ShareChat
click to see wallet page
search
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) शततमोऽध्यायः शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 310) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच (इत्युक्त्वा सा महाभागा तत्रैवान्तरधीयत ।) तयैवं समनुज्ञातः पुत्रमादाय शान्तनुः ।। ४० ।। भ्राजमानं यथादित्यमाययौ स्वपुरं प्रति । पौरवस्तु पुरीं गत्वा पुरन्दरपुरोपमाम् ।। ४१ ।। सर्वकामसमृद्धार्थ मेने सोऽऽत्मानमात्मना । पौरवेषु ततः पुत्रं राज्यार्थमभयप्रदम् ।। ४२ ।। गुणवन्तं महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयत् । पौरवाञ्छान्तनोः पुत्रः पितरं च महायशाः ।। ४३ ।। राष्ट्रं च रञ्जयामास वृत्तेन भरतर्षभ । स तथा सह पुत्रेण रममाणो महीपतिः ।। ४४ ।। वर्तयामास वर्षाणि चत्वार्यमितविक्रमः । स कदाचिद् वनं यातो यमुनामभितो नदीम् ।। ४५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- ऐसा कहकर महाभागा गंगादेवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं। गंगाजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर महाराज शान्तनु सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले अपने पुत्रको लेकर राजधानीमें आये। उनका हस्तिनापुर इन्द्रनगरी अमरावतीके समान सुन्दर था। पूरुवंशी राजा शान्तनु पुत्रसहित उसमें जाकर अपने-आपको सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न एवं सफलमनोरथ मानने लगे। तदनन्तर उन्होंने सबको अभय देनेवाले महात्मा एवं गुणवान् पुत्रको राजकाजमें सहयोग करनेके लिये समस्त पौरवोंके बीचमें युवराज-पदपर अभिषिक्त कर दिया। जनमेजय ! शान्तनुके उस महायशस्वी पुत्रने अपने आचार-व्यवहारसे पिताको, पौरवसमाजको तथा समूचे राष्ट्रको प्रसन्न कर लिया। अमितपराक्रमी राजा शान्तनु ने वैसे गुणवान् पुत्र के साथ आनन्दपूर्वक रहते हुए चार वर्ष व्यतीत किये। एक दिन वे यमुना नदीके निकटवर्ती वनमें गये ।। ४०-४५ ।। महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद् गन्धमुत्तमम् । तस्य प्रभवमन्विच्छन् विचचार समन्ततः ।। ४६ ।। वहाँ राजाको अवर्णनीय एवं परम उत्तम सुगन्धका अनुभव हुआ। वे उसके उद्गमस्थानका पता लगाते हुए सब ओर विचरने लगे ।। ४६ ।। स ददर्श तदा कन्यां दाशानां देवरूपिणीम् । तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्यामसितलोचनाम् ।। ४७ ।। घूमते-घूमते उन्होंने मल्लाहोंकी एक कन्या देखी, जो देवांगनाओंके समान रूपवती थी। श्याम नेत्रोंवाली उस कन्याको देखते ही राजाने पूछा- ।। ४७ ।। कस्य त्वमसि का चासि किं च भीरु चिकीर्षसि । साब्रवीद् दाशकन्यास्मि धर्मार्थ वाहये तरिम् ।। ४८ ।। पितुर्नियोगाद् भद्रं ते दाशराज्ञो महात्मनः । रूपमाधुर्यगन्धैस्तां संयुक्तां देवरूपिणीम् ।। ४९ ।। समीक्ष्य राजा दाशेयीं कामयामास शान्तनुः । स गत्वा पितरं तस्या वरयामास तां तदा ।। ५० ।। 'भीरु! तू कौन है, किसकी पुत्री है और क्या करना चाहती है?' वह बोली- 'राजन् ! आपका कल्याण हो। मैं निषादकन्या हूँ और अपने पिता महामना निषादराजकी आज्ञासे धर्मार्थ नाव चलाती हूँ।' राजा शान्तनुने रूप, माधुर्य तथा सुगन्धसे युक्त देवांगनाके तुल्य उस निषादकन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छा की। तदनन्तर उसके पिताके समीप जाकर उन्होंने उसका वरण किया ।। ४८-५० ।। पर्यपूच्छत् ततस्तस्याः पितरं सोऽऽत्मकारणात् । स च तं प्रत्युवाचेदं दाशराजो महीपतिम् ।। ५१ ।। उन्होंने उसके पितासे पूछा- 'मैं अपने लिये तुम्हारी कन्या चाहता हूँ।' यह सुनकर निषादराजने राजा शान्तनुको यह उत्तर दिया- ।। ५१ ।। जातमात्रैव मे देया वराय वरवर्णिनी । हृदि कामस्तु मे कश्चित् तं निबोध जनेश्वर ।। ५२ ।। 'जनेश्वर ! जबसे इस सुन्दरी कन्याका जन्म हुआ है, तभीसे मेरे मनमें यह चिन्ता है कि इसका किसी श्रेष्ठ वरके साथ विवाह करना चाहिये; किंतु मेरे हृदयमें एक अभिलाषा है, उसे सुन लीजिये ।। ५२ ।। यदीमां धर्मपत्नीं त्वं मत्तः प्रार्थयसेऽनघ । सत्यवागसि सत्येन समयं कुरु मे ततः ।। ५३ ।। 'पापरहित नरेश! यदि इस कन्याको अपनी धर्मपत्नी बनानेके लिये आप मुझसे माँग रहे हैं, तो सत्यको सामने रखकर मेरी इच्छा पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कीजिये; क्योंकि आप सत्यवादी हैं ।। ५३ ।। समयेन प्रदद्यां ते कन्यामहमिमां नृप । न हि मे त्वत्समः कश्चिद् वरो जातु भविष्यति ।। ५४ ।। 'राजन्! मैं इस कन्याको एक शर्तके साथ आपकी सेवामें दूँगा। मुझे आपके समान दूसरा कोई श्रेष्ठ वर कभी नहीं मिलेगा' ।। ५४ ।। शान्तनुरुवाच श्रुत्वा तव वरं दाश व्यवस्येयमहं तव । दातव्यं चेत् प्रदास्यामि न त्वदेयं कथंचन ।। ५५ ।। शान्तनुने कहा- निषाद ! पहले तुम्हारे अभीष्ट वरको सुन लेनेपर मैं उसके विषयमें कुछ निश्चय कर सकता हूँ। यदि देनेयोग्य होगा, तो दूँगा और देनेयोग्य नहीं होगा, तो कदापि नहीं दे सकता ।। ५५ ।। दाश उवाच अस्यां जायेत यः पुत्रः स राजा पृथिवीपते । त्वदूर्ध्वमभिषेक्तव्यो नान्यः कश्चन पार्थिव ।। ५६ ।। निषाद बोला- पृथ्वीपते ! इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, आपके बाद उसीका राजाके पदपर अभिषेक किया जाय, अन्य किसी राजकुमारका नहीं ।। ५६ ।। वैशम्पायन उवाच नाकामयत तं दातुं वरं दाशाय शान्तनुः । शरीरजेन तीव्रेण दह्यमानोऽपि भारत ।। ५७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! राजा शान्तनु प्रचण्ड कामाग्निसे जल रहे थे, तो भी उनके मनमें निषादको वह वर देनेकी इच्छा नहीं हुई ।। ५७ ।। स चिन्तयन्नेव तदा दाशकन्यां महीपतिः । प्रत्ययाद्धास्तिनपुरं कामोपहतचेतनः ।। ५८ ।। कामकी वेदनासे उनका चित्त चंचल था। वे उस निषादकन्याका ही चिन्तन करते हुए उस समय हस्तिनापुरको लौट गये ।। ५८ ।। ततः कदाचिच्छोचन्तं शान्तनुं ध्यानमास्थितम् । पुत्रो देवव्रतोऽभ्येत्य पितरं वाक्यमब्रवीत् ।। ५९ ।। तदनन्तर एक दिन राजा शान्तनु ध्यानस्थ होकर कुछ सोच रहे थे- चिन्तामें पड़े थे। इसी समय उनके पुत्र देवव्रत अपने पिताके पास आये और इस प्रकार बोले- ।। ५९ ।। सर्वतो भवतः क्षेमं विधेयाः सर्वपार्थिवाः । तत् किमर्थमिहाभीक्ष्णं परिशोचसि दुःखितः ।। ६० ।। 'पिताजी! आपका तो सब ओरसे कुशल-मंगल है, भू-मण्डलके सभी नरेश आपकी आज्ञाके अधीन हैं; फिर किसलिये आप निरन्तर दुःखी होकर शोक और चिन्तामें डूबे रहते हैं ।। ६० ।। ध्यायन्निव च मां राजन्नाभिभाषसि किंचन । न चाश्वेन विनिर्यासि विवर्णो हरिणः कृशः ।। ६१ ।। 'राजन् ! आप इस तरह मौन बैठे रहते हैं, मानो किसीका ध्यान कर रहे हों; मुझसे कोई बातचीततक नहीं करते। घोड़ेपर सवार हो कहीं बाहर भी नहीं निकलते। आपकी कान्ति मलिन होती जा रही है। आप पीले और दुबले हो गये हैं ।। ६१ ।। व्याधिमिच्छामि ते ज्ञातुं प्रतिकुर्यां हि तत्र वै । एवमुक्तः स पुत्रेण शान्तनुः प्रत्यभाषत ।। ६२ ।। 'आपको कौन-सा रोग लग गया है, यह मैं जानना चाहता हूँ, जिससे मैं उसका प्रतीकार कर सकूँ।' पुत्रके ऐसा कहनेपर शान्तनुने उत्तर दिया ।। ६२ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत
महाभारत - প্রীসঞ্নজ প্রীসঞ্নজ - ShareChat