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जीने की राह - अध्याय १८ ४०७ ईश्वरः, सर्वभूतानाम्   हृद्देशे, 3157, fಡfಸ, सर्वभूतानि, यन्त्रारूढानि, भ्रामयन् , সামমা Il &? Il क्योंकि - अर्जुन हे अर्जुन ! ( उनके कर्मोंके शरीररूप यन्त्रमें সনুমাং) यन्त्रारूढानि= आरूढ़ हुए भ्रामयन् भ्रमण कराता हुआ सर्वभूतानाम् = सर्वभूतानि सम्पूर्ण प्राणियोंको सब प्राणियोंके ईश्वरः अन्तर्यामी परमेश्वर हृद्देशे हृदयमें अपनी मायासे সামমা तिष्ठति स्थित है [ ईश्वरकी शरण जाने-्हेतु आज्ञा और उसका फल। ] शरणं सर्वभावेन Ha 97 | गच्छ तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् II ६२ ।l गच्छ,   सर्वभावेन, SIUTH; Tಹ, एव, भारत, तत्प्रसादात् , पराम् , शान्तिम्, स्थानम्, प्राप्स्यसि, शाश्वतम् ।। ६२ II इसलिये - हे भारत ! ( तू) परमात्माकी भारत 37 तत्प्रसादात् মনপানন (ही तू ) सब प्रकारसे தர் उस परमेश्वरकोी 7 पराम् परम शान्तिम् शान्तिको ( तथा ) a शाश्वतम् सनातन धामको সাতোদ शरणम् स्थानम् परम प्राप्स्यसि प्राप्त होगा। गच्छ তা | लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्तिको त्यागकर एवं शरीर और संसारमें अहंता ममतासे रहित होकर केवल एक परमात्माको ही परम आश्रय, परम गति और श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरन्तर  सर्वस्व   समझना तथा   अनन्यभावसे अतिशय भगवान्के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूपका चिन्तन करते रहना एवं भगवान्का भजन- रखते हुए ही उनके आज्ञानुसार कर्तव्यकर्मोंका निःस्वार्थभावसे केवल परमेश्वरके स्मरण  लिये आचरण करना यह " सब प्रकारसे परमात्माके शरणमें ' होना है। अध्याय १८ ४०७ ईश्वरः, सर्वभूतानाम्   हृद्देशे, 3157, fಡfಸ, सर्वभूतानि, यन्त्रारूढानि, भ्रामयन् , সামমা Il &? Il क्योंकि - अर्जुन हे अर्जुन ! ( उनके कर्मोंके शरीररूप यन्त्रमें সনুমাং) यन्त्रारूढानि= आरूढ़ हुए भ्रामयन् भ्रमण कराता हुआ सर्वभूतानाम् = सर्वभूतानि सम्पूर्ण प्राणियोंको सब प्राणियोंके ईश्वरः अन्तर्यामी परमेश्वर हृद्देशे हृदयमें अपनी मायासे সামমা तिष्ठति स्थित है [ ईश्वरकी शरण जाने-्हेतु आज्ञा और उसका फल। ] शरणं सर्वभावेन Ha 97 | गच्छ तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् II ६२ ।l गच्छ,   सर्वभावेन, SIUTH; Tಹ, एव, भारत, तत्प्रसादात् , पराम् , शान्तिम्, स्थानम्, प्राप्स्यसि, शाश्वतम् ।। ६२ II इसलिये - हे भारत ! ( तू) परमात्माकी भारत 37 तत्प्रसादात् মনপানন (ही तू ) सब प्रकारसे தர் उस परमेश्वरकोी 7 पराम् परम शान्तिम् शान्तिको ( तथा ) a शाश्वतम् सनातन धामको সাতোদ शरणम् स्थानम् परम प्राप्स्यसि प्राप्त होगा। गच्छ তা | लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्तिको त्यागकर एवं शरीर और संसारमें अहंता ममतासे रहित होकर केवल एक परमात्माको ही परम आश्रय, परम गति और श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरन्तर  सर्वस्व   समझना तथा   अनन्यभावसे अतिशय भगवान्के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूपका चिन्तन करते रहना एवं भगवान्का भजन- रखते हुए ही उनके आज्ञानुसार कर्तव्यकर्मोंका निःस्वार्थभावसे केवल परमेश्वरके स्मरण  लिये आचरण करना यह " सब प्रकारसे परमात्माके शरणमें ' होना है। - ShareChat