#जय श्री #जय श्री राम
📕वेदकृत-श्रीरामस्तुति📕
[श्रीरामचरितमानस]
जय सगुन निर्गुन रूप
रूप अनूप भूप सिरोमने।
दसकंधरादि प्रचंड निसिचर
प्रबल खल भुजबल बने॥
अवतार नर संसार भार
बिभंजि दारुन दुख दहे।
जय प्रनतपाल दयाल प्रभु
संजुक्त सक्ति नमामहे॥१॥
✍️हे सगुण और निर्गुणरूप ! हे अनुपम रूप-लावण्ययुक्त ! हे राजाओंके शिरोमणि ! आपकी जय हो। आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरों को अपनी भुजाओं के बल से मार डाला। आपने मनुष्य-अवतार लेकर संसार के भार को नष्ट करके अत्यन्त कठोर दुःखों को भस्म कर दिया। हे दयालु! हे शरणागत की रक्षा करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। मैं शक्ति (सीताजी)-सहित शक्तिमान् आपको नमस्कार करता हूँ ॥१॥
तव बिषम माया बस सुरासुर
नाग नर अग जग हरे।
भव पंथ भ्रमत अमित दिवस
निसि काल कर्म गुननि भरे॥
जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे।
भव खेद छेदन दच्छ हम
कहुँ रच्छ राम नमामहे॥२॥
✍️हे हरे ! आपकी दुस्तर माया के वशीभूत होने के कारण देवता, राक्षस, नाग, मनुष्य और चर, अचर सभी काल, कर्म और गुणों से भरे हुए (उनके वशीभूत हुए) दिन-रात अनन्त भव (आवागमन) के मार्ग में भटक रहे हैं। हे नाथ! इनमें से जिनको आपने कृपा करके (कृपादृष्टि से) देख लिया, वे [मायाजनित] तीनों प्रकार के दुःखों से छूट गये। हे जन्म-मरण के श्रम को काटने में कुशल श्रीरामजी! हमारी रक्षा कीजिये। हम आपको नमस्कार करते हैं ॥२॥
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।
ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि
परत हम देखत हरी॥
बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।
जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं
भव नाथ सो समरामहे॥३॥
✍️जिन्होंने मिथ्या ज्ञान के अभिमान में विशेषरूप से मतवाले होकर जन्म-मृत्यु [के भय] को हरनेवाली आपकी भक्ति का आदर नहीं किया, हे हरि! उन्हें देवदुर्लभ (देवताओं को भी बड़ी कठिनता से प्राप्त होनेवाले, ब्रह्मा आदि के) पद को पाकर भी हम उस पद से नीचे गिरते देखते हैं। [परन्तु] जो सब आशाओं को छोड़कर आप पर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जप कर बिना ही परिश्रम भवसागर से तर जाते हैं। हे नाथ! ऐसे आपका स्मरण करते हैं ॥३॥
जे चरन सिव अज पूज्य रज
सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।
नख निर्गता मुनि बंदिता
त्रैलोक पावनि सुरसरी॥
ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत
बन फिरत कंटक किन लहे।
पद कंज द्वंद मुकुंद राम
रमेस नित्य भजामहे॥४॥
✍️जो चरण शिव जी और ब्रह्मा जी के द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणों की कल्याणमयी रज का स्पर्श पाकर [शिला बनी हुई] गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या तर गयी; जिन चरणों के नख से मुनियों द्वारा वन्दित, त्रैलोक्य को पवित्र करने वाली देवनदी गङ्गाजी निकलीं और ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल, इन चिन्हों से युक्त जिन चरणों में वन में फिरते समय काँटे चुभ जानेसे ढट्ठे पड़ गये हैं; हे मुकुन्द! हे राम! हे रमापति! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलों को नित्य भजते रहते हैं ॥४॥
अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच
चारि निगमागम भने।
षट कंध साखा पंच बीस
अनेक पर्न सुमन घने॥
फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।
पल्लवत फूलत नवल नित
संसार बिटप नमामहे॥५॥
✍️वेद-शास्त्रों ने कहा है कि जिसका मूल अव्यक्त (प्रकृति) है; जो [प्रवाह रूप से] अनादि है; जिसके चार त्वचाएँ, छः तने, पचीस शाखाएँ और अनेकों पत्ते और बहुत-से फूल हैं; जिसमें कड़वे और मीठे दो प्रकार के फल लगे हैं; जिस पर एक ही बेल है, जो उसी के आश्रित रहती है; जिसमें नित्य नये पत्ते और फूल निकलते रहते हैं; ऐसे संसार वृक्ष स्वरूप (विश्वरूप में प्रकट) आपको हम नमस्कार करते
हैं ॥५॥
जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य
मन पर ध्यावहीं।
ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव
सगुन जस नित गावहीं॥
करुनायतन प्रभु सदगुनाकर
देव यह बर मागहीं।
मन बचन कर्म बिकार तजि
तव चरन हम अनुरागहीं॥६॥
✍️ब्रह्म अजन्मा है, अद्वैत है, केवल अनुभव से ही जाना जाता है और मन से परे है-जो [इस प्रकार कहकर उस] ब्रह्म का ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, किन्तु हे नाथ! हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं। हे करुणा के धाम प्रभो! हे सद्गुणों की खान! हे देव! हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म से विकारों को त्याग कर आपके चरणों में ही प्रेम करें ॥६॥
सब के देखत बेदन्ह
बिनती कीन्ह उदार।
अंतर्धान भए पुनि
गए ब्रह्म आगार॥
✍️वेदों ने सबके देखते यह श्रेष्ठ विनती की। फिर वे अन्तर्धान हो गये और ब्रह्मलोक को चले गये।
🙏राजा रामचन्द्र की जय 🌹🚩


