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#शब्द संवाद #✍️ साहित्य एवं शायरी #📓 हिंदी साहित्य #📚कविता-कहानी संग्रह
शब्द संवाद - गजल पी एस ; यादव ' अजनबी तेरे शहर के मौसम की मैं तासीर बन गया हूं। राह में भटका हुआ एक राहगीर बन गया हूं। मुंह मोड़ लो तुम बेशक सामने आने से हमारे, चुपके रोएगा जरूर तेरी जंजीर बन गया हूं। सब जुदा हो गए हमसे बह ऋतुएं चांद तारे हालातों से उजड़ा मैं अधीर बन गया हूं। गुजरे { दिल को बहुत समझाया पर राहत नहीं मिली, भटकती राहों का जैसे एक फकीर बन गया हूं। हंसता है वह जमाना मेरी उजड़ी जिँदगी पर, तबाहियों में ढहती मैं एक प्राचीर बन गया हूं। हौसले बुलन्द रख ऐ भटकते हुए नव युवा,  तेरे साहसी कदमों को मैं एक वीर बन गया हूं। वफाओं के अंधेरों में मत लगाइए तुम छलांगें , हर वक्त बहता मैं अश्कों का नीर बन गया हूं। गजल पी एस ; यादव ' अजनबी तेरे शहर के मौसम की मैं तासीर बन गया हूं। राह में भटका हुआ एक राहगीर बन गया हूं। मुंह मोड़ लो तुम बेशक सामने आने से हमारे, चुपके रोएगा जरूर तेरी जंजीर बन गया हूं। सब जुदा हो गए हमसे बह ऋतुएं चांद तारे हालातों से उजड़ा मैं अधीर बन गया हूं। गुजरे { दिल को बहुत समझाया पर राहत नहीं मिली, भटकती राहों का जैसे एक फकीर बन गया हूं। हंसता है वह जमाना मेरी उजड़ी जिँदगी पर, तबाहियों में ढहती मैं एक प्राचीर बन गया हूं। हौसले बुलन्द रख ऐ भटकते हुए नव युवा,  तेरे साहसी कदमों को मैं एक वीर बन गया हूं। वफाओं के अंधेरों में मत लगाइए तुम छलांगें , हर वक्त बहता मैं अश्कों का नीर बन गया हूं। - ShareChat