#जय श्री कृष्ण
⁉️जब यादवों का नाश हुआ तो उद्धव जी कैसे बच गए थे?⁉️
👩❤️👩एक बार द्वारकापुरी में खेलते हुए यदुवंशी और भोजवंशी बालकों को खेल-खेल में कुछ मुनीश्वरों को चिढ़ा दिया। तब यादव कुल का नाश ही भगवान को अभीष्ट है—यह समझकर उन ऋषियों ने बालकों को शाप दे दिया ॥ 👩❤️👩
🤹इसके कुछ ही महीने बाद भावीवश वृष्णि, भोज और अन्धकवंशी यादव बड़े हर्ष से रथों पर चढ़कर प्रभास क्षेत्र को गये ॥
वहाँ स्नान करके उन्होंने उस तीर्थ के जल से पितर, देवता और ऋषियों का तर्पण किया तथा ब्राह्मणों को श्रेष्ठ गौएँ दीं। उन्होंने सोना, चाँदी, शय्या, वस्त्र, मृगचर्म, कम्बल, पालकी, रथ, हाथी, कन्याएँ और ऐसी भूमि जिससे जीविका चल सके तथा नाना प्रकार के सरस अन्न भी भगवत अर्पण करके ब्राह्मणों को दिये। इसके पश्चात् गौ और ब्राह्मणों के लिये ही प्राण धारण करने वाले उन वीरों ने पृथ्वी पर सिर टेककर उन्हें प्रणाम किया।🤹
🛐उद्धवजी ने कहा—फिर ब्राह्मणों की आज्ञा पाकर यादवों ने भोजन और वारुणी मदिरा पी ।उससे उनका ज्ञान नष्ट हो गया और वे दुर्बचनों से एक-दूसरे के हृदय को चोट पहुँचाने लगे ।
मदिरा के नशे से उनकी बुद्धि बिगड़ गयी और जैसे आपस की रगड़ से बाँसों में आग लग जाती है, उसी प्रकार सूर्यास्त होते-होते उनमें मार-काट होने लगी ॥🛐
🕉️भगवान् अपनी माया की उन विचित्र गतियों को देखकर सरस्वती के जल से आचमन करके एक वृक्ष के नीचे बैठ गये ।
इससे पहले ही शरणगतों के दुःख दूर करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने कुल का संहार करने की इच्छा होने पर मुझसे कह दिया था कि तुम बदरिकाश्रम चले जाओ ।
विदुरजी! इससे यद्यपि मैं उनका आशय समझ गया था, तो भी स्वामी के चरणों का वियोग न सह सकने के कारण मैं पीछे-पीछे प्रभासक्षेत्र में पहुँच गया । वहाँ मैंने देखा कि जो सबके आश्रय हैं किन्तु जिनका कोई और आश्रय नहीं है, वे प्रियतम प्रभु शोभाधाम श्याम सुन्दर सरस्वती के तट पर अकेले ही बैठे हैं ॥ दिव्य विशुद्ध- सत्त्वमय अत्यन्त सुन्दर शरीर है, शान्ति से भरी रतनाऱी आँखें हैं। उनको चार भुजाएँ और रेशमी पीताम्बर देखकर मैंने उनको दूर से ही पहचान लिया ॥ वे एक पीपल के छोटे-से वृक्ष का सहारा लिये बायीं जाँघ पर दायाँ चरण कमल रखे बैठे थे। भोजन-पान का त्याग कर देने पर भी वे आनन्द से प्रफुल्लित हो रहे थे ॥
इसी समय व्यासजी के प्रिय मित्र परम भागवत सिद्ध मैत्रेयजी लोगों में स्वच्छन्द विचरते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ मैत्रेय मुनि भगवान् के अनुरागी भक्त हैं। आनन्द और भक्तिभाव से उनकी गर्दन झुक रही थी। उनके सामने ही श्रीहरि ने प्रेम एवं मुस्कान युक्त चितवन से मुझे आनन्दित हुए कहा ॥🕉️
❣️श्रीभगवान् कहने लगे—मैं तुम्हारी आन्तरिक अभिलाषा जानता हूँ; इसलिये मैं तुम्हें वह ज्ञान देता हूँ, जो दूसरों के लिये अत्यन्त दुर्लभ है। उद्धव! तुम पूर्वजन्म में वसु थे। विश्व की रचना करने वाले प्रजापतियों और वसुओं के यज्ञ में मुझे पाने की इच्छा से ही तुमने मेरी आराधना की थी । साधु स्वभाव उद्धव! संसार में तुम्हारा यह अन्तिम जन्म है । क्योंकि इसमें तुमने मेरा अनूपम पद प्राप्त कर लिया है। अब मैं मर्त्यलोक को छोड़कर अपने धाम में जाना चाहता हूँ। इस समय यहाँ एकान्त में तुमसे अपनी अनन्य भक्ति के कारण ही मेरा दर्शन पाया है, यह बड़े सौभाग्य की बात है। पूर्वकाल (पाद्मकल्प)-के आरम्भ में मैंने अपने नाभिकमल पर बैठे हुए ब्रह्मा को अपनी महिमा के प्रकट करने वाले जिस श्रेष्ठ ज्ञान का उपदेश किया था और जिसे विवेकी लोग 'भागवत' कहते हैं, वही मैं तुम्हें देता हूँ ॥ विदुरजी! मुझ पर तो प्रतिक्षण उन परम पुरुष की कृपा बरस रही थी। इस समय उनके इस प्रकार आदर पूर्वक कहने से स्नेहवश मुझे रोमांच हो आया, मेरी वाणी गद्गद हो गयी और नेत्रों से आँसुओं की धारा बहने लगी। उस समय मैंने हाथ जोड़कर उनसे कहा—'स्वामिन्! आपके चरण कमलों के सेवक के लिये इस संसार में अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—इन चारों में से कोई भी पदार्थ दुर्लभ नहीं है; तथापि मुझ में किसी की इच्छा नहीं है। मैं तो केवल आपके चरण कमलों की सेवा के लिये ही लालायित रहता हूँ ॥ ❣️
🙏 प्रभो! आप निःस्पृह होकर भी कर्म करते हैं, अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, कालस्वरूप होकर भी शत्रु के डर से भागते हैं और द्वारका के किले में जाकर छिप रहते हैं तथा स्वात्माराम होकर भी सोलह हजार स्त्रियों के साथ रमण करते हैं—इन विचित्र चरित्रों को देखकर विद्वानों की बुद्धि भी चक्कर में पड़ जाती है । देव! आपका स्वरूपज्ञान सर्वथा अबाध और अखण्ड है। फिर भी आप सलाह लेने के लिये मुझे बुलाकर जो भोले मनुष्यों की तरह बड़ी सावधानी से मेरी सन्मति पूछा करते थे, प्रभो! आपकी वह लीला मेरे मन को मोहित-सा कर देती है। स्वामिन्! आपने जो अपने स्वरूप का गुह्य रहस्य प्रकट करने वाला जो परम ज्ञान ब्रह्माजी को बतलाया था, वह यदि मेरे समझने योग्य हो तो मुझे भी सुनाइये, जिससे मैं भी इस संसार-दुःख को सुगमता से पार कर जाऊँ' ॥ 🙏
🛐जब मैंने इस प्रकार अपने हृदय का भाव निवेदित किया, तब परमपुरुष कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण ने मुझे अपने स्वरूप को परम स्थिति का उपदेश दिया ॥
इस प्रकार पूज्यपाद गुरु श्रीकृष्ण से आत्मतत्त्व की उपलब्धि की साधना सुनकर तथा उन प्रभु के चरणोंकी वन्दना और परिक्रमा करके मैं यहीं आया हूँ। इस समय उनके विरह से मेरा चित्त अत्यन्त व्याकुल हो रहा है ॥🛐
🧘विदुरजी! पहले तो उनके दर्शन पाकर मुझे आनन्द हुआ था, किन्तु अब तो मैं हृदय की उनकी विरह व्यथा से अत्यन्त पीड़ित हूँ। अब मैं उनके प्रिय क्षेत्र बदरिकाश्रम को जा रहा हूँ, जहाँ भगवान् श्रीनारायणदेव और नर—ये दोनों ऋषि लोगों पर अनुग्रह करने के लिये दीर्घकालीन सौम्य, दूसरों को सुख पहुँचाने वाली एवं कठिन तपस्या कर रहे हैं ॥ 🧘
🛐श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार उद्धवजी के मुख से अपने प्रिय बन्धु-बान्धवों के विनाश का असह्य समाचार सुनकर तथा स्नेहवश विदुरजी को जो शोक उत्पन्न हुआ, उसे उन्होंने ज्ञान द्वारा शान्त कर दिया ॥🛐
👩❤️👩जब भगवान् श्रीकृष्ण के परिकरों में प्रधान महाभागवत उद्धव जी बदरिकाश्रम की ओर जाने लगे, तब कुरुश्रेष्ठ विदुर जी ने श्रद्धा पूर्वक उनसे पूछा ॥ 👩❤️👩
🧘विदुरजी ने कहा—उद्धवजी! योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने स्वरूप के गुह्य रहस्य को प्रकट करनेवाला जो परमज्ञान आपसे कहा था, वह आप हमें भी सुनाइये क्योंकि सेवक को तो अपने सेवकों का कार्य सिद्ध करने के लिये ही विचरना करते हैं ॥ 🧘
🛐उद्धवजी ने कहा - उस तत्त्वज्ञान के लिये आपको मुनिवर मैत्रेयजी की सेवा करनी चाहिए। इस मृत्युलोक को छोड़ते समय मेरे सामने स्वयं भगवान् ने ही आपको उपदेश करने के लिये आज्ञा दी थी।🛐
🙏 !!जय श्री कृष्ण !!🙏


