#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣8️⃣7️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
त्रिनवतितमोऽध्यायः
राजा ययाति का वसुमान् और शिबि के प्रतिग्रह को अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओं के साथ स्वर्ग में जाना...(दिन 287)
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वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा ययातिस्तु पुनः प्रोवाच बुद्धिमान् ।
सर्वे ह्यवभृथस्नातास्त्वरध्वं कार्यगौरवात् ।।)
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! बुद्धिमान् ययाति उपर्युक्त बात कहकर पुनः अपने दौहित्रोंसे बोले- 'तुम सब लोग अवभृथस्नान कर चुके हो। अब महत्त्वपूर्ण कार्यकी सिद्धिके लिये शीघ्र तैयार हो जाओ'।
अष्टक उवाच
आतिष्ठस्व रथान् राजन् विक्रमस्व विहायसम् । वयमप्यनुयास्यामो यदा कालो भविष्यति ।। १४ ।।
अष्टक बोले- राजन् ! आप इन रथोंमें बैठिये और आकाशमें ऊपरकी ओर बढ़िये। जब समय होगा, तब हम भी आपका अनुसरण करेंगे ।। १४ ।।
ययातिरुवाच
सर्वैरिदानीं गन्तव्यं सह स्वर्गजितो वयम् । एष नो विरजाः पन्था दृश्यते देवसद्मनः ।। १५ ।।
ययाति बोले- हम सब लोगोंने साथ-साथ स्वर्गपर विजय पायी है, इसलिये इस समय सबको वहाँ चलना चाहिये। देवलोकका यह रजोहीन सात्त्विक मार्ग हमें स्पष्ट दिखायी दे रहा है ।। १५ ।।
वैशम्पायन उवाच
तेऽधिरुह्य रथान् सर्वे प्रयाता नृपसत्तमाः । आक्रमन्तो दिवं भाभिर्धर्मेणावृत्य रोदसी ।। १६ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्तर वे सभी नृपश्रेष्ठ उन दिव्य रथोंपर आरूढ़ हो धर्मके बलसे स्वर्गमें पहुँचनेके लिये चल दिये। उस समय पृथ्वी और आकाशमें उनकी प्रभा व्याप्त हो रही थी ।। १६ ।।
(अष्टकश्च शिबिश्चैव काशिराजः प्रतर्दनः । ऐक्ष्वाकवो वसुमनाश्चत्वारो भूमिपाश्च ह ।। सर्वे ह्यवभृथस्नाताः स्वर्गताः साधवः सह ।)
अष्टक, शिबि, काशिराज प्रतर्दन तथा इक्ष्वाकुवंशी वसुमना ये चारों साधु नरेश यज्ञान्त-स्नान करके एक साथ स्वर्गमें गये।
अष्टक उवाच
अहं मन्ये पूर्वमेकोऽस्मि गन्ता सखा चेन्द्रः सर्वथा मे महात्मा । कस्मादेवं शिबिरौशीनरोऽय-मेकोऽत्यगात् सर्ववेगेन वाहान् ।। १७ ।।
अष्टक बोले- राजन् ! महात्मा इन्द्र मेरे बड़े मित्र हैं, अतः मैं तो समझता था कि अकेला मैं ही सबसे पहले उनके पास पहुँचूँगा। परंतु ये उशीनरपुत्र शिबि अकेले सम्पूर्ण वेगसे हम सबके वाहनोंको लाँधकर आगे बढ़ गये हैं, ऐसा कैसे हुआ? ।। १७ ।।
ययातिरुवाच
अददद् देवयानाय यावद् वित्तमविन्दत ।
उशीनरस्य पुत्रोऽयं तस्माच्छ्रेष्ठो हि वः शिबिः ।। १८ ।।
ययातिने कहा- राजन् ! उशीनरके पुत्र शिबिने ब्रह्मलोकके मार्गकी प्राप्तिके लिये अपना सर्वस्व दान कर दिया था, इसीलिये ये तुम सब लोगोंमें श्रेष्ठ हैं ।। १८ ।।
दानं तपः सत्यमथापि धर्मो
ह्रीः श्रीः क्षमा सौम्यमथो विधित्सा । राजन्नेतान्यप्रमेयाणि राज्ञः शिबेः स्थितान्यप्रतिमस्य बुद्ध्या ।। १९ ।।
नरेश्वर ! दान, तपस्या, सत्य, धर्म, ह्री, श्री, क्षमा, सौम्यभाव और व्रत-पालनकी अभिलाषा-राजा शिबिमें ये सभी गुण अनुपम हैं तथा बुद्धिमें भी उनकी समता करनेवाला कोई नहीं है ।। १९ ।।
एवंवृत्तो हीनिषेवश्च यस्मात् तस्माच्छिबिरत्यगाद् वै रथेन ।
राजा शिबि ऐसे सदाचारसम्पन्न और लज्जाशील हैं! (इनमें अभिमानकी मात्रा छू भी नहीं गयी है।) इसीलिये शिबि हम सबसे आगे बढ़ गये हैं।
वैशम्पायन उवाच
अथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छ-
न्मातामहं कौतुकेनेन्द्रकल्पम् ।। २० ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर अष्टकने कौतूहलवश इन्द्रके तुल्य अपने नाना राजा ययातिसे पुनः प्रश्न किया ।। २० ।।
पृच्छामि त्वां नृपते ब्रूहि सत्यं कुतश्च कश्चासि सुतश्च कस्य । कृतं त्वया यद्धि न तस्य कर्ता
लोके त्वदन्यः क्षत्रियो ब्राह्मणो वा ।। २१ ।।
महाराज! मैं आपसे एक बात पूछता हूँ। आप उसे सच-सच बताइये। आप कहाँसे आये हैं, कौन हैं और किसके पुत्र हैं? आपने जो कुछ किया है, उसे करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण इस संसारमें नहीं है ।। २१ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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