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#गायत्री मंत्र संध्या उपासना , गायत्री जप यह सबसे अनिवार्य कर्म है किसी भी सनातनी के लिए और वर्तमान में तो ये दोनों ही कर्म प्रचलित है परन्तु केवल इस कारण की बड़े सन्त महात्मा वेद ज्ञानी लोग अपने उपदेश में कहते है कि सभी को गायत्री जप का अधिकार नही । बस इसी बात के विरोधाभासी बुद्धि के कारण लोग इसका जप करने लगते है परन्तु जो वास्तविकता में धर्म के अनुसार चलते है उन्हें है यह ज्ञात होता है कि ये दोनों ही कर्म बिना यज्ञोपवीत के नही होते और आज भी ब्राह्मण वर्ण के अतिरिक्त कई स्थानों पर वहाँ के क्षत्रियों और वैश्यों में यज्ञोपवीत संस्कार जीवंत है और वे यज्ञोपवीत करवा कर दोनों कर्म करते है परन्तु *पारस्कर-गृह सूत्र* के अनुसार क्षत्रिय और वैश्य हेतु पृथक गायत्री मंत्र का उपदेश दिया गया है अतः यदि कोई क्षत्रिय और वैश्य यज्ञोपवीत धारण पश्चात ब्रह्म कर्म , उपासना में रुचि रखता हो और स्वम् का अनिवार्य कार्य गायत्री जप करे तो उसे अपने वर्ण के अनुसार गायत्री जप करना चाहए उसी से उसे लाभ प्राप्त होगा । अतः दोनो के गायत्री मंत्र प्रस्तुत है🙏🏻🚩
गायत्री मंत्र - क्षत्रीय गायत्री मन्त्रः विनियोग देवसवितरिति  बृहस्पति   ऋषिः, 30 सविता   देवता त्रिष्टुप्छन्दः, जपे विनियोगः  ऊँ देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञोपतिं भगाय दिव्यो गन्थर्वः T केतपूः केतन्नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचन्नः स्वदतु (9. 4. #. &/9) वैश्य गायत्री मन्त्रः विनियोग ऊँ विश्वारूपाणि इति श्यावाश्वः ऋषिः सावित्री ( गायत्री) देवता जगती छन्दः जपे विनियोगः प्रतिमुञ्चते कविः प्रासीवीद्भद्रं द्विपदे  ऊँ विश्वारूपाणि मन्त्र चतुष्पदे | वरेण्योउनु प्रयपाणमुषसो विराजति।।१।। (शु॰ य॰ सं. १२/३) विनाकमख्यत्सविता क्षत्रीय गायत्री मन्त्रः विनियोग देवसवितरिति  बृहस्पति   ऋषिः, 30 सविता   देवता त्रिष्टुप्छन्दः, जपे विनियोगः  ऊँ देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञोपतिं भगाय दिव्यो गन्थर्वः T केतपूः केतन्नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचन्नः स्वदतु (9. 4. #. &/9) वैश्य गायत्री मन्त्रः विनियोग ऊँ विश्वारूपाणि इति श्यावाश्वः ऋषिः सावित्री ( गायत्री) देवता जगती छन्दः जपे विनियोगः प्रतिमुञ्चते कविः प्रासीवीद्भद्रं द्विपदे  ऊँ विश्वारूपाणि मन्त्र चतुष्पदे | वरेण्योउनु प्रयपाणमुषसो विराजति।।१।। (शु॰ य॰ सं. १२/३) विनाकमख्यत्सविता - ShareChat