन शरीर और मनरूपी उपकरणों का उपयोग जानें और उन प्रयोजनों में तत्पर रहें, जिनके {T ரி- सर्वश्रेष्ठ शरीर, मानव जीवन उपलब्ध सुरदुर्लभ जगत्  46 हुआ है आत्मा वस्तुतः परमात्मा का पवित्र अंश है | उसकी मूल प्रवृत्तियाँ वही हैं, जो ईश्वर की परमात्मा परम पवित्र है, श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से परिपूर्ण है उसका समस्त क्रियाकलाप लोक- मंगल के लिए है | वह लेने की आकांक्षा से दूर, देने की, प्रेम की उदात्त भावना से परिपूर्ण है आत्मा को इसी स्तर का होना चाहिए और उसके क्रियाकलापों में उसो प्रकार की गतिविधियों का समावेश होना चाहिए। परमेश्वर ने अपनी सृष्टि को सुंदर, सुसज्जित, सुगंधित और समुन्नत बनाने में सहयोगी की तरह योगदान करने के लिए मानव प्राणी को अपने प्रतिनिधि के रूप उसका चिंतन और कर्त्तव्य इसी दिशा में नियोजित में सृजा है रहना चाहिए। यही है आत्मबोध, यही है आत्मिक जीवनक्रम को अपनाकर हम अपने अवतरण की सार्थकता सिद्ध कर इसा सकते हैं सर्वथा अवांछनीय है कि हम अपने को शरीर एवं मन बैठें और इन्हीं की सुख सुविधा तथा मरजी ক লিব जुटाने में न हिचकें| हमें अपने मूल स्वरूप अनुचित मार्ग तक अपनाने आत्मा को जानना चाहिए। %|*#%%*##:#*%***#***#****%***#***********##***** ೫5353; ೫೦೫t6' 22L2d- e - ShareChat