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#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣7️⃣5️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) एकोननवतितमोऽध्यायः ययाति और अष्टक का संवाद...(दिन 275) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सुखं हि जन्तुर्यदि वापि दुःखं दैवाधीनं विन्दते नात्मशक्त्या । तस्माद् दिष्टं बलवन्मन्यमानो न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कथंचित् ।। ८ ।। जीव जो सुख अथवा दुःख पाता है, वह प्रारब्धसे ही प्राप्त होता है, अपनी शक्तिसे नहीं। अतः प्रारब्धको ही बलवान् मानकर मनुष्य किसी प्रकार भी हर्ष अथवा शोक न करे ।। ८ ।। दुःखैर्न तप्येन्न सुखैः प्रहृष्येत् समेन वर्तेत सदैव धीरः । दिष्टं बलीय इति मन्यमानो न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कथंचित् ।। ९ ।। दुःखोंसे संतप्त न हो और सुखोंसे हर्षित न हो। धीर पुरुष सदा समभावसे ही रहे और भाग्यको ही प्रबल मानकर किसी प्रकार चिन्ता एवं हर्षके वशीभूत न हो ।। ९ ।। भये न मुह्याम्यष्टकाहं कदाचित् संतापो मे मानसो नास्ति कश्चित् । धाता यथा मां विदधीत लोके ध्रुवं तथाहं भवितेति मत्वा ।। १० ।। अष्टक ! मैं कभी भयमें पड़कर मोहित नहीं होता, मुझे कोई मानसिक संताप भी नहीं होता; क्योंकि मैं समझता हूँ कि विधाता इस संसारमें मुझे जैसे रखेगा, वैसे ही रहूँगा ।। १० ।। संस्वेदजा अण्डजाश्चोद्भिदश्च सरीसृपाः कृमयोऽथाप्सु मत्स्याः । तथाश्मानस्तृणकाष्ठं च सर्वे दिष्टक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ति ।। ११ ।। स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, सरीसृप, कृमि, जलमें रहनेवाले मत्स्य आदि जीव तथा पर्वत, तृण और काष्ठ-ये सभी प्रारब्ध-भोगका सर्वथा क्षय हो जानेपर अपनी प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं ।। ११ ।। अनित्यतां सुखदुःखस्य बुद्ध्वा कस्मात् संतापमष्टकाहं भजेयम् । किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये तस्मात् संतापं वर्जयाम्यप्रमत्तः ।। १२ ।। अष्टक ! मैं सुख तथा दुःख दोनोंकी अनित्यताको जानता हूँ, फिर मुझे संताप हो तो कैसे? मैं क्या करूँ और क्या करके संतप्त न होऊँ, इन बातोंकी चिन्ता छोड़ चुका हूँ। अतः सावधान रहकर शोक-संतापको अपनेसे दूर रखता हूँ ।। १२ ।। (दुःखे न खिद्येन्न सुखेन माद्येत् समेन वर्तेत स धीरधर्मा । दिष्टं बलीयः समवेक्ष्य बुद्ध्या न सज्जते चात्र भृशं मनुष्यः ।।) जो दुःखमें खिन्न नहीं होता, सुखसे मतवाला नहीं हो उठता और सबके साथ समान भावसे बर्ताव करता है, वह धीर कहा गया है। विज्ञ मनुष्य बुद्धिसे प्रारब्धको अत्यन्त बलवान् समझकर यहाँ किसी भी विषयमें अधिक आसक्त नहीं होता। वैशम्पायन उवाच एवं ब्रुवाणं नृपतिं ययाति-मथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छत् । मातामहं सर्वगुणोपपन्नं तत्र स्थितं स्वर्गलोके यथावत् ।। १३ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! राजा ययाति समस्त सद्‌गुणोंसे सम्पन्न थे और नातेमें अष्टकके नाना लगते थे। वे अन्तरिक्षमें वैसे ही ठहरे हुए थे, मानो स्वर्गलोकमें हों। जब उन्होंने उपर्युक्त बातें कहीं, तब अष्टकने उनसे पुनः प्रश्न किया ।। १३ ।। अष्टक उवाच ये ये लोकाः पार्थिवेन्द्र प्रधाना-स्त्वया भुक्ता यं च कालं यथावत् । तान् मे राजन् ब्रूहि सर्वान् यथावत् क्षेत्रज्ञवद् भाषसे त्वं हि धर्मान् ।। १४ ।। अष्टक बोले- महाराज! आपने जिन-जिन प्रधान लोकोंमें रहकर जितने समयतक वहाँके सुखोंका भलीभाँति उपभोग किया है, उन सबका मुझे यथार्थ परिचय दीजिये। राजन्! आप तो महात्माओंकी भाँति धर्मोका उपदेश कर रहे हैं ।। १४ ।। ययातिरुवाच राजाहमासमिह सार्वभौम-स्ततो लोकान् महतश्चाजयं वै । तत्रावसं वर्षसहस्रमात्रं ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ।। १५ ।। ययातिने कहा-अष्टक ! मैं पहले समस्त भूमण्डलमें प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा था। तदनन्तर सत्कर्मोंद्वारा बड़े-बड़े लोकोंपर मैंने विजय प्राप्त की और उनमें एक हजार वर्षोंतक निवास किया। इसके बाद उनसे भी उच्चतम लोकमें जा पहुँचा ।। १५ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत
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