#जय मां दुर्गा
शुंभ-निशुंभ के वध की कथा देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के मुख्य प्रसंगों में से एक है। यह कथा असुरों के विनाश और दैवीय शक्ति की विजय को दर्शाती है:
* असुरों का अत्याचार: शुंभ और निशुंभ दो शक्तिशाली असुर भाई थे, जिन्होंने ब्रह्मा जी से वरदान पाकर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। उन्होंने इंद्र सहित सभी देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया, जिसके बाद देवताओं ने हिमालय पर जाकर देवी भगवती की स्तुति की।
* देवी अंबिका का प्रकटीकरण: देवताओं की प्रार्थना पर देवी पार्वती के स्वरूप से देवी अंबिका (कौशिकी) प्रकट हुईं। उनकी सुंदरता की चर्चा सुनकर शुंभ-निशुंभ ने उनके पास विवाह का प्रस्ताव भेजा। देवी ने उत्तर दिया कि जो उन्हें युद्ध में हरा देगा, वही उनसे विवाह कर सकेगा।
* चंड और मुंड का वध: शुंभ ने पहले अपने सेनापति चंड और मुंड को देवी को पकड़ने के लिए भेजा। जब वे युद्ध भूमि में पहुँचे, तो देवी अंबिका के क्रोध से उनके मस्तक से देवी काली प्रकट हुईं। काली माता ने चंड और मुंड का संहार किया, जिसके कारण उनका नाम 'चामुंडा' पड़ा।
* रक्तबीज का वध: इसके बाद शुंभ ने रक्तबीज नामक महासुर को भेजा। रक्तबीज को यह वरदान था कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें भूमि पर गिरेंगी, उतने ही नए रक्तबीज पैदा हो जाएंगे। युद्ध के दौरान जब भी देवी उसे घायल करतीं, हजारों रक्तबीज उत्पन्न हो जाते। तब देवी काली ने अपना विस्तार किया और रक्तबीज के रक्त को भूमि पर गिरने से पहले ही पीना शुरू कर दिया। इस प्रकार रक्तबीज का अंत हुआ।
* निशुंभ और शुंभ का अंत: अंत में शुंभ और निशुंभ स्वयं युद्ध के लिए आए। देवी अंबिका और निशुंभ के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें देवी ने निशुंभ का वध कर दिया। अपने भाई की मृत्यु से क्रोधित होकर शुंभ ने देवी को ललकारा। अंततः देवी ने अपने त्रिशूल से शुंभ के हृदय पर प्रहार किया और उसका वध कर देवताओं को भयमुक्त किया।


