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#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वयधिकशततमोऽध्यायः भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 318) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ ते त्विषून् साहस्रांस्तस्मिन् युगपदाक्षिपन् । अप्राप्तांश्चैव तानाशु भीष्मः सर्वास्तथान्तरा ।। २६ ।। अच्छिनच्छरवर्षेण महता लोमवाहिना । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे सर्वतः परिवार्य तम् ।। २७ ।। ववृषुः शरवर्षेण वर्षेणेवाद्रिमम्बुदाः । स तं बाणमयं वर्ष शरैरावार्य सर्वतः ।। २८ ।। ततः सर्वान् महीपालान् पर्यविध्यात् त्रिभिस्त्रिभिः । एकैकस्तु ततो भीष्मं राजन् विव्याध पञ्चभिः ।। २९ ।। राजन् ! उन नरेशोंने भीष्मजीपर एक ही साथ दस हजार बाण चलाये; परंतु भीष्मजीने उन सबको अपने ऊपर आनेसे पहले बीचमें ही विशाल पंखयुक्त बाणोंकी बौछार करके शीघ्रतापूर्वक काट गिराया। तब वे सब राजा उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनके ऊपर उसी प्रकार बाणोंकी झड़ी लगाने लगे, जैसे बादल पर्वतपर पानीकी धारा बरसाते हैं। भीष्मजीने सब ओरसे उस बाण-वर्षाको रोककर उन सभी राजाओंको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया। तब उनमेंसे प्रत्येकने भीष्मजीको पाँच-पाँच बाण मारे ।। २६-२९ ।। स च तान् प्रतिविव्याध द्वाभ्यां द्वाभ्यां पराक्रमन् । तद् युद्धमासीत् तुमुलं घोरं देवासुरोपमम् ।। ३० ।। पश्यतां लोकवीराणां शरशक्तिसमाकुलम् । स धनूंषि ध्वजाग्राणि वर्माणि च शिरांसि च ।। ३१ ।। चिच्छेद समरे भीष्मः शतशोऽथ सहस्रशः । तस्याति पुरुषानन्याँल्लाघवं रथचारिणः ।। ३२ ।। रक्षणं चात्मनः संख्ये शत्रवोऽप्यभ्यपूजयन् । तान् विनिर्जित्य तु रणे सर्वशस्त्रभृतां वरः ।। ३३ ।। कन्याभिः सहितः प्रायाद् भारतो भारतान् प्रति । ततस्तं पृष्ठतो राजञ्छाल्वराजो महारथः ।। ३४ ।। अभ्यगच्छदमेयात्मा भीष्मं शान्तनवं रणे। वारणं जघने भिन्दन् दन्ताभ्यामपरो यथा ।। ३५ ।। वासितामनुसम्प्राप्तो यूथपो बलिनां वरः । स्त्रीकामस्तिष्ठ तिष्ठेति भीष्ममाह स पार्थिवः ।। ३६ ।। शाल्वराजो महाबाहुरमर्षेण प्रचोदितः । ततः सः पुरुषव्याघ्रो भीष्मः परबलार्दनः ।। ३७ ।। तद्वाक्याकुलितः क्रोधाद् विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् । विततेषुधनुष्याणिर्विकुञ्चितललाटभृत् ।। ३८ ।। फिर भीष्मजी ने भी अपना पराक्रम प्रकट करते हुए प्रत्येक योद्धाको दो-दो बाणों से बींध डाला। बाणों और शक्तियोंसे व्याप्त उनका वह तुमुल युद्ध देवासुर संग्रामके समान भयंकर जान पडता था। उस समरांगणमें भीष्मने लोकविख्यात वीरोंके देखते-देखते उनके धनुष, ध्वजाके अग्रभाग, कवच और मस्तक सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें काट गिराये। युद्धमें रथसे विचरनेवाले भीष्मजीकी दूसरे वीरोंसे बढ़कर हाथकी फुर्ती और आत्मरक्षा आदिकी शत्रुओंने भी सराहना की। सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भरतकुलभूषण भीष्मजीने उन सब योद्धाओंको जीतकर कन्याओंको साथ ले भरतवंशियोंकी राजधानी हस्तिनापुरको प्रस्थान किया। राजन् ! तब महारथी शाल्वराजने पीछेसे आकर युद्धके लिये शान्तनुनन्दन भीष्मपर आक्रमण किया। शाल्वके शारीरिक बलकी कोई सीमा नहीं थी। जैसे हथिनीके पीछे लगे हुए एक गजराजके पृष्ठभागमें उसीका पीछा करनेवाला दूसरा यूथपति दाँतोंसे प्रहार करके उसे विदीर्ण करना चाहता है, उसी प्रकार बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु शाल्वराज स्त्रीको पानेकी इच्छासे ईर्ष्या और क्रोधके वशीभूत हो भीष्मका पीछा करते हुए उनसे बोला- 'अरे ओ! खड़ा रह, खड़ा रह।' तब शत्रुसेनाका संहार करनेवाले पुरुषसिंह भीष्म उसके वचनोंको सुनकर क्रोधसे व्याकुल हो धूमरहित अग्निके समान जलने लगे और हाथमें धनुष-बाण लेकर खड़े हो गये। उनके ललाटमें सिकुड़न आ गयी ।। ३०-३८ ।। क्षत्रधर्म समास्थाय व्यपेतभयसम्भ्रमः । निवर्तयामास रथं शाल्वं प्रति महारथः ।। ३९ ।। महारथी भीष्मने क्षत्रिय धर्मका आश्रय ले भय और घबराहट छोड़कर शाल्वकी ओर अपना रथ लौटाया ।। ३९ ।। निवर्तमानं तं दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते । प्रेक्षकाः समपद्यन्त भीष्मशाल्वसमागमे ।। ४० ।। उन्हें लौटते देख सब राजा भीष्म और शाल्व के युद्ध में कुछ भाग न लेकर केवल दर्शक बन गये ।। ४० ।। तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ वासितान्तरे । अन्योन्यमभ्यवर्तेतां बलविक्रमशालिनौ ।। ४१ ।। ये दोनों बलवान् वीर मैथुनकी इच्छावाली गौके लिये आपसमें लड़नेवाले दो साँड़ोंकी तरह हुंकार करते हुए एक-दूसरेसे भिड़ गये। दोनों ही बल और पराक्रमसे सुशोभित थे ।। ४१ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत
महाभारत - श्रीमह्भाख्तमू @artistadeshdaily श्रीमह्भाख्तमू @artistadeshdaily - ShareChat